जब कैनवा की सीईओ मेलानी पर्किन्स ने कंपनी के रीस्ट्रक्चरिंग के तहत 1,271 कर्मचारियों की छंटनी का ऐलान किया, तो चर्चा सिर्फ नौकरी गंवाने वाले लोगों की संख्या तक सीमित नहीं रही. इससे भी ज्यादा चर्चा इस बात की हुई कि कंपनी ने जाने वाले कर्मचारियों के साथ कैसा बर्ताव किया. छह महीने का सैलरी पैकेज, हेल्थकेयर कवरेज, करियर सपोर्ट और स्टार्टअप ग्रांट जैसी सुविधाओं ने सोशल मीडिया पर जमकर तारीफ बटोरी.
इस पूरी घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या महिला सीईओ छंटनी के फैसलों को अपने पुरुष समकक्षों से अलग तरह से संभालती हैं? हालांकि इसका कोई एक सीधा जवाब नहीं है, लेकिन हालिया अकादमिक रिसर्च और महिला लीडर्स के अनुभव कुछ अलग ही कहानी बयां करते हैं.
क्या कहती है ग्लोबल रिसर्च?
'इक्वालिटी, डाइवर्सिटी एंड इनक्लूजन' जर्नल (2025) के 10 देशों की 1,283 कंपनियों पर किए गए अध्ययन के मुताबिक, कोविड-19 महामारी से पहले महिला और पुरुष नेतृत्व वाली कंपनियों में छंटनी के मामलों में कोई खास अंतर नहीं देखा गया था. हालांकि, महामारी के दौरान महिला-नेतृत्व वाली कंपनियों में लेऑफ की दरें काफी अधिक पाई गईं. इस रिसर्च से यह साफ होता है कि सिर्फ सहानुभूति के आधार पर यह मान लेना सही नहीं है कि महिलाएं छंटनी से पूरी तरह बचती हैं या फैसले अलग तरह से लेती हैं.
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की रिपोर्ट (नवंबर 2026) की 99 देशों के लगभग 12,000 उद्यमों पर आधारित इस रिपोर्ट में सामने आया कि जिन कंपनियों की कमान महिला सीईओ के हाथ में थी, उनके बेहतर व्यावसायिक परिणाम देने की संभावना 6.4% अधिक थी. हालांकि, यह रिपोर्ट इस बात की पुष्टि नहीं करती कि महिला सीईओ बेहतर विदाई पैकेज देती हैं या छंटनी को ज्यादा सहानुभूति से संभालती हैं.
सहानुभूति कोई महिलाओं का गुण नहीं, यह एक चुनाव है!
कॉर्पोरेट जगत की जानी-मानी एक्सपर्ट्स का मानना है कि लेऑफ को संभालने का तरीका जेंडर से ज्यादा निजी मूल्यों और कंपनी कल्चर पर निर्भर करता है. मॉर्निंग स्टार ब्रैंडकॉम की सह-संस्थापक और डायरेक्टर छेतना इसरानी कहती हैं कि मैं इसे जरूरी नहीं कि जेंडर से जोड़कर देखूं, हालांकि मुझे लगता है कि महिला लीडर्स अक्सर लोगों और रिश्तों के प्रति एक अलग संवेदनशीलता लेकर आती हैं. व्यावसायिक फैसला कमर्शियल हो सकता है, लेकिन आप उसे कैसे कम्यूनिकेट करते हैं, यह आपके व्यक्तित्व को दर्शाता है.
वहीं, वर्टेक्स ग्रुप की ग्लोबल वीपी-मार्केटिंग एंड ट्रांसफॉर्मेशन तान्या सिंह का मानना है कि करुणा को सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं करना चाहिए. वह कहती हैं कि एक महिला लीडर के तौर पर मैं इस बात से बचूंगी कि करुणा को किसी एक जेंडर का गुण कहा जाए. सहानुभूति अनुभवों से आकार लेती है और यह कोई भी लीडर चुन सकता है.
व्यावसायिक फैसला बनाम मानवीय कीमत
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि सहानुभूति कभी भी बिजनेस की स्थिरता की कीमत पर नहीं आनी चाहिए. तान्या सिंह का कहना है कि लेऑफ का ऐलान करने के बाद लीडर्स को पारदर्शिता रखनी चाहिए, सही ट्रांजिशनल सपोर्ट देना चाहिए और विजिबल बने रहना चाहिए. छेतना इसरानी इस बात पर भी जोर देती हैं कि महिला लीडर्स को अक्सर एक डबल स्टैंडर्ड का सामना करना पड़ता है कि उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे पोषण करने वाली हों, लेकिन कड़े फैसले लेते समय उन्हें ज्यादा सख्ती से परखा जाता है.
अंत में सवाल यह नहीं है कि महिला सीईओ छंटनी के फैसले अलग तरीके से लेती हैं या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या किसी भी लीडर चाहे वह किसी भी जेंडर का हो, उसमें इतनी संवेदनशीलता है कि वह कठिन व्यावसायिक फैसले लेते वक्त अपने कर्मचारियों को 'डिफेंडबल' (अतिरिक्त या बेकार) महसूस न होने दे? क्योंकि बिजनेस रिश्ता खत्म हो सकता है, लेकिन बुनियादी मानवीय शिष्टाचार हमेशा बरकरार रहना चाहिए.