
दुनिया की सबसे अहम समुद्री लाइफलाइन एक बार फिर युद्ध के केंद्र में आ गई है. पिछले तीन दिनों से ईरान के दक्षिणी तटीय इलाकों में लगातार धमाकों की खबरें सामने आ रही हैं. बुशेहर, बंदर अब्बास, क़ेश्म, जास्क, मूसा और चाबहार जैसे पोर्ट सिटीज में विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं. अमेरिका ने दावा किया कि उसने ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई की है, जबकि तेहरान ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताते हुए कड़ा जवाब देने की चेतावनी दी है.
लेकिन इस बार लड़ाई सिर्फ मिसाइलों और एयर स्ट्राइक की नहीं है. असली जंग उस समुद्री रास्ते पर शुरू हो चुकी है, जहां से दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है. यह रास्ता है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज. अब इसी होर्मुज के भीतर एक नया 'होर्मुज' तैयार हो गया है, जहां ईरान अपने नियम लागू करना चाहता है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत एक अलग कॉरिडोर चलाने की कोशिश कर रहे हैं. यही वजह है कि यह पूरी तरह "होर्मुज के अंदर बने होर्मुज" की लड़ाई बन गई है.
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आखिर तीन दिन में ऐसा क्या हुआ?
अमेरिकी सेना ने बुधवार रात ईरान के दक्षिणी हिस्से में स्थित सैन्य ढांचे पर बड़े हवाई हमले किए. अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, पहले दिन करीब 80 सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया. इनमें एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल लॉन्च साइट्स और नौसैनिक ठिकाने शामिल थे.

इसके अगले दिन भी कार्रवाई जारी रही और करीब 90 अतिरिक्त ठिकानों पर हमले किए गए. अमेरिका का कहना है कि यह जवाब उन हमलों का था, जिनमें अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाया गया था. तीसरे दिन फिर दक्षिणी ईरान में धमाकों की खबरें आने लगीं. हालांकि, किसी पक्ष ने ताजा हमलों की आधिकारिक जिम्मेदारी नहीं ली, लेकिन पूरे इलाके में सैन्य गतिविधियां तेज हो गईं.
आखिर होर्मुज इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का सबसे रणनीतिक समुद्री मार्ग माना जाता है. यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है. हर दिन लाखों बैरल कच्चा तेल, एलएनजी और अरबों डॉलर का सामान इसी रास्ते से दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचता है.
सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, कतर, इराक और ईरान जैसे ऊर्जा उत्पादक देशों का बड़ा निर्यात इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर करता है. यानी अगर होर्मुज में जहाज रुकते हैं तो सिर्फ पश्चिम एशिया नहीं, बल्कि एशिया, यूरोप और अमेरिका तक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है.
अब 'होर्मुज के अंदर होर्मुज' कैसे बन गया?
यही इस पूरे संकट का सबसे बड़ा सवाल है. ईरान का कहना है कि स्ट्रेट उसकी सुरक्षा सीमा के बेहद करीब है. इसलिए वहां से गुजरने वाले जहाजों को उसके तय किए गए सुरक्षित रास्तों का ही इस्तेमाल करना होगा. तेहरान ने संकेत दिया कि भविष्य में इन मार्गों पर नियंत्रण, निगरानी और शुल्क लगाने का अधिकार भी उसी के पास रहेगा. यानी ईरान चाहता है कि जहाज उसी "ईरानी कॉरिडोर" से गुजरें, जिसे वह सुरक्षित घोषित करे.

दूसरी तरफ अमेरिका, ओमान और यूनाइटेड नेशन की अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) ने एक वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कॉरिडोर तैयार किया है. इस मार्ग पर किसी तरह का टोल नहीं होगा और जहाज अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत आवाजाही करेंगे. यहां तक कि जो जहाज होर्मुज में फंसे हैं, IMO द्वारा उसे ओमान के समर्थन से बने शिपिंग कॉरिडोर से पास दिया जा रहा है और ईरान इसके विरोध में है. इसी वजह से जहाजों पर हमले भी किए हैं. यहीं से असली टकराव शुरू हुआ. एक तरफ ईरान का "अधिकृत मार्ग". दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय "नो-टोल कॉरिडोर". यानी एक ही स्ट्रेट में दो अलग-अलग नियम लागू करने की कोशिश हो रही है.
टोल को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?
जंग के दौरान कुछ समय के लिए ऐसी व्यवस्था बनी थी कि व्यापारिक जहाजों से कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा. लेकिन ईरान ने बाद में संकेत दिया कि अगर सुरक्षा की जिम्मेदारी उसकी होगी तो शुल्क वसूलने का अधिकार भी उसी के पास होना चाहिए. अमेरिका, यूरोपीय देशों और खाड़ी के सहयोगी देशों ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया. ओमान ने साफ कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय कॉरिडोर से गुजरने वाले जहाजों से कोई टोल नहीं लिया जाएगा. यहीं से यह विवाद सिर्फ समुद्री सुरक्षा का नहीं, बल्कि समुद्री संप्रभुता का भी बन गया.

ईरान की रणनीति सिर्फ जहाज रोकने तक सीमित नहीं है. तेहरान चाहता है कि पूरी दुनिया यह माने कि होर्मुज की सुरक्षा का अंतिम फैसला वही करेगा. ईरानी सैन्य अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर कोई जहाज उसके तय मार्गों से हटकर जाएगा या बिना इजाजत दूसरे कॉरिडोर का इस्तेमाल करेगा तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है. ईरान का तर्क है कि स्ट्रेट उसके राष्ट्रीय सुरक्षा क्षेत्र का हिस्सा है और बाहरी सैन्य हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा.
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अमेरिका की रणनीति क्या है?
अमेरिका का कहना है कि होर्मुज किसी एक देश की संपत्ति नहीं है. ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन का दावा है कि वह सिर्फ अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुरक्षित रखना चाहता है. अमेरिकी नौसेना लगातार इस इलाके में अपने युद्धपोतों और निगरानी विमानों की तैनाती बढ़ा रही है. CENTCOM का कहना है कि हाल के महीनों में उसने सैकड़ों व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित समुद्री मार्ग उपलब्ध कराया है. यानी अमेरिका किसी भी कीमत पर यह संदेश देना चाहता है कि वैश्विक व्यापार ईरान की शर्तों पर नहीं चलेगा.
युद्ध शुरू होने से पहले हर दिन बड़ी संख्या में व्यापारिक जहाज होर्मुज से गुजरते थे. संघर्ष के दौरान यह संख्या तेजी से गिर गई. कुछ समय के युद्धविराम के बाद रोजाना करीब 30 से 35 जहाज फिर गुजरने लगे. लेकिन अब नए हमलों और बढ़ते तनाव के बाद यह संख्या फिर घटकर लगभग दो दर्जन के आसपास पहुंच गई है. जहाज मालिकों के लिए सबसे बड़ी समस्या सिर्फ मिसाइलों का खतरा नहीं है. बीमा प्रीमियम तेजी से बढ़ रहे हैं. फ्रेट कॉस्ट बढ़ रही है. कई शिपिंग कंपनियां वैकल्पिक रास्ते तलाश रही हैं. यानी समुद्री व्यापार पहले ही इस तनाव की कीमत चुकाने लगा है.

होर्मुज को लेकर लड़ाई छिड़ी तो दुनिया के लिए क्या खतरे?
अगर होर्मुज में तनाव और बढ़ता है तो इसका असर सिर्फ ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा. तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं. भारत समेत एशिया की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. वैश्विक महंगाई फिर बढ़ सकती है. शिपिंग कंपनियों की लागत बढ़ेगी. बीमा कंपनियां अतिरिक्त जोखिम शुल्क लेंगी और इसका असर दुनिया भर के बाजारों तक पहुंचेगा.
फिलहाल दोनों पक्ष अपने रुख पर कायम हैं. ईरान कह रहा है कि होर्मुज में वही नियम तय करेगा. अमेरिका कह रहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून से कोई समझौता नहीं होगा. यानी अब लड़ाई सिर्फ मिसाइलों और परमाणु बम की नहीं, बल्कि समुद्री नियंत्रण की भी है. अगर किसी व्यापारिक जहाज को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए, तो यह टकराव पूरे क्षेत्र को एक बड़े युद्ध की तरफ धकेल सकता है.