105 किलोमीटर का सफर और डमरू वाली कांवड़... हाथों से चलकर बाबाधाम जा रहे बिच्छू बम की कहानी

सावन में सुल्तानगंज से बाबाधाम तक जाने वाले कांवड़िया पथ पर हर कदम पर आस्था के अलग-अलग रंग दिखाई देते हैं. इस बार मुंगेर के असरगंज में दो शिवभक्त सबसे ज्यादा चर्चा में हैं. एक श्रद्धालु महादेव के प्रिय डमरू के आकार की कांवड़ लेकर 105 किलोमीटर की यात्रा कर रहा है, तो दूसरा 'बिच्छू बम' बनकर हाथों के बल बाबाधाम की ओर बढ़ रहा है.

Advertisement
हाथों के बल चलते हुए जा रहे बाबाधाम. (Photo: ITG) हाथों के बल चलते हुए जा रहे बाबाधाम. (Photo: ITG)

गोविंद कुमार

  • मुंगेर,
  • 05 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 11:44 AM IST

श्रावण का महीना... भगवा रंग में रंगी सड़कें... कंधों पर कांवड़... और हर कुछ कदम पर गूंजता एक ही स्वर- 'बोल बम... हर-हर महादेव...' सुल्तानगंज से देवघर तक जाने वाला कांवड़िया पथ इन दिनों आस्था की बहती हुई धारा बन चुका है. लाखों शिवभक्त उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर करीब 105 किलोमीटर पैदल चल रहे हैं, ताकि बाबा बैद्यनाथ के दरबार में जलाभिषेक कर सकें.

Advertisement

हर साल इस रास्ते पर लाखों कांवड़िए दिखाई देते हैं. किसी के कंधे पर साधारण कांवड़ होती है, कोई डाक कांवड़ लेकर दौड़ता है. इस बार मुंगेर के असरगंज कच्ची कांवड़िया पथ पर दो ऐसे श्रद्धालु दिखाई दिए, जिनकी भक्ति ने लोगों को रुककर देखने पर मजबूर कर दिया.

एक श्रद्धालु के कंधे पर था महादेव का प्रिय डमरू... और दूसरा खुद 'बिच्छू बम' बनकर चल रहा था. असरगंज के रास्ते अचानक लोगों की नजर एक अलग तरह की कांवड़ पर टिक गई. दूर से देखने पर ऐसा लग रहा था जैसे कोई विशाल डमरू सड़क पर चल रहा हो. पास पहुंचे तो पता चला कि यह कोई झांकी नहीं, बल्कि झारखंड के धनबाद जिले के भूली निवासी अजय विश्वकर्मा की कांवड़ है.

अजय पिछले सात वर्षों से सुल्तानगंज से पैदल बाबा धाम की यात्रा कर रहे हैं. लेकिन इस बार उन्होंने सोचा कि जब शिव का सबसे प्रिय वाद्य यंत्र डमरू है, तो क्यों न उसी के स्वरूप में कांवड़ बनाई जाए. फिर महीनों की मेहनत का सफर शुरू हुआ. लकड़ी और फाइबर से विशाल डमरू तैयार हुआ. उसके भीतर आस्था थी. बाहर कला थी. और कंधों पर विश्वास.

Advertisement

यह भी पढ़ें: मुस्लिम महिला, हिंदू पति और बुर्के में कांवड़ यात्रा... कौन है संभल की तमन्ना मलिक? नोटिस मिलने के बाद भी पीछे हटने को नहीं तैयार

जैसे ही अजय इस कांवड़ के साथ आगे बढ़ते हैं, रास्ते में लोग रुक जाते हैं. कोई मोबाइल निकालकर वीडियो बनाता है, कोई तस्वीर खिंचवाता है, तो कोई 'हर-हर महादेव' का जयकारा लगाता है. अजय कहते हैं कि जब लोग उनकी कांवड़ देखकर खुश होते हैं और बाबा का नाम लेते हैं, तो रास्ते की सारी थकान पलभर में गायब हो जाती है.

और फिर आया 'बिच्छू बम'...

अगर डमरू वाली कांवड़ लोगों का ध्यान खींच रही थी, तो कुछ दूर आगे एक ऐसा दृश्य था, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया. एक श्रद्धालु... दोनों पैर हवा में... पूरा शरीर उल्टा... और आगे बढ़ने का सहारा सिर्फ दोनों हाथ. लोग देखकर ठिठक जाते हैं. कुछ देर तक समझ ही नहीं पाते कि आखिर यह हो क्या रहा है. यह हैं पश्चिम बंगाल के राजकुमार महतो. कांवड़िया पथ पर लोग उन्हें 'बिच्छू बम' नाम से जानते हैं.

राजकुमार पैरों की बजाय हाथों के बल बाबा बैद्यनाथ की यात्रा कर रहे हैं. उनका शरीर बिच्छू जैसी मुद्रा में रहता है, इसलिए श्रद्धालुओं ने उन्हें 'बिच्छू बम' कहना शुरू कर दिया. हर बार वह करीब 60 से 70 फीट तक हाथों के बल चलते हैं. फिर कुछ पल रुकते हैं और दोबारा उसी तरह आगे बढ़ जाते हैं. 105 किलोमीटर की यह यात्रा किसी सामान्य व्यक्ति के लिए पैदल पूरी करना भी आसान नहीं होता. लेकिन राजकुमार इसे हाथों के बल पूरा करने निकले हैं.

Advertisement

राजकुमार बताते हैं कि पिछले दो वर्षों से वह पूरे देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों की यात्रा कर रहे हैं. 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन... चार धाम की यात्रा... और 51 शक्तिपीठों में से 21 शक्तिपीठों तक पहुंच चुके हैं. मथुरा, वृंदावन, खाटू श्याम, सालासर बालाजी, मेंहदीपुर बालाजी, तुंगनाथ, बागेश्वर धाम, चित्रकूट और कई अन्य तीर्थों की यात्रा भी कर चुके हैं. उनका कहना है कि बागेश्वर धाम की यात्रा के दौरान उन्हें एक अलग आध्यात्मिक अनुभव हुआ. उसी के बाद उन्होंने तय किया कि वह लोगों तक आस्था का संदेश पहुंचाएंगे.

यह भी पढ़ें: 230 किलोमीटर का सफर, एक कांवड़ और दो कंधे... ऐसी बहू, जिसकी कहानी सुनकर लोग रास्ते में रुक गए

पिछले साल उन्होंने पहली बार सुल्तानगंज से बाबा धाम तक 'बिच्छू यात्रा' की थी. उस यात्रा को पूरा करने में लगभग एक महीना लगा था. इस बार यात्रा का बारहवां दिन है और वे असरगंज पहुंच चुके हैं. हालांकि, इस बार वह अकेले हैं और साथ में एक साइकिल भी लेकर चल रहे हैं, इसलिए उनकी गति थोड़ी धीमी है. लेकिन हौसला पहले जैसा ही है.

राजकुमार ने अपनी यात्रा के दौरान एक अहम बात भी उठाई. उन्होंने कहा कि बंगाल से आने वाले श्रद्धालुओं का सावन, बिहार और झारखंड में शुरू होने वाले सावन से पहले शुरू हो जाता है.

Advertisement

ऐसे में शुरुआती दिनों में हजारों श्रद्धालुओं को भोजन और ठहरने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं मिलती. उन्होंने दोनों राज्य सरकारों से अपील की कि बंगला सावन शुरू होते ही कांवड़ियों के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, ताकि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को परेशानी न हो.

कांवड़ सिर्फ जल नहीं उठाती... भावनाएं भी उठाती है

मुंगेर के असरगंज कच्ची कांवड़िया पथ पर इस समय लाखों लोग गुजर रहे हैं. हर किसी की अपनी मन्नत है. अपनी प्रार्थना है. अपना विश्वास है. अजय विश्वकर्मा और राजकुमार महतो की यात्रा इसलिए अलग दिखाई देती है, क्योंकि यहां सिर्फ मंजिल तक पहुंचना उद्देश्य नहीं है.

एक श्रद्धालु ने महादेव के डमरू को अपने कंधों पर उठा लिया. दूसरे ने अपने शरीर को ही तपस्या का माध्यम बना लिया. शायद इसलिए राहगीर उन्हें देखकर सिर्फ फोटो नहीं खींचते... कुछ पल के लिए हाथ भी जोड़ लेते हैं. आस्था जब साधारण रास्तों पर असाधारण रूप में दिखाई देती है, तो वह लोगों के लिए प्रेरणा बन जाती है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »