नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के तेवर भारत को लेकर बदलते नजर आ रहे हैं. करीब छह महीने पहले जिस बालेन शाह ने भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री से मुलाकात करने से इनकार कर दिया था, अब वही उनके साथ बैठक करते नजर आए. गुरुवार को काठमांडू में बालेन शाह ने विक्रम मिस्री से मुलाकात की. यह बैठक ऐसे समय हुई है, जब बालेन शाह इसी महीने भारत के दौरे पर आने वाले हैं. मार्च में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद यह उनका पहला द्विपक्षीय विदेश दौरा होगा.
भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री 4 और 5 नवंबर को नेपाल के दौरे पर थे. इस दौरान उन्होंने नेपाल के विदेश सचिव अमृत बहादुर राय के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तर की बातचीत की. इसके अलावा उन्होंने वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले, विदेश मंत्री शिशिर खनाल, ऊर्जा मंत्री बिराज भक्त श्रेष्ठ और बुनियादी ढांचा विकास मंत्री सुनील लम्साल से भी मुलाकात की. दौरे के आखिरी दिन उन्होंने प्रधानमंत्री बालेन शाह से भी मुलाकात की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से शुभकामनाएं दीं.
छह महीने पहले क्यों नहीं मिले थे बालेन शाह?
गुरुवार को काठमांडू में बालेन शाह ने मिस्री से मुलाकात की. यह मुलाकात नेपाल के प्रधानमंत्री की इस महीने के आखिर में होने वाली भारत यात्रा से पहले हुई है. मार्च में पदभार संभालने के बाद, यह उनकी पहली द्विपक्षीय यात्रा होगी. शाह का यह फैसला एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि इससे पहले उन्होंने अपने कार्यकाल के पहले साल में विदेश यात्राएं न करने का निर्णय लिया था.
अब बालेन शाह ने विदेश सचिव से मुलाकात की
मिस्री के साथ अपनी मुलाकात के दौरान पीएम बालेन शाह अपने ट्रेड मार्क चश्मे के बिना नजर आए. एक संयुक्त बयान के अनुसार बातचीत जल संसाधनों, ऊर्जा और व्यापार पर केंद्रित रही.
इस मुलाकात की चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि मई 2026 में विक्रम मिस्री को नेपाल दौरा अचानक टालना पड़ा था. उस समय मिस्री दो दिवसीय दौरे पर काठमांडू जाने वाले थे. रिपोर्ट के अनुसार बालेन शाह ने एक नया प्रोटोकॉल अपनाया था. इसके तहत वह अपने समकक्ष स्तर से नीचे के विदेशी अधिकारियों के साथ वन टू वन बैठक नहीं करना चाहते थे.
बालेन शाह ने इसी नियम के तहत अमेरिका के सहायक विदेश मंत्री पॉल कपूर और भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर से भी मुलाकात नहीं की थी. ऐसे में अब विक्रम मिस्री के साथ उनकी बैठक को भारत-नेपाल संबंधों में आए बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
लिपुलेख विवाद के बीच भारत आने की तैयारी
भारत और नेपाल के रिश्तों में पिछले कुछ समय से लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को लेकर तनाव रहा है. नेपाल इन इलाकों पर अपना दावा करता है, जबकि भारत इन्हें उत्तराखंड का हिस्सा मानता है. कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे को फिर से खोलने पर सहमति के बाद नेपाल ने आपत्ति जताई थी. नेपाल ने इस विवाद के समाधान में चीन और ब्रिटेन जैसे तीसरे पक्षों की भूमिका की भी बात कही थी, जिसे भारत ने स्वीकार नहीं किया.
हालांकि, अब दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ती दिख रही है. मिस्री और नेपाल के अधिकारियों के बीच व्यापार, ऊर्जा, जल संसाधन, कनेक्टिविटी और विकास परियोजनाओं पर चर्चा हुई. नेपाल ने रासुवा-भोटेकोशी में आई बाढ़ के बाद भारत की ओर से दी गई राहत और तकनीकी सहायता के लिए भी आभार जताया.
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के 22 नवंबर को भारत आने की संभावना है. इस यात्रा में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा और सहयोग के नए रास्तों पर चर्चा हो सकती है.
भारत को तब एक झटका लगा जब कालापानी-लिपुलेख जंक्शन को लेकर लंबे समय से चला आ रहा सीमा विवाद फिर से उभर आया.
तनाव तब और बढ़ गया जब भारत और चीन ने उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से होकर कैलाश मानसरोवर यात्रा को फिर से शुरू करने पर सहमति जताई. काठमांडू का दावा है कि 1816 की सुगौली संधि के तहत लिपुलेख उसके क्षेत्र का हिस्सा है. भारत ने नेपाल के इस रुख को खारिज कर दिया और उसके क्षेत्रीय दावों को "आधारहीन" बताया।
हालांकि, तब से नेपाल ने संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे को कूटनीतिक तरीके से सुलझाने के लिए तैयार है. इस बीच, पर्दे के पीछे बातचीत का सिलसिला जारी रहा.
नेपाल के रुख में बदलाव क्यों?
नेपाल अपने पुराने रुख पर कायम ही था. फिर नेपाल में अचानक बाढ़ आ गई. इसमें 1,400 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई और 6,000 लोग लापता हो गए.
भारत ने तुरंत कार्रवाई करते हुए सैकड़ों टन आपातकालीन राहत सामग्री और बेली ब्रिज जैसे उपकरण भेजे, ताकि दूर-दराज़ के इलाकों से संपर्क फिर से बहाल किया जा सके. नई दिल्ली ने सुरंगों के अंदर फंसे मज़दूरों को निकालने के लिए टनलिंग विशेषज्ञों और बचाव दलों को भी भेजा, जो हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स में काम कर रहे थे.
विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत ने 26 अगस्त से 19 सितंबर के बीच 140 टन से ज़्यादा राहत सामग्री भेजी. इससे एक बार फिर साबित हुआ कि जब भी पड़ोसी देशों पर कोई संकट आता है, तो भारत सबसे पहले मदद के लिए आगे आता है.
सितंबर में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में अपने पहले संबोधन के दौरान बालेन शाह ने भारत की तारीफ भी की. इतना ही नहीं नेपाल के प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं से निपटने के लिए नेपाल भारत और चीन के बीच 'हिमालयन क्लाइमेट रेज़िलिएंस मैकेनिज्म' बनाने का प्रस्ताव भी रखा.
इन घटनाक्रमों के बाद भारत के प्रति PM बालेन शाह के रुख में बदलाव आने लगा था. विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल के भारत के साथ संबंध मज़बूत करने के पीछे एक अहम आर्थिक कारण भी है.
दक्षिण एशियाई मामलों के विशेषज्ञ कॉन्स्टेंटिनो ज़ेवियर ने नेपाल के नज़िरिए में आए इस अचानक बदलाव के पीछे एक आर्थिक पहलू की ओर इशारा किया.
अशोका यूनिवर्सिटी में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर ज़ेवियर ने ट्वीट किया, "नेपाल और अन्य पड़ोसी देश यह समझते हैं कि अपने विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए भारत के साथ आर्थिक संबंध मज़बूत करना कितना फ़ायदेमंद है और इस पर उनकी निर्भरता बढ़ रही है, खासकर वैश्विक मंदी और अन्य रुकावटों के दौर में."
अपनी बात को पुख्ता करने के लिए, उन्होंने 'द काठमांडू पोस्ट' की एक रिपोर्ट साझा की, जिसमें कहा गया है कि नेपाल ने भारत से 2 अरब डॉलर से ज़्यादा का आर्थिक पैकेज मांगा है, जिसमें लाइन ऑफ़ क्रेडिट और ग्रांट (अनुदान) शामिल हैं.
रिपोर्ट के अनुसार मिस्री और PM शाह के बीच हुई मुलाकात में इस आर्थिक पैकेज पर चर्चा हुई. नेपाल के वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि शाह की भारत यात्रा के दौरान इसकी घोषणा की जा सकती है. भारत ने अभी तक कोई बयान नहीं आया है. नेपाल ने कहा कि इन फंड का इस्तेमाल मुख्य रूप से ट्रांसमिशन लाइनें बनाने और अचानक आई बाढ़ के बाद पुनर्निर्माण कार्यों के लिए किया जाएगा.
सबसे अहम बात यह है कि शाह ने अपनी पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा के लिए चीन के बजाय भारत को चुना जो नई दिल्ली के साथ संबंधों को नए सिरे से संवारने की उनकी इच्छा को दर्शाता है.
फिलहाल सबकी नजरें इस महीने के आखिर में होने वाली बालेन शाह की नई दिल्ली यात्रा पर टिकी हैं. तीन साल में किसी नेपाली प्रधानमंत्री की यह पहली यात्रा होगी. इससे पहले 2023 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ने नई दिल्ली का दौरा किया था.