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आगजनी, हिंसा और सैकड़ों स्कूल बंद... फ्रांस के Gen Z में क्यों आया उबाल? समझें पूरा मामला

जिस फ्रांस ने कभी क्रांति के जरिए सत्ता का चेहरा बदला था, दुनिया को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का सिद्धांत दिया. आज वही अपने छात्रों के गुस्से को संभालने के लिए जूझ रहा है. प्रदर्शनकारी छात्र सड़क पर हैं, हैरान करने वाली बात यह है कि इन छात्रों की मांगें वहीं है जिसे लेकर अमूमन भारत के छात्र सड़क पर निकलते हैं.

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पेरिस में छात्रों का प्रदर्शन (Photo: AFP)
पेरिस में छात्रों का प्रदर्शन (Photo: AFP)

आधुनिक इतिहास की पहली बड़ी क्रांति फ्रांस में हुई थी. आर्थिक संकट, भारी टैक्स, सामाजिक असमानता और निरंकुश राजशाही के खिलाफ भड़का जनआक्रोश 1789 में ऐसी क्रांति में बदला, जिसने दुनिया को ‘स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व’ का सिद्धांत दिया. राजशाही गई, फ्रांस गणतंत्र बना और इतिहास की दिशा बदल गई.

आज दशकों बाद फ्रांस सबसे बड़े छात्र आंदोलन को काबू में करने के लिए संघर्ष कर रहा है. 14 से 18 साल के लड़के सड़क पर हैं. ये ज्यादातर हाई स्कूल के छात्र हैं, इन्हें आप फ्रांस का Gen Z भी कह सकते हैं. पेरिस के उत्तरी किनारे के एक स्कूल में हड़ताल कर रहे शिक्षकों के समर्थन में शुरू हुआ एक हड़ताल 'भावनाओं के विस्फोट' में बदल गया और देखते ही देखते शिक्षकों का एक गुमनाम सा प्रदर्शन राष्ट्रीय संकट में बदल गया है. 

पिछले कुछ हफ़्तों में फ्रांस में सैकड़ों हाई स्कूलों को बंद करना पड़ा है और 6,000 से ज़्यादा लोगों को पुलिस हिरासत में लिया गया है. इनमें से ज़्यादातर नाबालिग हैं जिनका पहले कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है. इस दौरान छात्र, शिक्षक और पुलिसकर्मी घायल हुए हैं. इसी प्रदर्शन में उत्तर-पूर्वी शहर लेंस में एक छात्र का हाथ तब ब्लास्ट में उड़ गया जब उसने पुलिस की ओर से फायर किए गए एक ग्रेनेड को कथित तौर पर उठा लिया. जबकि टूर्स शहर में एक दूसरे छात्र की आंख चली गई. 

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जिस फ्रांस ने कभी क्रांति के जरिए सत्ता का चेहरा बदला था, आज वही अपने छात्रों के गुस्से को संभालने के लिए जूझ रहा है. 

एक आम भारतीय तो यही समझता है कि फ्रांस तो यूरोप के अमीर देशों में हैं, फिर इस समृद्ध देश के छात्र आज सड़क पर क्यों हैं? राफेल और रेनां और लॉरियल बनाने वाले देश में किस बात की किल्लत हो गई कि बच्चों को इंकलाब कहना पड़ रहा है.

कहां से हुई शुरुआत?

फ्रांस में प्रदर्शन की चिंगारी पेरिस के बाहरी इलाके में सेंट-एक्सुपरी हाई स्कूल में 21 सितंबर को हुए शुरुआती विरोध प्रदर्शन से फैली. ये एक छोटा सा प्रदर्शन था. ऐसा प्रोटेस्ट हम भारत में अमूमन रोज देखते हैं. जब स्कूली बच्चे सड़क पर होते हैं. इस पर बहुत कम लोगों का ध्यान गया. 

छात्र और शिक्षक संसाधनों की कमी के खिलाफ विरोध करने के लिए एक साथ आए थे. फ्रांस में सरकारी मशीनरी फास्ट है. प्रदर्शन होते ही उनकी मांगें पूरी हो गईं और स्कूल में अतिरिक्त स्टाफ भेजा गया, हड़ताल खत्म हो गई. लेकिन तब तक चिंगारी भड़क चुकी थी. छात्र नेता मानेस नाडेल के अनुसार यह आग की तरह फैल गया.

उन्होंने कहा, "अब इसमें शामिल स्कूलों की संख्या अभूतपूर्व है," उन्होंने कहा कि फ्रांस का शिक्षा मंत्रालय "इस संकट से पूरी तरह घिर गया है."

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फ्रांस में हाई स्कूलों को lycées कहते हैं. जल्द ही छात्रों ने पेरिस और आसपास के इलाकों के lycées ने एंट्रेंस एग्जाम को रोकना शुरू कर दिया.  

पेरिस में प्रदर्शन कर रहे छात्र. (Photo: AFP)

कुछ ही दिनों में उत्तर में लिली से लेकर दक्षिण में मार्सिले तक देश भर में ऐसी ही घटनाएं सामने आईं.  छात्रों ने कचरे के डिब्बों में आग लगाना शुरू कर दिया, सड़कों पर बैरिकेड्स लगने लगे और टीचिंग स्टाफ पर हमला होने लगा. 

जल्द ही देश भर से आगजनी, हिंसा और पुलिस के साथ झड़प करने की तस्वीर आने लगीं. इसी के साथ इस आंदोलन में 'फार-लेफ्ट' समूहों की भागीदारी पर सवाल खड़े होने लगे. विरोध आंदोलन शुरू होने के बाद से 100 से अधिक हाई स्कूलों को नुकसान पहुंचा है. 

आलोचकों ने पुलिस पर सख्ती से दमन का आरोप लगाया है. सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार एलेन्कॉन में एक पुलिसकर्मी को कैमरे में एक लड़की को गर्दन को बांहों में जकड़ते जो अब कानूनन प्रतिबंधित है. 

छात्रों की शिकायतें क्या है? 

फ्रांस में छात्रों का प्रदर्शन सिर्फ किसी एक फैसले के खिलाफ नहीं है, बल्कि बदहाल होती शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ बढ़ता गुस्सा है. भारत के लोगों को ये जानकर हैरानी हो सकती है कि टीचर, जर्जर स्कूल भवन, खराब सुविधाएं फ्रांस जैसे देश में भी प्रदर्शन की वजह बन सकती है. 

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छात्रों की सबसे बड़ी मांग है कि स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक और सपोर्ट स्टाफ नियुक्त किए जाएं. उनका कहना है कि शिक्षक गैरहाजिर होने पर उनकी जगह कोई दूसरा शिक्षक नहीं आता, जिससे पढ़ाई प्रभावित होती है. 

इसके अलावा छात्र भीड़भाड़ वाली कक्षाओं, जर्जर स्कूल भवनों, खराब सुविधाओं, लंबे स्कूल घंटों और शिक्षा में बढ़ती असमानता के खिलाफ भी आवाज उठा रहे हैं. कई छात्र विश्वविद्यालय में दाखिले की प्रक्रिया से जुड़ी Parcoursup व्यवस्था को भी तनाव और असमानता बढ़ाने वाला मानते हैं.  प्रदर्शनकारी शिक्षा बजट में कटौती रोकने और स्कूलों में ज्यादा संसाधन लगाने की मांग कर रहे हैं. 

फ्रांस के स्कूलों से सालों से ऐसे वीडियो सामने आते रहे हैं जिनमें क्लासरूम में बहुत कम डेस्क या कुर्सियां ​​दिखाई देती हैं, या शिक्षक के न आने पर उनकी जगह कोई दूसरा शिक्षक न होने के कारण छात्रों की क्लास रद्द हो जाती है.

फ्रांस में अमीर और गरीब इलाकों के स्कूलों के बीच सुविधाओं, शिक्षकों और पढ़ाई के माहौल का अंतर काफी बड़ा है. खासकर पेरिस के गरीब सबर्ब में छात्रों की शिकायत है कि उन्हें ज्यादा भीड़ वाली कक्षाएं, जर्जर इमारतें और शिक्षक की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. 

द गार्जियन में छपी OECD से जुड़े विश्लेषण के मुताबिक फ्रांस में बच्चे की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि उसकी शैक्षणिक संभावनाओं पर काफी असर डालती है और वंचित परिवारों के बच्चे अक्सर वंचित स्कूलों में ही पढ़ते हैं. 

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दूसरा बड़ा सामाजिक मुद्दा भविष्य की असुरक्षा है. छात्रों को लगता है कि स्कूल से यूनिवर्सिटी और फिर नौकरी तक पहुंचने की दौड़ में उनके लिए बराबर मौके नहीं हैं. Parcoursup जैसी विश्वविद्यालय एंट्रेस एग्जाम को लेकर भी शिकायत है कि यह प्रक्रिया तनाव बढ़ाती है और अपेक्षाकृत गरीब छात्रों को नुकसान पहुंचा सकती है. छात्रों को लगता है जिस सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को सामाजिक बराबरी का साधन होना चाहिए, वही असमानता को बढ़ा रही है. 

सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार 2010 में फ़्रांस में जन्म दर में अचानक बढ़ोतरी के कारण अब हाई स्कूल जाने वाले छात्रों की संख्या बढ़ गई है, जबकि इन स्कूलों को कई सालों से असल फ़ंडिंग में कटौती का सामना करना पड़ रहा है. 2008 के मुकाबले अब सेकेंडरी स्कूलों में कम शिक्षक हैं, जबकि छात्रों की संख्या में 2,50,000 की बढ़ोतरी हुई है. 

फ्रांस की सरकार क्या कह रही है?

छात्रों के आंदोलन पर फ्रांस की सरकार ने शिक्षा संबंधी मांगों पर सुधार का भरोसा दिया है, लेकिन सरकार हिंसा, आगजनी और स्कूलों में तोड़फोड़ पर सख्त कार्रवाई करने के मूड में है.   

प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने कहा है कि सरकार छात्रों की शिकायतों को सुन रही है और अक्टूबर के अंत तक उनकी मांगों पर काम करने का निर्देश दिया गया है.  सरकार पुराने स्कूल भवनों की मरम्मत, शिक्षकों की अनुपस्थिति की समस्या, स्कूलों में सुविधाओं और Parcoursup यूनिवर्सिटी एंट्रेस सिस्टम को अधिक पारदर्शी बनाने पर विचार कर रही है. 

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Parcoursup फ्रांस का ऑनलाइन उच्च शिक्षा प्रवेश प्लेटफॉर्म है। इसके जरिए हाईस्कूल के छात्र यूनिवर्सिटी, कॉलेज और दूसरे उच्च शिक्षा संस्थानों में दाखिले के लिए आवेदन करते हैं। छात्र अपनी पसंद के कोर्स चुनते हैं और संस्थान उनके आवेदन के आधार पर प्रवेश देते हैं. 

पर आगजनी और हिंसा को लेकर सरकार का अलग रुख है. फ्रांस सरकार का कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसा को अलग-अलग देखा जाना चाहिए. लेकोर्नू ने स्कूल जलाने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने को जायज विरोध नहीं माना। गृह मंत्री लॉरेंट न्युनेज ने भी पुलिस की कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि पुलिस छात्रों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को सुरक्षा देने के लिए तैनात है. 

हालांकि पुलिस कार्रवाई को लेकर सरकार पर दबाव भी बढ़ रहा है. लेंस में एक छात्र के हाथ की गंभीर चोट के बाद सरकार ने हाई स्कूल प्रदर्शनों में ग्रेनेड के इस्तेमाल को अस्थायी रूप से रोक दिया है. 

फ्रांस के गृह मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक मंगलवार को देश भर में लगभग 2,56,000 प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे, जिनमें से 56,000 पेरिस में थे. वहीं, प्रदर्शन आयोजित करने में शामिल हाई स्कूल छात्र संघों में से एक, 'यूनियन सिंडिकल लाइसिएन' (Union Syndicale Lycéenne) ने देश भर में 4,50,000 लोगों के शामिल होने का अनुमान लगाया. सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार इतिहास गवाह है कि छात्रों के विरोध-प्रदर्शन फ्रांस की सरकारों के लिए कभी अच्छे नहीं रहे. मई 1968 का छात्र आंदोलन फ़्रांस के इतिहास की सबसे बड़ी हड़ताल में बदल गया. था. 

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