चीन का चेंग्दू J-20 ‘माइटी ड्रैगन’ पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ फाइटर Jट आज दुनिया की चर्चा का केंद्र है. इसकी विशाल साइज, करीब 2000 किलोमीटर तक की कॉम्बैट रेडियस और भारी हथियार क्षमता इसे भारत और ताइवान के लिए गंभीर खतरा बनाती है.
कई लोग इसके कैनार्ड्स (सामने के छोटे पंख) को देखकर स्टेल्थ क्षमता पर सवाल उठाते हैं, क्योंकि ये रडार क्रॉस-सेक्शन (RCS) बढ़ा सकते हैं. लेकिन चीन पहले से छठी पीढ़ी के विमान जैसे J-36 पर काम कर रहा है.
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J-20 लंबाई में लगभग 21 मीटर का है, जो अमेरिकी F-22 से बड़ा है. इसका खाली वजन 17 से 19 हजार किलोग्राम और अधिकतम टेक-ऑफ वजन 37 हजार किलोग्राम तक पहुंचता है. दो इंजनों से लैस यह विमान 2469 km/hr की गति हासिल कर सकता है.
आंतरिक ईंधन क्षमता बड़ी होने से इसकी ऑपरेशनल रेंज 5,000 किलोमीटर से अधिक बताई जाती है, जबकि कॉम्बैट रेडियस 1,100 से 2,000 किलोमीटर के बीच है.यह इसे लंबी दूरी के मिशनों के लिए आदर्श बनाता है.
हथियार क्षमता भी प्रभावशाली है. आंतरिक बे में चार लंबी दूरी की पीएल-15 मिसाइलें और दो छोटी पीएल-10 मिसाइलें ले जा सकता है. बाहरी हार्डपॉइंट्स के साथ कुल पेलोड 11,000 किलोग्राम तक पहुंच सकता है. यह एयर सुपीरियरिटी, लंबी दूरी के इंटरसेप्शन और यहां तक कि ग्राउंड या समुद्री लक्ष्यों पर हमले के लिए सक्षम है. दो सीट वाला J-20एस वर्जन इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और ड्रोन टीमिंग के लिए विकसित किया जा रहा है.
स्टेल्थ पर सवाल: कैनार्ड्स और आरसीएस
J-20 के डिजाइन में कैनार्ड्स सबसे ज्यादा चर्चा का विषय हैं. ये आगे के छोटे पंख मैन्यूवरेबिलिटी बढ़ाते हैं, लेकिन स्टेल्थ को कमजोर कर सकते हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि फ्रंटल आरसीएस कम है, जो सामने से हमले में फायदेमंद है, लेकिन साइड और रियर एस्पेक्ट में एफ-22 या एफ-35 जितना अच्छा नहीं.
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इंजन नोजल भी कुछ रडार सिग्नल रिफ्लेक्ट कर सकते हैं. चीन रडार-एब्जॉर्बिंग सामग्री और कोटिंग्स का इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन सटीक आरसीएस आंकड़े गोपनीय हैं. फिर भी, J-20 को लो-ऑब्जर्वेबल माना जाता है. यह रडार नेटवर्क में घुसपैठ करने में सक्षम साबित हो चुका है.
भारत और ताइवान के लिए खतरा
भारत की लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) के पास J-20 की तैनाती चिंता बढ़ा रही है. 2026 में सैटेलाइट इमेजरी से होतान और डैमक्सुंग एयरबेस पर कई J-20 दिखे, जो लद्दाख से कुछ सौ किलोमीटर दूर हैं. भारत के पास अभी कोई पांचवीं पीढ़ी का विमान नहीं है, इसलिए राफेल और सु-30एमकेआई पर निर्भरता है. लंबी रेंज वाली मिसाइलों के साथ J-20 भारतीय एयर डिफेंस को चुनौती दे सकता है.
ताइवान के मामले में J-20 एयर सुपीरियरिटी हासिल करने और शुरुआती स्ट्राइक के लिए महत्वपूर्ण है. यह एडब्ल्यूएसीएस और टैंकर विमानों को दूर से निशाना बना सकता है. चीन के पास अब 300 से 500 J-20 होने का अनुमान है, जो सालाना 100 से अधिक का उत्पादन बढ़ा रहा है.
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छठी पीढ़ी की ओर: J-36 और आगे
चीन J-20 पर ही नहीं रुक रहा. J-36 जैसे टेललेस (बिना पूंछ के) छठी पीढ़ी के प्रोटोटाइप पहले से उड़ान भर रहे हैं. 2024 के अंत से टेस्टिंग चल रही है. कई प्रोटोटाइप एडवांस हो चुके हैं. ये बेहतर स्टेल्थ, एआई इंटीग्रेशन और ड्रोन स्वार्म कंट्रोल पर फोकस करते हैं. अनुमान है कि 2030 के आसपास सेवा में आ सकते हैं.
J-20 चीन की वायु शक्ति का प्रतीक है. इसकी साइज, रेंज और पेलोड इसे क्षेत्रीय संतुलन बदलने वाला बनाते हैं. स्टेल्थ पर सवाल सही हैं, लेकिन क्षमताएं वास्तविक हैं. भारत को तेजस एमके-2, एएमसीए और अधिक राफेल फाइटर जेट जैसे कदम तेज करने होंगे. ताइवान भी अपने F-16 अपग्रेड पर निर्भर है. भविष्य में छठी पीढ़ी की दौड़ और तेज होगी. J-20 सिर्फ एक विमान नहीं, बल्कि चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षा का संकेत है.
ऋचीक मिश्रा