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ईरान के खिलाफ अब जंग में उतरेंगे सऊदी-यूएई? अमेरिका की मदद के लिए उठाया बड़ा कदम

ईरान के खाड़ी देशों पर बढ़ते हमलों के बीच सऊदी अरब ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसे उसका युद्ध में लगभग शामिल होना माना जा रहा है. यूएई भी ईरान की अरबों डॉलर की संपत्तियों को फ्रीज करने पर विचार कर रहा है. खाड़ी देश अब सैन्य और आर्थिक दोनों स्तरों पर ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपना रहे हैं.

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सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ईरान के खिलाफ युद्ध में उतर सकते हैं (Photo: Getty/Reuters)
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ईरान के खिलाफ युद्ध में उतर सकते हैं (Photo: Getty/Reuters)

अमेरिका और इजरायल के हमलों के जवाब में ईरान खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी देशों को भारी नुकसान पहुंचा रहा है. खाड़ी देश अब तक ईरान के हमलों को चुपचाप झेल रहे थे लेकिन अब लगता है कि पानी सिर से ऊपर चला गया है. सऊदी अरब ने युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक का सबसे बड़ा फैसला लेते हुए अमेरिकी सेना को किंग फहद एयर बेस के इस्तेमाल की इजाजत दे दी है. 

अमेरिकी अखबार 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' (WSJ) में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी के साथ-साथ यूएई भी ईरान के खिलाफ अमेरिका की मदद को सामने आ रहा है.  यूएई अपने वित्तीय तंत्र में रखी ईरान की अरबों डॉलर की संपत्तियों को फ्रीज करने पर विचार कर रहा है. WSJ के अनुसार, युद्ध के दौरान महंगाई से जूझते ईरान के लिए यह कदम उसका आर्थिक सहारा छीन सकता है.

ईरान खाड़ी के सभी छह देशों- सऊदी, यूएई, कतर, कुवैत, बहरीन और ओमान पर भीषण हमले कर रहा है. इन देशों ने कई हफ्तों तक सतर्क रुख अपनाए रखा और तनाव बढ़ने के खिलाफ सभी पक्षों को चेतावनी देते रहे. लेकिन अब यूएई, सऊदी अरब, बहरीन और कतर जैसे खाड़ी देशों ने अब अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना शुरू कर दिया है, क्योंकि ईरान इन देशों पर हमलों से पीछे नहीं हट रहा है.

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रिपोर्ट के अनुसार, ये देश इस बात पर विचार कर रहे हैं कि वो इस संघर्ष में किस हद तक शामिल हों, चाहे वह सैन्य कार्रवाई हो या ईरान पर आर्थिक दबाव बनाने की रणनीति.

ईरान के खिलाफ क्यों बदला सऊदी-यूएई का रुख?

जब अमेरिका और इजरायल ने क्रमशः ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' और 'रोअरिंग लायन' शुरू किए थे, तब खाड़ी देशों को इस बात पर शक था कि ये हमले ईरान के परमाणु या मिसाइल कार्यक्रम को रोक पाएंगे. एक वरिष्ठ खाड़ी राजनयिक ने टाइम्स ऑफ इजरायल से कहा कि खाड़ी देश ईरान पर हमले के बजाए कूटनीति पर जोर दे रहे थे. लेकिन ईरान की आक्रामकता ने यह सोच बदल दी.

खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा ढांचे और शहरों को निशाना बनाकर किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों, जिसमें कतर के रास लाफान गैस हब पर बड़ा हमला भी शामिल है, ने सरकारों को झकझोर दिया है. इन हमलों ने तेल, गैस व पर्यटन जैसे खाड़ी देशों के आर्थिक आधार को नुकसान पहुंचाया है.

ऐसा लगता है कि ईरान को उम्मीद थी कि इन हमलों से खाड़ी देश अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर युद्धविराम के लिए दबाव डालेंगे. लेकिन इसके उलट, इन हमलों ने उनके रुख को और सख्त कर दिया है.

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खाड़ी देशों के लिए चुप रहना पड़ रहा काफी महंगा

ईरान ने प्रभावी रूप से होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही को रोक दिया है. यह समुद्री रास्ता दुनिया का सबसे अहम ऊर्जा मार्ग है. साथ ही उसने वहां से गुजरने पर ट्रांजिट फीस लगाने का संकेत भी दिया है, मानो वो इस समुद्री रास्ते का मालिक हो. इससे खाड़ी देशों में चिंता बढ़ गई है.

तेल-समृद्ध खाड़ी देशों के लिए अब स्थिति साफ है- संयम बरतना अब उनके लिए काफी महंगा साबित हो रहा है.

खाड़ी देश अमेरिका पर यह दबाव भी बना रहे हैं कि युद्ध का अंत ऐसा हो जिसमें ईरान की सैन्य ताकत बहुत कमजोर हो जाए.  खाड़ी के एक अधिकारी ने कहा कि अगर ईरान को ऐसे ही छोड़ दिया गया तो यह बहुत बड़ी गलती होगी.

इस बीच खाड़ी देश अमेरिका से भी नाराज हैं. ईरान पर हमला करने से पहले खाड़ी देशों ने ईरान की जवाबी कार्रवाई को लेकर अमेरिका को चेताया था. लेकिन ट्रंप ने उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिया. और जब युद्ध में खाड़ी देश निशाना बने तो साफ दिखा कि ट्रंप की तैयारी पूरी नहीं थी.

खाड़ी नेता लगातार अमेरिकी अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अमेरिका पर उनका प्रभाव काफी कम है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस युद्ध ने खाड़ी देशों को बड़ी सीख दी है कि वो अपनी सुरक्षा के लिए केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकते बल्कि उन्हें अपनी डिफेंस पार्टनरशिप में विविधता लानी होगी.

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इन सबके बावजूद उनकी प्राथमिकता साफ है, ईरान को कैसे भी कमजोर कर दिया जाए. एक खाड़ी अधिकारी ने कहा, 'हम चाहते हैं कि यह युद्ध ऐसे खत्म हो कि ईरान अपने पड़ोसियों को नुकसान पहुंचाने की हालत में ही न रहे.'

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