
जंग हमेशा सिर्फ हथियारों से नहीं लड़ी जाती. कई बार पूरा खेल समझौतों, गठबंधनों और कूटनीति के जरिए खेला जाता है. पश्चिम एशिया में आज ठीक वैसा ही दौर दिखाई दे रहा है. एक तरफ ईरान है, जो खुद को इस पूरे इलाके की सबसे बड़ी ताकत मानता है. दूसरी तरफ अमेरिका है, जो इजरायल के दबाव में पिछले कई सालों से ईरान के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश कर रहा है. अब इस कहानी में एक नया किरदार तेजी से उभर रहा है. वह है सऊदी अरब.
कुछ साल पहले तक सऊदी और इजरायल के बीच औपचारिक रिश्ते नहीं थे. परमाणु कार्यक्रम पर भी अमेरिका बेहद सतर्क रहता था. लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है. अगर मौजूदा कूटनीतिक कोशिशें आगे बढ़ती हैं तो पश्चिम एशिया में एक ऐसा सुरक्षा ढांचा बन सकता है, जिसमें अमेरिका, इजरायल, यूएई और सऊदी अरब एक ही रणनीतिक लाइन पर नजर आएंगे. यही वजह है कि कई रणनीतिक विशेषज्ञ इसे संभावित "एंटी-ईरान आर्किटेक्चर" के तौर पर देख रहे हैं.
सऊदी को मिला यूरेनियम एनरिचमेंट का अधिकार
इस कहानी की शुरुआत परमाणु ऊर्जा से होती है. सऊदी अरब कई वर्षों से कहता रहा है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालना चाहता है. इसी योजना के तहत उसने नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की तैयारी शुरू की.

रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी का टारगेट सिर्फ परमाणु आधारित पॉवर प्लांट बनाना नहीं है. वह पूरे न्यूक्लियर फ्यूल साइकिल में शामिल होना चाहता है. यानी यूरेनियम निकालने से लेकर उसे समृद्ध (Enrichment) करने तक की क्षमता विकसित करना चाहता है. मोहम्मद बिन सलमा लंबे समय से इसके पीछे लगे हुए थे. ट्रंप से लेकर बाइडेन तक, सभी से उन्होंने डील करने की कोशिशें की. आखिरकार ट्रंप ने उनकी इस मांग को पूरा कर दिया और वो भी पूरी शर्तों के साथ.
अमेरिका आमतौर पर जिन मुल्कों के साथ परमाणु समझौता करता है, उसे यूरेनियम एनरिचमेंट का अधिकार नहीं दिया जाता. जैसे कि यूनाइटेड अरब अमीरात के साथ भी उसका परमाणु समझौता है, लेकिन उसे अमेरिका ने यूरेनियम संवर्धन का अधिकार नहीं दिया है. अमेरिका और यूएई के बीच इस समझौते को "गोल्ड स्टैंडर्ड" कहा जाता है. लेकिन सऊदी इस मॉडल से आगे जाना चाहता था. यही वजह है कि अमेरिका-सऊदी परमाणु समझौते पर पूरी दुनिया की नजर है. इस संभावित समझौते पर जल्द ही ट्रंप साइन करने वाले हैं.
इजरायल से रिश्तों की ट्रंप की नई कोशिश
परमाणु कार्यक्रम अकेली कहानी नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका लगातार चाहता रहा है कि सऊदी अरब भी अब्राहम अकॉर्ड का हिस्सा बने और इजरायल के साथ औपचारिक रिश्ते स्थापित करे. अब्राहम अकॉर्ड के जरिए पहले ही यूएई, बहरीन, मोरक्को और कुछ अन्य देशों ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए हैं.
अगर भविष्य में सऊदी भी इस रास्ते पर आगे बढ़ता है तो यह पश्चिम एशिया का सबसे बड़ा रणनीतिक बदलाव होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि सऊदी सिर्फ एक अरब देश नहीं, बल्कि इस्लामी दुनिया का सबसे प्रभावशाली राजनीतिक और धार्मिक केंद्र भी माना जाता है.
यूएई पहले ही मॉडल बन चुका है
अगर इस पूरे समीकरण को समझना है तो यूएई का उदाहरण देखना होगा. यूएई ने अमेरिकी सहयोग से अपना नागरिक परमाणु कार्यक्रम विकसित किया. बराकाह परमाणु प्लांट के चारों रिएक्टर चालू हो चुके हैं और देश की बिजली का बड़ा हिस्सा अब परमाणु ऊर्जा से आता है.

लेकिन यूएई ने एक अहम फैसला लिया. उसने घरेलू यूरेनियम संवर्धन का अधिकार छोड़ दिया और अंतरराष्ट्रीय निगरानी स्वीकार की. यही वजह है कि उसका कार्यक्रम कम विवादित माना जाता है. अब सवाल यह है कि क्या सऊदी भी वही मॉडल अपनाएगा या संवर्धन का अधिकार अपने पास रखेगा. यही पूरी बहस का केंद्र है.
आखिर अमेरिका की रणनीति क्या है?
कई विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका सिर्फ ऊर्जा सहयोग नहीं बढ़ा रहा. उसका बड़ा लक्ष्य क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को नए सिरे से तैयार करना भी है. अगर अमेरिका, सऊदी, यूएई और इजरायल एक साझा सुरक्षा ढांचे में आते हैं तो मिसाइल रक्षा, खुफिया जानकारी साझा करना, समुद्री सुरक्षा और संयुक्त सैन्य सहयोग काफी मजबूत हो सकता है.
ईरान के नजरिए से यही सबसे बड़ी चुनौती है. तेहरान लंबे समय से खुद को पश्चिम एशिया में अमेरिकी प्रभाव का सबसे बड़ा विरोधी बताता रहा है. ऐसे में उसके चारों तरफ अमेरिका समर्थित देशों का मजबूत सुरक्षा नेटवर्क बनना उसके लिए रणनीतिक दबाव बढ़ा सकता है.
अमेरिका-सऊदी के समझौते से ईरान क्यों चिंतित?
ईरान पहले से ही अपने परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलों और क्षेत्रीय सहयोगियों की वजह से पश्चिमी देशों के निशाने पर है. अगर सऊदी को भी उन्नत परमाणु तकनीक मिलती है और वह इजरायल के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाता है तो तेहरान इसे अपने खिलाफ रणनीतिक घेराबंदी के रूप में देख सकता है. यही वजह है कि कई विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इससे पश्चिम एशिया में हथियारों की नई दौड़ शुरू होने का खतरा पैदा हो सकता है.

अगर एक देश अपनी क्षमता बढ़ाएगा तो दूसरा भी पीछे नहीं रहेगा. दुनिया की चिंता सिर्फ ईरान नहीं, परमाणु प्रसार भी है. सऊदी की तर्ज पर अन्य देश भी इसी तरह यूरेनियम संवर्धन की मांग रख सकते हैं. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) और परमाणु अप्रसार व्यवस्था (NPT) के समर्थक लगातार इस बात पर जोर देते हैं कि किसी भी नए समझौते में मजबूत निगरानी व्यवस्था होनी चाहिए. वरना पश्चिम एशिया न्यूक्लियर कंपटीशन के नए दौर में प्रवेश कर सकता है.
पश्चिम एशिया का भविष्य क्या हो सकता है?
फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है. सऊदी के परमाणु कार्यक्रम, इजरायल के साथ संभावित रिश्तों और अमेरिकी रणनीति पर बातचीत अभी भी कई स्तरों पर निर्भर करती है. फिलिस्तीन का मुद्दा, ईरान की प्रतिक्रिया, अमेरिका की घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा हालात इस पूरी प्रक्रिया को प्रभावित करेंगे.
लेकिन एक बात साफ है कि पश्चिम एशिया अब सिर्फ ईरान बनाम इजरायल की कहानी नहीं रह गया है. यहां एक नया सामरिक ढांचा आकार ले रहा है, जिसमें परमाणु ऊर्जा, सुरक्षा साझेदारी, आर्थिक निवेश और कूटनीति एक साथ जुड़ रहे हैं.
अगर यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो आने वाले वर्षों में पश्चिम एशिया का शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है. और उसी बदलाव के केंद्र में होंगे चार नाम - अमेरिका, सऊदी अरब, यूएई और इजरायल. दूसरी तरफ ईरान, जो इस पूरे समीकरण को अपने खिलाफ बनती नई घेराबंदी के तौर पर देख सकता है.