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13 हजार हमलों के बाद 21 घंटे की बातचीत भी बेनतीजा, वेंस की वापसी के बाद ट्रंप के पास क्या विकल्प?

13 हजार हमलों के भारी दबाव के बीच इस्लामाबाद में हुई 21 घंटे की वेंस-ईरान वार्ता पूरी तरह फेल हो गई है. जेडी वेंस बिना किसी समझौते के खाली हाथ लौट आए हैं, क्योंकि ईरान ने परमाणु प्रोग्राम बंद करने की अमेरिकी शर्त को ठुकरा दिया है. अब फैसला ट्रंप के पाले में है. बड़ा सवाल यही है कि सीजफायर खत्म होने के बाद क्या मिडिल ईस्ट में फिर से धमाके गूंजेंगे, या फिर शांति का कोई नया रास्ता निकलेगा?

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3 हजार हमलों के साये में हुई बातचीत भी रही बेनतीजा (File Photo)
3 हजार हमलों के साये में हुई बातचीत भी रही बेनतीजा (File Photo)

दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी थीं कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच चल रही जंग अब रुक जाएगी? लेकिन खबर अच्छी नहीं है. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान के बीच करीब 21 घंटे तक मैराथन बातचीत चली, लेकिन नतीजा निकला शून्य. अमेरिका को लग रहा था कि भीषण बमबारी और 13 हाजर ठिकानों को तबाह करने के बाद ईरान बात मान लेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वेंस इस्लाबाद से खाली हाथ वापस लौट आए हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब आगे क्या? क्या फिर से बम बरसेंगे या बातचीत का कोई और रास्ता निकलेगा?

असल में सारा मामला वहीं आकर अटक गया है जहां फरवरी में अटका था. वेंस ने ईरान के सामने साफ कह दिया कि यह हमारा आखिरी ऑफर है, इसे मानो या छोड़ दो. अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना परमाणु प्रोग्राम हमेशा के लिए बंद कर दे. लेकिन ईरान ने दो टूक कह दिया कि उन्हें यह मंजूर नहीं है. वेंस ने पत्रकारों से कहा, हमने अपनी लक्ष्मण रेखा (Red Lines) साफ कर दी थी, लेकिन उन्होंने हमारी शर्तें मानने से इनकार कर दिया.

इस बातचीत के फेल होने के बाद अब ट्रंप प्रशासन के सामने बहुत ही कम विकल्प बचे हैं. ट्रंप ने फिलहाल फ्लोरिडा में एक फाइटिंग चैंपियनशिप मैच (UFC) देखने गए हुए हैं और वहीं से वे बताएंगे कि अमेरिका का अगला कदम क्या होगा. ट्रंप को लगता था कि 38 दिनों की भीषण बमबारी और 13 हजार ठिकानों को तबाह करने के बाद ईरान डर जाएगा और उनकी बात मान लेगा, लेकिन ईरान ने साफ कर दिया कि चाहे कितना भी बारूद क्यों न बरस जाए, वो झुकने वाला नहीं हैं.

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साख और संकट के बीच फंसे ट्रंप

अब ट्रंप के सामने जो रास्ते हैं, वे बड़े पेचीदा हैं. एक रास्ता है कि वे ईरान के साथ फिर से वैसी ही लंबी बातचीत शुरू करें जैसी ओबामा के दौर में हुई थी. आपको बता दें कि उस समय एक डील होने में पूरे 2 साल लग गए थे. ट्रंप को ऐसी लंबी बातें पसंद नहीं हैं, उन्हें लगता है कि वे यह जंग जीत चुके हैं और ईरान को बस उनके सामने घुटने टेक देने चाहिए. लेकिन हकीकत यह है कि 38 दिन की जंग ने ईरान के इरादों को और मजबूत कर दिया है. ईरान का कहना है कि उन्होंने अपने बड़े बुजुर्गों और देशवासियों को इस जंग में खोया है, इसलिए अब वे अपने हक से पीछे नहीं हटेंगे.

दूसरा बड़ा खतरा तेल और महंगाई का है. दुनिया के कुल तेल का 20% हिस्सा जहां से गुजरता है, उस होर्मुज की खाड़ी पर अब ईरान ने अपनी पकड़ मजबूत करने की ठान ली है. युद्ध की वजह से पहले ही पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं, खाद से लेकर कंप्यूटर चिप बनाने वाली गैस तक की कमी हो गई है. अगर ट्रंप फिर से हमला शुरू करते हैं, तो शेयर बाजार गिर जाएगा और महंगाई इतनी बढ़ जाएगी कि आम जनता का जीना मुश्किल हो जाएगा.

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सबसे बड़ी टेंशन की तारीख है 21 अप्रैल. इसी दिन दो हफ्ते का युद्ध विराम खत्म हो रहा है. ईरान चाहता है कि अमेरिका उस पर लगे पुराने प्रतिबंध हटाए और युद्ध में हुए नुकसान का हर्जाना दे. अमेरिका हर्जाना देने को तैयार नहीं है और प्रतिबंध भी धीरे-धीरे हटाना चाहता है. यानी दोनों तरफ से कोई भी झुकने को तैयार नहीं है. अमेरिका को लगता है कि उसने बम गिराकर अपनी ताकत दिखा दी, तो ईरान को लगता है कि वह इतने हमलों के बाद भी बच गया, तो वह असली सिकंदर है. अब देखना होगा कि 21 अप्रैल के बाद मिसाइलें चलती हैं या फिर से बातचीत की मेज सजती है.

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