सावन का महीना है. हर तरफ भगवा रंग दिखाई देता है. सड़कें बोल बम के जयकारों से गूंज रही हैं. हजारों कांवड़िए हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपने-अपने घरों की ओर बढ़ रहे हैं. इन्हीं हजारों कांवड़ियों के बीच बागपत की सड़क पर गुजर रही एक कांवड़ ऐसी है, जिसके पीछे न कोई मन्नत है, न कोई मनौती.
फिर भी लोग उसे देखकर रुक जाते हैं. मोबाइल निकालकर वीडियो बनाने लगते हैं. कुछ देर तक देखते हैं... फिर मुस्कुराकर आगे बढ़ जाते हैं. यह कांवड़ रिश्तों की एक ऐसी कहानी है, जो आज के समय में कम ही देखने को मिलती है.
इस कहानी के दो किरदार हैं- हरियाणा के रहने वाले रवि और उनकी पत्नी नीशू. कांवड़ के एक सिरे पर रवि हैं. दूसरे सिरे पर नीशू. दोनों के कंधों पर एक ही कांवड़ है. एक कदम रवि बढ़ाते हैं... दूसरा कदम नीशू. दोनों की चाल एक जैसी. दोनों का लक्ष्य एक. और दोनों की मंजिल भी एक.
करीब 230 किलोमीटर की पैदल यात्रा. धूप भी पड़ रही है. बारिश भी हो रही है. पैरों में छाले भी पड़ रहे हैं. कंधों पर गंगाजल का भार भी है. लेकिन चेहरे पर थकान से ज्यादा संतोष दिखाई देता है. यह सफर किसी इच्छा को पूरा करने के लिए नहीं, बल्कि एक रिश्ते को निभाने के लिए तय किया जा रहा है.
जब रास्ते में लोगों ने उनसे पूछा कि इतनी लंबी यात्रा के पीछे कौन-सी मन्नत मांगी है? तो जवाब सुनकर लोग कुछ पल के लिए चुप हो गए. नीशू मुस्कुराते हुए कहती हैं... हम कोई मन्नत लेकर नहीं आए हैं. हम तो सिर्फ अपने सास-ससुर को गंगाजल से स्नान कराने के लिए कांवड़ ला रहे हैं. यही बात इस यात्रा को बाकी हजारों यात्राओं से अलग बना देती है.
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नीशू बताती हैं कि उनके पति रवि हर साल हरिद्वार से गंगाजल लेकर आते थे और अपने माता-पिता को उससे स्नान कराते थे. वह कई वर्षों से यह सब देख रही थीं. एक दिन उनके मन में ख्याल आया... जब पति अपने माता-पिता की सेवा कर रहे हैं, तो मैं क्यों पीछे रहूं? आखिर अब वे मेरे भी तो माता-पिता हैं. यहीं से इस यात्रा की शुरुआत हुई. इस बार उन्होंने सिर्फ साथ चलने का फैसला नहीं किया. उन्होंने कांवड़ का आधा भार भी अपने कंधे पर उठा लिया. यानी सेवा में बराबर की भागीदारी. रास्ता आसान नहीं था.
230 किलोमीटर कोई छोटी दूरी नहीं होती. कई बार धूप इतनी तेज होती कि सड़क तपने लगती. कभी बारिश रास्ता मुश्किल बना देती. कभी पैरों की थकान रुकने के लिए मजबूर करती. लेकिन हर बार एक-दूसरे का हौसला दोनों को फिर आगे बढ़ा देता. इस सफर में किसी ने किसी को पीछे नहीं छोड़ा. एक थकता तो दूसरा संभाल लेता. एक रुकता तो दूसरा इंतजार करता.
शायद यही साझेदारी रिश्तों की सबसे बड़ी ताकत होती है. रवि कहते हैं... हमारे माता-पिता अभी चल-फिर सकते हैं. इसलिए हम उन्हें कंधे पर बैठाकर यात्रा नहीं करा सकते. लेकिन जब तक वे स्वस्थ हैं, तब तक हर साल हरिद्वार से गंगाजल लाकर उन्हें स्नान कराएंगे. और जब उम्र ज्यादा हो जाएगी, तब श्रवण कुमार की तरह उन्हें कंधों पर बैठाकर तीर्थ यात्रा कराएंगे. रवि की बात खत्म भी नहीं होती कि नीशू मुस्कुराकर उनकी ओर देखती हैं. उन्हें अपने जीवनसाथी पर अटूट विश्वास और अगाध प्रेम है.
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आज के दौर में जब अक्सर खबरें रिश्तों के टूटने की होती हैं... कहीं संपत्ति के लिए मां-बाप अदालत पहुंच जाते हैं. कहीं बुजुर्ग वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हो जाते हैं. कहीं बेटे-बहू से परेशान होकर माता-पिता अकेले जिंदगी काटते हैं. ऐसे समय में यह तस्वीर उम्मीद जगाती है.
यह कहानी बताती है कि हर रिश्ता खबर इसलिए नहीं बनता, क्योंकि उसमें विवाद होता है. कुछ रिश्ते इसलिए भी सुर्खियां बनते हैं, क्योंकि उनमें अपनापन बचा होता है. बागपत से गुजरते हुए यह कपल जहां-जहां पहुंचता है, लोग उन्हें देखते हैं. कोई पानी पिलाता है. कोई जयकारा लगाता है. कोई कहता है कि आज भी ऐसे लोग हैं, तभी दुनिया चल रही है. कई लोग उनके साथ तस्वीर खिंचवाते हैं. कुछ बच्चे पूछते हैं कि दो लोग एक ही कांवड़ क्यों उठा रहे हैं? और शायद यही सवाल इस पूरी कहानी का सबसे खूबसूरत जवाब भी है.
क्योंकि परिवार एक व्यक्ति नहीं उठाता. परिवार हमेशा मिलकर उठाया जाता है. इस कांवड़ में सिर्फ गंगाजल नहीं है. इसमें एक बेटे का अपने माता-पिता के प्रति सम्मान है. एक बहू का अपने सास-ससुर के लिए अपनापन है. एक पति-पत्नी की साझेदारी है. और यह भरोसा भी कि सेवा का रिश्ता खून से नहीं, दिल से बनता है.
बेटे की श्रद्धा... और बहू के संस्कार का सबसे सुंदर उपहार
सावन की इस यात्रा में लाखों कांवड़िए अपने-अपने शिवालय तक पहुंचेंगे. उनका गंगाजल शिवलिंग पर चढ़ेगा. लेकिन रवि और नीशू की कांवड़ पहले अपने घर जाएगी. वहां दो बुजुर्ग माता-पिता उनका इंतजार कर रहे होंगे. उनके लिए यह गंगाजल सिर्फ पवित्र जल नहीं होगा. यह उनके बेटे की श्रद्धा... और बहू के संस्कार का सबसे सुंदर उपहार होगा.
शायद इसलिए बागपत से गुजर रही यह कांवड़ लोगों को सिर्फ दिखाई नहीं दे रही... उन्हें रिश्तों का असली अर्थ भी समझा रही है. क्योंकि हर यात्रा मंजिल तक पहुंचने के लिए नहीं होती. कुछ यात्राएं यह याद दिलाने के लिए भी होती हैं कि परिवार का भार जब दो कंधे मिलकर उठाते हैं, तब रास्ते कितने भी लंबे हों, मंजिल खूबसूरत ही होती है.
मनुदेव उपाध्याय