यमन के लाल सागर तट पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की तेजी से बढ़त ने भारत की चिंता बढ़ा दी है. करीब 3,000 किलोमीटर दूर मौजूद बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट पर अगर हूतियों का पूरी तरह कंट्रोल हो जाता है, तो इसका सीधा असर भारत के तेल आयात, यूरोप को होने वाले एक्सपोर्ट और सामान की ढुलाई पर पड़ सकता है.
बाब-अल-मंदेब लाल सागर और गल्फ ऑफ एडन को जोड़ने वाला करीब 29 किलोमीटर चौड़ा समुद्री रास्ता है. यह रास्ता सुएज नहर के जरिए यूरोप को हिंद महासागर और एशिया से जोड़ता है. भारत के लिए यह रास्ता इसलिए अहम है क्योंकि कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के साथ-साथ दवाइयां, मशीनरी, टेक्सटाइल और दूसरे सामान भी इसी रूट से यूरोप पहुंचते हैं.
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कैसे बढ़ा हूतियों का कंट्रोल?
हूती संगठन अंसार अल्लाह ने 2014 में यमन की राजधानी सना पर कब्जा करने के बाद देश के उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों में अपना कंट्रोल मजबूत किया. लाल सागर का बड़ा हिस्सा भी उनके प्रभाव में आया. 2015 में सऊदी अरब की अगुवाई में हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई हुई, लेकिन उन्हें पूरी तरह पीछे नहीं हटाया जा सका.
अब हूतियों के पास बैलिस्टिक मिसाइल, ड्रोन और दूसरे आधुनिक हथियार हैं. ताजा घटनाक्रम में स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने करीब 18 घंटे में यमन के लाल सागर तट पर तेजी से बढ़त बनाई.
रॉयटर्स के मुताबिक हूतियों ने रणनीतिक बंदरगाह शहर मोचा पर कब्जा किया और हनिश द्वीपों की ओर बढ़े. एपी ने मायून यानी पेरिम द्वीप पर हूतियों के कब्जे की खबर दी. फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक हूती जूकर और हनिश द्वीपों तक भी पहुंचे हैं. हूती नेता मोहम्मद अल-बुखैती ने कहा कि उन्होंने बाब-अल-मंदेब पर कंट्रोल कर लिया है. हालांकि ईरान ने हूतियों को ताजा मदद देने और ईरानी अधिकारियों को यमन भेजने की खबरों का खंडन किया है.
रास्ता बंद हुआ तो भारत पर क्या असर?
अगर बाब-अल-मंदेब से जहाजों का आना-जाना मुश्किल होता है तो शिपिंग और इंश्योरेंस का खर्च तेजी से बढ़ सकता है. 2023 के आखिर में हूती हमलों के बाद करीब 2,000 जहाजों ने सुएज नहर से बचते हुए अफ्रीका के दक्षिणी छोर यानी केप ऑफ गुड होप का रास्ता अपनाया था. इससे भारत आने वाले सामान की सप्लाई में देरी हुई.
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता तेल की कीमतों को लेकर है. बाब-अल-मंदेब से गुजरने वाले कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की मात्रा 2023 में करीब 9.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन थी, जो 2025 की पहली छमाही में घटकर करीब 4.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गई. हूतियों की ताजा बढ़त की खबर के बाद ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया और बाद में करीब 99 डॉलर के आसपास रहा. भारत रूस जैसे दूसरे स्रोतों से तेल खरीद सकता है, लेकिन वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने का असर भारत पर भी पड़ेगा.
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एक्सपोर्ट पर भी पड़ेगा असर
भारत के लिए दूसरी बड़ी चिंता यूरोप को होने वाला एक्सपोर्ट है. अगर जहाजों को अफ्रीका के चारों तरफ जाना पड़ा तो मुंबई से रॉटरडैम की दूरी करीब 15,700 किलोमीटर से बढ़कर लगभग 23,000 किलोमीटर हो सकती है. इससे ईंधन, बीमा और माल ढुलाई का खर्च बढ़ेगा और भारतीय सामान यूरोप में महंगा हो सकता है.
ऐसे में 3,000 किलोमीटर दूर यमन में बाब-अल-मंदेब पर बढ़ता हूती कंट्रोल भारत के लिए सिर्फ पश्चिम एशिया का संकट नहीं है. इसका असर तेल की कीमत, शिपिंग खर्च और यूरोप के साथ भारत के कारोबार पर पड़ सकता है. होर्मुज स्ट्रेट पर पहले से दबाव के बीच बाब-अल-मंदेब का संकट भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और एक्सपोर्ट, दोनों मोर्चों पर बड़ी चुनौती बन सकता है.