अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ संकेत दिए हैं कि अगर ईरान पीछे नहीं हटता तो अमेरिका और बड़े सैन्य हमले कर सकता है. लेकिन इसी बीच कई रक्षा और पश्चिम एशिया मामलों के एक्सपर्ट्स ट्रंप को चेतावनी दे रहे हैं कि अगर अमेरिका ने ईरान में लंबा सैन्य अभियान शुरू किया, तो उसका अंजाम वियतनाम युद्ध जैसा हो सकता है.
मिडिल ईस्ट मामलों के जानकार और गल्फ में एक बड़े मीडिया संस्थान के संस्थापकों में शामिल डेविड हर्स्ट का कहना है कि ईरान सिर्फ अपनी सीमाओं के भीतर लड़ने वाला देश नहीं है. उसके पास पूरे पश्चिम एशिया में ऐसे सहयोगी और नेटवर्क हैं, जो जंग का दायरा कई देशों तक फैला सकते हैं. यही वजह है कि हर नए हमले के साथ यह संघर्ष और खौफनाक होता जा रहा है.
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ईरान पहले ही साफ कर चुका है कि उस पर दोबारा हमला हुआ तो वह सिर्फ अपने इलाके तक जवाब सीमित नहीं रखेगा. हाल के दिनों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए हमलों में कई अमेरिकी सैनिक घायल हुए हैं. वहीं, खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा भी अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है.
पश्चिम एशिया में फैल जाएगी ईरान की जंग
डेविड हर्स्ट का मानना है कि अमेरिका की सबसे बड़ी मुश्किल सिर्फ ईरान की सेना नहीं, बल्कि उसका 'असममित युद्ध' का मॉडल है. यानी ईरान ने खाड़ी के कई मुल्कों में शिया समूह स्थापित कर रखे हैं जिसे वो हथियार मुहैया कराता है. सस्ते ड्रोन, मिसाइलें और समुद्री मार्गों पर दबाव बनाकर ईरान अपेक्षाकृत कम लागत में अमेरिका और उसके सहयोगियों को बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है. यही वजह है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर जैसे अहम समुद्री रास्ते लगातार वैश्विक चिंता का कारण बने हुए हैं.
अगर यह जंग और बढ़ती है तो असर सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा. तेल की कीमतों, वैश्विक शिपिंग और दुनिया की सप्लाई चेन पर इसका सीधा असर पड़ सकता है. कई जहाज पहले ही अपने रूट बदल चुके हैं, जबकि ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ने लगी है.
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दूसरी तरफ, अमेरिका के भीतर भी इस युद्ध को लेकर समर्थन पहले जैसा नहीं दिख रहा. हालिया सर्वे बताते हैं कि बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक इस संघर्ष को लंबा खींचने के पक्ष में नहीं हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा चला और अमेरिकी सैनिकों की मौत का आंकड़ा बढ़ा, तो इसका असर ट्रंप की घरेलू राजनीति पर भी पड़ सकता है.
अमेरिका का कैसे होगा वियतनाम जैसा हाल?
इसी संदर्भ में विशेषज्ञ वियतनाम युद्ध का उदाहरण देते हैं. उनका कहना है कि अमेरिका ने वियतनाम में भी शुरुआत में अपनी सैन्य ताकत पर भरोसा किया था, लेकिन धीरे-धीरे वह एक लंबे और महंगे युद्ध में फंस गया. आखिरकार सैन्य शक्ति के बावजूद उसे पीछे हटना पड़ा. विशेषज्ञों का तर्क है कि ईरान में भी ऐसा ही खतरा मौजूद है, क्योंकि यहां सिर्फ बमबारी से हालात नहीं बदलेंगे.
यही वजह है कि कई रणनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर ट्रंप सैन्य दबाव के साथ-साथ कूटनीतिक रास्ते को पूरी तरह छोड़ देते हैं और जमीनी युद्ध की ओर बढ़ते हैं, तो यह संघर्ष अमेरिका के लिए महंगा, लंबा और राजनीतिक रूप से नुकसानदायक साबित हो सकता है. उनके मुताबिक, ईरान के साथ टकराव जितना आसान दिखाई देता है, असल में उतना ही मुश्किल और उलझा हुआ है.