गांव वही है, घर वही हैं, गलियां भी वही हैं. बस इन गलियों में तीन घरों के दौड़ते-भागते बच्चे अब नहीं लौटेंगे. जिन आंगनों में उनकी हंसी गूंजती थी, जहां उनकी शरारतों पर कभी डांट पड़ती थी तो कभी प्यार बरसता था, वहां अब सन्नाटा है. बिहार के वैशाली जिले के राघोपुर स्थित रामपुर श्यामचंद गांव में मातम पसरा है. किसी घर में मां की सिसकियां थम नहीं रहीं, तो कहीं पिता अपने आंसुओं को रोक नहीं पा रहे. रिश्तेदारों के घर एक भोज में शामिल होने निकले 13 बच्चों की मौत ने तीन परिवारों को ऐसे दुख में धकेल दिया है, जिसकी कल्पना भी शायद किसी ने नहीं की थी.
बुधवार को प्रशासन ने हादसे में जान गंवाने वाले बच्चों के शव उनके परिजनों को सौंप दिए. जिन बच्चों को परिवार के लोग कुछ समय पहले तक अपने सामने हंसते-बोलते देख रहे थे, अब उन्हीं के अंतिम संस्कार की तैयारी करनी थी. शव घर पहुंचे तो परिवारों के दुख का कोई ठिकाना नहीं रहा. घर के दरवाजे पर लोगों की भीड़ थी, लेकिन किसी के पास ऐसा कोई शब्द नहीं था, जो इस पीड़ा को कम कर सके.
बच्चे किसी अनजान जगह या किसी अनहोनी की आशंका के बीच नहीं निकले थे. वे अपने ही रिश्तेदार के यहां आयोजित श्राद्ध कर्म के भोज में शामिल होने जा रहे थे. परिवार के लोगों के लिए यह रिश्तेदारी निभाने और अपनों के बीच पहुंचने का एक सामान्य सफर था. किसी ने नहीं सोचा था कि यह यात्रा इतनी भयावह बन जाएगी.
सिदाहिन राय की दिव्यांग बेटी की मौत के बाद श्राद्ध कर्म का भोज था. उसी में शामिल होने बच्चे नाव से निकले थे. लेकिन बीच रास्ते हुए हादसे ने परिवारों की खुशियां छीन लीं. जिन बच्चों को भोज में पहुंचना था, वे अपने घरों तक भी वापस नहीं लौट सके.
एक ही गोतिया परिवार से जुड़े थे सभी बच्चे
इस दुर्घटना में जान गंवाने वाले सभी 13 बच्चे आपस में रिश्तेदार थे. वे तीन परिवारों से ताल्लुक रखते थे, जो एक ही गोतिया परिवार से जुड़े हैं. मृतकों में रामप्रवेश राय के परिवार के सात बच्चे, राजकिशोर राय के परिवार के पांच बच्चे और डोमन राय के परिवार की एक बच्ची शामिल है. हादसे ने एक साथ कई आंगनों को सूना कर दिया. एक घर में बच्चा नहीं रहा, तो दूसरे घर में भी वही मातम था. जिन बच्चों के बीच रिश्तेदारी थी, उनके परिवार अब एक-दूसरे के दुख में साथ खड़े हैं. लेकिन साझा दुख भी उस खालीपन को नहीं भर सकता, जो बच्चों के चले जाने से पैदा हुआ है. परिवार अपने बच्चों के शव लेकर घर पहुंचे और अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुट गए.
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मृत बच्चों में ज्यादातर की उम्र 15 साल से कम थी. दो बच्चियों की उम्र करीब 18 साल के आसपास बताई गई है. मृतकों में लड़कियों की संख्या अधिक है. इतनी कम उम्र में बच्चों का इस तरह दुनिया से चले जाना परिवारों के लिए ऐसा सदमा है, जिसे शब्दों में समेटना मुश्किल है. हादसे के बाद प्रशासन ने पीड़ित परिवारों को राहत देने की प्रक्रिया शुरू की. परिजनों को चार-चार लाख रुपये के चेक दिए गए. इसके अलावा कबीर अंत्येष्टि योजना के तहत तीन-तीन हजार रुपये की सहायता राशि दी गई.
यह उन परिवारों का निजी दुख है, जिनके लिए आने वाले दिन अब पहले जैसे नहीं होंगे. त्योहार आएंगे, रिश्तेदार मिलेंगे, गांव में फिर सामान्य जीवन लौटने की कोशिश होगी, लेकिन जिन बच्चों की मौजूदगी इन पलों का हिस्सा होती, उनकी कमी हर बार महसूस होगी.
सिर्फ हादसा नहीं, सुरक्षा से जुड़ा सवाल भी
राघोपुर की इस त्रासदी ने ग्रामीण इलाकों में नाव से आवागमन की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. नदी के रास्ते यात्रा करने वाले लोगों के लिए नाव कई बार रोजमर्रा के जीवन का साधन होती है. ऐसे में यह जानना अहम है कि हादसे के वक्त नाव पर कितने लोग सवार थे, उसकी क्षमता क्या थी, सुरक्षा के कौन-कौन से इंतजाम थे और यात्रियों के लिए लाइफ जैकेट जैसी सुविधाएं थीं या नहीं.
इन सवालों के जवाब जांच से ही स्पष्ट होंगे. फिलहाल, गांव के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन परिवारों को संभालने की है, जिनकी दुनिया अचानक बदल गई है. लोगों का कहना है कि हादसे के कारणों की गंभीरता से पड़ताल हो, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकें.
रामपुर श्यामचंद गांव में वक्त धीरे-धीरे आगे बढ़ेगा, जिंदगी भी अपनी रफ्तार पकड़ने की कोशिश करेगी. लेकिन जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को खोया है, उनके लिए यह खालीपन कभी नहीं भरेगा. एक हादसे ने कई घरों की रौनक छीन ली. अब उन घरों में किलकारियों की जगह सिसकियां हैं, खेलते बच्चों की जगह उनकी यादें हैं और हर चेहरे पर एक ही सवाल है- जो बच्चे घर से निकले थे, वे फिर कभी घर क्यों नहीं लौटे?
जिलाधिकारी के पहुंचने पर ग्रामीणों का फूटा गुस्सा
हादसे की खबर मिलने के बाद वैशाली की जिलाधिकारी वर्षा सिंह राघोपुर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचीं, जहां मृतकों के शव रखे गए थे. इस दौरान शोक में डूबे परिजन उनसे लिपटकर रोने लगे और हादसे की आपबीती सुनाई. वहीं, ग्रामीणों में घटना को लेकर भारी आक्रोश भी देखने को मिला. लोगों ने नारेबाजी की और विरोध करते हुए अधिकारियों को गांव से बाहर तक जाने को मजबूर किया. हालात को देखते हुए इलाके में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया. ग्रामीणों की नाराजगी स्थानीय प्रशासन और अंचल स्तर पर उपलब्ध व्यवस्थाओं को लेकर भी सामने आई.
नाव हादसे में घायल बच्चों से मिले स्वास्थ्य मंत्री
वैशाली नाव हादसे में घायल बच्चों का पटना के एनएमसीएच अस्पताल में इलाज चल रहा है. घटना के बाद बिहार के स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार अस्पताल पहुंचे और घायलों का हाल जाना. उन्होंने अस्पताल अधीक्षक से बातचीत कर बच्चों के इलाज और चिकित्सा सुविधाओं की जानकारी ली. स्वास्थ्य मंत्री ने घायलों को समुचित इलाज उपलब्ध कराने का भरोसा दिया. उन्होंने बताया कि जिलाधिकारी से मिली जानकारी के अनुसार, हादसा शाम करीब 7:30 बजे हुआ था और इसमें 13 लोगों की मौत हुई है. पूरे मामले की जांच की जा रही है.
सीओ और थानाध्यक्ष का वेतन रोकने का आदेश
नाव हादसे के बाद जिला प्रशासन ने कार्रवाई की है. जिलाधिकारी वर्षा सिंह ने संबंधित अंचल अधिकारी (सीओ) और थानाध्यक्ष का वेतन रोकने का आदेश दिया है. दोनों अधिकारियों को शो-कॉज नोटिस जारी कर घटना के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा गया है. प्रशासन की ओर से अधिकारियों से जवाब मिलने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी. हादसे में 13 लोगों की मौत के बाद स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था और जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
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