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ईरान जंग का थर्ड चैप्टर! फुल एंड फाइनल करने के मूड में ट्रंप... जंग, समझौता फिर जंग की पूरी टाइमलाइन

ईरान जंग अब तीसरे और सबसे खतरनाक दौर में पहुंच चुकी है. इस बार निशाने पर सिर्फ परमाणु ठिकाने नहीं, बल्कि होर्मुज स्ट्रेट और ईरान की समुद्री ताकत है. ट्रंप ने इजरायल को पीछे छोड़ खुद कमान संभाल ली है. सवाल यही है कि क्या यह ऑपरेशन ईरान की ताकत खत्म करने की आखिरी कोशिश है, या फिर पश्चिम एशिया में और बड़ी जंग की शुरुआत?

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अमेरिका-ईरान के बीच भीषण हुई जंग!. (photo: ITG)
अमेरिका-ईरान के बीच भीषण हुई जंग!. (photo: ITG)

पश्चिम एशिया एक बार फिर दुनिया की सबसे बड़ी जंग का मैदान बना हुआ है. लेकिन इस बार तस्वीर पहले जैसी नहीं है. जिस इजरायल ने ईरान के खिलाफ सबसे आगे खड़े होकर हमला किया था, वही अब किनारे दिखाई दे रहा है. इस बार कमान पूरी तरह अमेरिका के हाथ में है. व्हाइट हाउस से लेकर पेंटागन तक हर फैसला सीधे डोनाल्ड ट्रंप ले रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि ट्रंप अब सिर्फ ईरान को जवाब नहीं देना चाहते, बल्कि उसकी सैन्य, आर्थिक और रणनीतिक ताकत को हमेशा के लिए तोड़ देना चाहते हैं. वह इस तरह की धमकियां कई बार दे चुके हैं और जंग के थर्ड चैप्टर में यही ट्रंप का मकसद है.

मसलन, अगर पहले चैप्टर का मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाना था, दूसरे चैप्टर का लक्ष्य उसकी राजनीतिक और सैन्य कमान को खत्म करना था, तो तीसरे चैप्टर का मकसद उससे भी बड़ा दिखाई दे रहा है. अब लड़ाई किसी एक शहर, किसी एक परमाणु केंद्र या किसी एक नेता तक सीमित नहीं रह गई.

यह भी पढ़ें: ईरान-अमेरिका में अब 'होर्मुज के भीतर होर्मुज' की लड़ाई, क्या बनेगा जंग का अगला अखाड़ा?

अब जंग उस जगह पहुंच गई है जहां से दुनिया की ऊर्जा अर्थव्यवस्था चलती है - होर्मुज स्ट्रेट. ताजा जंग या कहें कि जंग का थर्ड चैप्टर अब इसी के कंट्रोल को लेकर है.

फर्स्ट चैप्टर: जब पहली बार खुलकर भिड़े ईरान और इजरायल

इस कहानी की शुरुआत जून 2025 से होती है. उस समय इजरायल ने अचानक ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमला कर दिया था. नतांज, फोर्डो और इस्फहान जैसे परमाणु केंद्र निशाने पर थे. इजरायल का दावा था कि अगर अभी कार्रवाई नहीं की गई तो ईरान बहुत जल्द परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल कर लेगा.

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ईरान ने कुछ ही घंटों में जवाब दिया. पहली बार उसने बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन सीधे इजरायल की तरफ दाग दिए. ईरान ने तेल अवीव और यरुशलम तक इजरायल के कई शहरों में भारी तबाही मचाई. पूरे पश्चिम एशिया में बड़े जंग की कवायद शुरू हो गई थी.

लेकिन असली मोड़ तब आया जब अमेरिका ने सीधे मैदान में उतरने का फैसला किया. 22 जून 2025 को अमेरिकी B-2 स्पिरिट स्टील्थ बॉम्बरों ने "ऑपरेशन मिडनाइट हैमर" शुरू की. जमीन के सैकड़ों फीट नीचे बने ईरानी परमाणु बंकरों पर बंकर बस्टर बम गिराए गए. इन्हें दुनिया के सबसे ताकतवर बमों में गिना जाता है. अमेरिका ने पहली बार इसका इस्तेमाल किसी जंग में किया था.

करीब 12 दिन तक मिसाइलें, ड्रोन और हवाई हमले चलते रहे. आखिरकार 24 जून को दोनों पक्ष युद्धविराम पर राजी हुए. लेकिन यह सिर्फ एक विराम था, जंग का अंत नहीं था. यहां से अमेरिका-इजरायल ने अपनी रणनीति बदली. ईरान में बड़े स्तर पर विरोध-प्रदर्शनों को हवा दी. भारी संख्या में सत्ता विरोधी प्रदर्शनकारी मारे गए. अमेरिका ने इसे ही आधार बनाया और इजरायल संग ईरान के खिलाफ जंग में कूद पड़ा.

सेकंड चैप्टर: जब जंग परमाणु प्रोग्राम और रेजीम चेंज पर टिक गई

हमलों का पहला दौर खत्म होने के बाद करीब आठ महीने तक दोनों पक्ष अपनी-अपनी तैयारी करते रहे. इस दौरान ईरान ने मिसाइल उत्पादन बढ़ाया, अमेरिका ने खाड़ी में अपने युद्धपोत बढ़ा दिए और इजरायल लगातार नई सैन्य रणनीति पर काम करता रहा. अमेरिका हिंद महासागर से लेकर फारस की खाड़ी तक में अपने डिस्ट्रॉयर-युद्धपोत उतार दिए. भारी संख्या में फाइटर जेट्स की तैनाती कर दी और फिर शुरू हुई एक बड़ी जंग.

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28 फरवरी 2026 की सुबह पूरी दुनिया चौंक गई. अमेरिका और इजरायल ने मिलकर तेहरान पर ऐसा हमला किया, जिसने पूरे युद्ध की दिशा बदल दी. इस हमले में ईरान की लीडरशिप को निशाना बनाया गया. आईआरजीसी के दर्जनों कमांडर और अधिकारी मारे गए. इसके बाद पूरे देश में सत्ता संकट पैदा हो गया. यह जंग सिर्फ परमाणु या बैलिस्टिक मिसाइलों की नहीं, बल्कि यह रेजीम चेंज की लड़ाई बन गई.

यह भी पढ़ें: गाजा-लेबनान-सीरिया से इजरायल की 'नो रिटर्न' पॉलिसी! क्या ईरान से फिर होगी जंग

ईरान ने जवाब में इजरायल, खाड़ी देशों और अमेरिकी ठिकानों की तरफ लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले किए. लेबनान में हिज्बुल्लाह सक्रिय हो गया. इराक के शिया मिलिशिया और यमन के हूती भी खुलकर मैदान में उतरने लगे. ऐसा लगने लगा कि पूरा पश्चिम एशिया एक साथ आग की लपटों में घिर जाएगी. तेल की कीमतें आसमान पर पहुंचत गईं. शिपिंग कंपनियों ने खाड़ी में जहाज भेजने पर रोक लगाने लगीं. दुनिया भर के शेयर बाजारों में गिरावट आई. लाखों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए.

लगातार कई महीनों तक चली इस लड़ाई के बाद 17 जून को इस्लामाबाद की बैठकों के बाद युद्धविराम का ऐलान किया गया. 14 सूत्रीय समझौता तैयार हुआ. अमेरिका-ईरान ने एक MoU पर साइन किया. दोनों पक्षों ने हमले रोकने और बातचीत शुरू करने पर सहमति जताई. लेकिन यह शांति भी सिर्फ कागजों तक सीमित रही. इस सीजफायर के बाद भी इजरायल लेबनान में लगातार हमले करता रहा. ईरान ने फिर भी होर्मुज खोलने से इनकार कर दिया. बड़ी जद्दोजहद के बाद आखिरकार ईरान होर्मुज खोलने पर राजी हो गया और स्ट्रेट को खोल दिया गया लेकिन ईरान ने यहां एक बड़ी शर्त रख दी.

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ईरान चाहता है कि होर्मुज स्ट्रेट पर उसका कंट्रोल हो. जहाज स्ट्रेट से गुजरने के लिए फीस दें. ईरान अपनी इस योजना पर अब भी कायम है. ट्रंप ने भी ईरान को नई धमकियां देना शुरू कर दी. हालात खराब होते गए. मामला यहां तक पहुंच गया कि अमेरिका के संरक्षण में ओमान और यूनाइटेड नेशन ने मिलकर होर्मुज स्ट्रेट में एक और "होर्मुज" बना दिया.

मसलन, ओमान और यूनाइटेड नेशन ने मिलकर एक शिपिंग कॉरिडोर स्थापित किया. जहाज भी स्ट्रेट से गुजर रहे थे लेकिन ईरान को यह पसंद नहीं आया. उसने साफतौर पर ये कह दिया कि जो कोई भी जहाज बिना ईरान की इजाजत के स्ट्रेट से गुजरने की कोशिश करेगा उसे कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा.

थर्ड चैप्टर: अब ट्रंप का असली गेम शुरू

इस जुलाई महीने में तस्वीर पूरी तरह बदल गई. इस बार न तो इजरायल सबसे आगे था और न ही युद्ध का केंद्र तेहरान का परमाणु कार्यक्रम. अब उनका निशाना था - होर्मुज स्ट्रेट. यह दुनिया का सबसे अहम समुद्री रास्ता है. वैश्विक तेल सप्लाई का करीब पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. अगर यह बंद हो जाए तो सिर्फ पश्चिम एशिया नहीं, पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल जाती है. पिछले कुछ महीनों में दुनिया ने बकायदा यह महसूस भी किया.

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दूसरे चरण के बाद ईरान ने इसी रास्ते पर दबाव बनाना शुरू कर दिया. कई टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई. बीमा कंपनियों ने प्रीमियम कई गुना बढ़ा दिए. अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां वैकल्पिक रास्ते तलाशने लगीं. ट्रंप समझ चुके थे कि जब तक होर्मुज ईरान के दबाव में रहेगा, तब तक जंग का कोई स्थायी नतीजा नहीं निकलेगा. इस बीच बयानबाजी चल रही थी, तभी ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में तीन कॉमर्शियल जहाजों पर हमले कर दिए. यह हमले इसलिए किए गए क्योंकि तीनों जहाज ने कथित रूप से ईरान की शर्तों को नजरअंदाज कर दिया था.

जवाब में 7 जुलाई को अमेरिका ने ईरान पर फिर से कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए. इसके तुरंत बाद अमेरिकी नौसेना, एयरफोर्स और ड्रोन यूनिट्स ने संयुक्त अभियान शुरू किया. CENTCOM ने ईरान के बंदर अब्बास, ग्रेटर तुंब, क़ेश्म, खार्ग, चाबहार, अबू मूसा समेत ईरान के कई द्वीपों पर बड़े हमले किए. ईरान के ये द्वीप शहर अब भी अमेरिकी सेना के निशाने पर हैं. सैकड़ों टारगेट्स पर अटैक किए जा रहे हैं.

लेकिन इस बार अमेरिका सिर्फ बमबारी नहीं कर रहा. वह ईरान की पूरी समुद्री ताकत को खत्म करने की कोशिश कर रहा है. स्पीड बोट्स, तटीय मिसाइल सिस्सटम, रडार सिस्टम, ड्रोन बेस, एयर डिफेंस नेटवर्क, कमांड सेंटर - एक-एक करके सभी पर हमले हो रहे हैं. इस ताजा हमले को लेकर अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि यह ईरान की सैन्य ताकत को तोड़ने की कोशिश है. अमेरिका कह चुका है कि जब तक होर्मुज पूरी तरह सुरक्षित नहीं होगा, तब तक ऑपरेशन नहीं रुकेगा.

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राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप क्या चाहते हैं?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ताजा जंग से क्या चाहते हैं, यह बात छिपी नहीं है. ट्रंप सिर्फ जहाजों की सुरक्षा नहीं चाहते. अगर तीनों चैप्टर को जोड़कर देखें तो तस्वीर अलग दिखाई देती है. पहले चरण में परमाणु क्षमता कमजोर करने की कोशिश हुई. दूसरे चरण में राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व पर हमला हुआ, और अब तीसरे चरण में ईरान की आर्थिक ताकत पर सीधा प्रहार हो रहा है. यानी ट्रंप की रणनीति सिर्फ युद्ध जीतने की नहीं, बल्कि ईरान की उस क्षमता को खत्म करने की दिखती है जिससे वह भविष्य में क्षेत्रीय शक्ति बना रहे.

ईरान भी पीछे हटने के मूड में नहीं

लेकिन दूसरी तरफ ईरान भी झुकने के मूड में नहीं दिख रहा. उसने बहरीन और कुवैत-जॉर्डन समेत कई खाड़ी मुल्कों को अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया. पांचवें बेड़े के मुख्यालय के आसपास मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें सामने आईं. IRGC भी लगातार कह रहा है कि जब तक अमेरिकी दबाव खत्म नहीं होगा, तब तक होर्मुज पर उसका नियंत्रण बना रहेगा. इसके साथ ही हूती, इराकी मिलिशिया और दूसरे ईरान समर्थक गुट भी अमेरिकी हितों को निशाना बनाने की धमकियां दे रहे हैं.

हालांकि, अब तक इस ताजा जंग में कोई भी ईरान समर्थित समूह शामिल नहीं हुए हैं. अमेरिका की तरफ से भी इजरायल इस ताजा जंग का हिस्सा नहीं है. गौर करने वाली बात है कि यह लड़ाई सिर्फ दो मुल्कों अमेरिका-ईरान के बीच है, लेकिन ईरान डायरेक्ट अमेरिका पर हमले नहीं कर रहा है. अमेरिका के सैन्य ठिकाने खाड़ी मुल्कों में हैं, जो ईरान के निशाने पर हैं. ईरान लगातार इन ठिकानों पर मिसाइलें बरसा रहा है. अमेरिका को अरबों डॉलर का नुकसान भी उठाना पड़ा है.

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ईरान ने भी हमलों में अमेरिका के कई फाइटर जेट्स, THAAD डिफेंस सिस्टम और कतर में स्थित उसके बड़े रडार सिस्टम समेत बड़ी संख्या में सैन्य अड्डों और विमानों को तबाह कर दिया. यही हालात एक बार फिर नजर आ रहे हैं. अमेरिका जैसे ही ईरान में हमले कर रहा है, उसके तुरंत बाद ही खाड़ी मुल्कों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइल-ड्रोन दाग रहा है. इससे अमेरिका को भारी नुकसान तो हो ही रहा है, साथ ही खाड़ी मुल्कों के लिए भी बड़ा संकट पैदा हो गया है. इससे उसकी चमक-धमक और आर्थिक हालात पर असर पड़ रहा है. 

इजरायल आखिर ताजा जंग से गायब क्यों है?

तीसरे चैप्टर की सबसे दिलचस्प बात ये है कि इस ताजा जंग में इजरायल अब तक शामिल नहीं है. जिस इजरायल ने पहले दोनों दौर में सबसे आगे रहकर हमला किया था, वह अब लगभग साइडलाइन दिखाई देता है. यही वजह है कि अब यह लड़ाई "इजरायल बनाम ईरान" नहीं बल्कि "अमेरिका बनाम ईरान" हो गई है.

अब पूरी दुनिया की नजर सिर्फ एक सवाल पर टिकी है. क्या ट्रंप सच में इस जंग को "फुल एंड फाइनल" अंजाम तक पहुंचाना चाहते हैं? अगर ऐसा होता है तो अगला निशाना सिर्फ सैन्य ठिकाने नहीं, बल्कि ईरान के पॉवर प्लांट, पुल, बंदरगाहों पर और बड़े हमले और ऊर्जा ढांचा भी निशाने पर हो सकते हैं. दूसरी तरफ अगर ईरान होर्मुज पर अपनी पकड़ बनाए रखता है तो दुनिया एक बड़े ऊर्जा संकट की तरफ बढ़ सकती है. अगर आने वाले दिनों में हालात नहीं बदले, तो जंग का यह तीसरा चैप्टर पहले की दोनों जंगों से कहीं ज्यादा लंबा, ज्यादा महंगा और ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है.

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