1957 में नजफ की अपनी पहली यात्रा के 69 साल बाद अली खामेनेई आज फिर उस शहर में लौटे हैं जहां एक युवा मदरसा छात्र के तौर पर उन्होंने महान आलिमों से शिक्षा ली थी. खामेनेई नजफ में पढ़ना चाहते थे. लेकिन इतिहास ने एक अलग मोड़ ले लिया. उनके पिता की इच्छा की वजह से उन्हें वहां से 1958 में लौटना पड़ा. 1958 में वे ईरान के कौम शहर में सेटल हो गए और पढ़ने लगे.
रजा शाह के दौर में उन्हें जेल में डाल दिया गया और उन पर यात्रा की पाबंदियां लगा दी गईं. इसके बाद ईरान-इराक युद्ध हुआ और फिर कई सालों तक क्षेत्रीय तनाव, सुरक्षा संबंधी चिंताएं और राजनीतिक हालात ऐसे रहे कि उन्हें अपनी जिंदगी में नजफ़ और कर्बला के पवित्र स्थलों पर दोबारा जाने का मौका कभी नहीं मिला.
आज 69 साल बाद उनका पवित्र पार्थिव शरीर नजफ में इमाम अली के पवित्र मजार में पहुंचा है.
यह उस शहर में उनकी एक बेहद प्रतीकात्मक वापसी थी जो दशकों से उनके दिल के बहुत करीब रहा था.
अली खामेनेई का जनाजा जब इराक की धरती पर पहुंचा तो यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं रह गई. नजफ और करबला की गलियों में उमड़ी भीड़ के बीच यह दृश्य शिया इस्लाम के उस लंबे इतिहास को फिर से जीवित करता दिखाई दिया, जो निरंकुश सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध, शहादत और बगावत की परंपरा से जुड़ा रहा है.
आज नजफ की गलियां 'आ हुसैन' के सदाओं से गूंज रही है. शिया मुसलमानों के सबसे बड़े धर्म गुरु अली खामेनेई के जनाजे में पूरा शहर उमड़ पड़ा है. नजफ से उनकी बॉडी कर्बला में ले जाई जाएगी.
नजफ वह शहर है जहां पहले शिया इमाम और पैगंबर मोहम्मद के दामाद हजरत अली की दरगाह मौजूद है. वहीं कर्बला वह जमीन है जहां 680 ईस्वी में इमाम हुसैन और उनके साथियों ने उमय्यद खलीफा यजीद की सत्ता के सामने झुकने से इनकार करते हुए शहादत दी थी. शिया समुदाय के लिए ये दोनों शहर केवल धार्मिक केंद्र नहीं बल्कि अन्याय के खिलाफ संघर्ष के प्रतीक हैं.
खामेनेई की बॉडी को इन दोनों शहरों में ले जाकर ईरान दुनिया को यही संदेश देने की कोशिश कर रहा है और संदेश दे रहा है कि अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध जारी रहेगा.
खामेनेई के पार्थिव शरीर को नजफ और करबला ले जाने का फैसला महज श्रद्धांजलि का कार्यक्रम नहीं माना जा रहा. इसे एक राजनीतिक और वैचारिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है. ईरान की सत्ता लंबे समय से खुद को कर्बला की परंपरा का उत्तराधिकारी बताती रही ह. उसके राजनीतिक विमर्श में अक्सर अमेरिका, इजरायल और पश्चिमी शक्तियों को अन्यायकारी ताकतों के रूप में पेश किया जाता है. जबकि ईरानी खुद को हुसैन द्वारा अपनाए गए प्रतिरोध के रास्ते पर चलने वाला बताता है.
एक्सपर्ट के अनुसार ऐसी शवयात्राएं सदियों से प्रतिरोध की याद दिलाती रही हैं.
चैथम हाउस, मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका प्रोग्राम की डायरेक्टर सनम वकील कहती हैं, "यह अंतिम संस्कार असल में सत्ता की वैधता के बारे में है. यह शासन के बने रहने और उसकी मज़बूती, और धार्मिक वैधता के बारे में है, खासकर इन दो युद्धों के बाद... ये कार्यक्रम तेहरान में होंगे... लेकिन इन्हें इराक के पवित्र शहरों में भी ले जाया जाएगा, जो दिखाता है कि ईरान इस समय न सिर्फ़ उनके नेतृत्व के लिए, बल्कि व्यापक शिया नेतृत्व के लिए भी कितना अहम है. "
उन्होंने कहा कि ताकत और एकता के बार-बार दिखने वाले संकेतों के अलावा इन संदेशों से पता चलता है कि ईरान ने अली खामेनेई की विरासत को रेज़िस्टेंस और रेज़िलिएंस से जोड़ने का फ़ैसला किया है.
तेहरान के पत्रकार रेज़ा सयाह कहते हैं कि खामेनेई की विरासत को 'द लीडर ऑफ़ द रेजिस्टेंस मूवमेंट' और 'द लीडर इन द फाइट अगेंस्ट U.S. इंपीरियलिज़्म' के रूप में नई पहचान मिल रही है. कई मायनों में यह एक नई पहचान है जो अयातुल्ला अली खामेनेई के लिए बन रही है. उन्हें न केवल ईरान के लीडर के रूप में, बल्कि उस व्यक्ति के रूप में भी सम्मान और आदर दिया जा रहा है जिसने दो न्यूक्लियर ताकतों का सामना किया.
खामेनेई ने अपने तीन दशक से अधिक लंबे नेतृत्वकाल में "प्रतिरोध" को ईरानी विदेश नीति का केंद्रीय तत्व बनाया. लेबनान में हिजबुल्लाह, गाजा में हमास और यमन में हूती आंदोलन जैसे समूहों को ईरान ने जिस "एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस" का हिस्सा बताया, वो विरोध की परंपरा से ही निकली है.
इसलिए जब उनका जनाजा नजफ और कर्बला पहुंचा तो समर्थकों ने इसे केवल एक नेता की अंतिम यात्रा नहीं बल्कि प्रतिरोध की परंपरा के रूस में प्रस्तुत किया.
विशेषज्ञों का मानना है कि कर्बला एक ऐतिहासिक घटना भर नहीं है. यह एक जीवंत प्रतीक है जो हर दौर में सत्ता और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है.
फरवरी 2026 में अमेरिका-इजराइल हमलों में मारे गए खामेनेई की अंतिम यात्रा ईरान में शुरू हुई थी, लेकिन नजफ-कर्बला का चरण इसे वैश्विक शिया एकजुटता का मंच बना रहा है. नजफ एयरपोर्ट पर पहुंचने पर इराकी प्रधानमंत्री और ईरानी अधिकारियों की मौजूदगी में औपचारिक स्वागत हुआ. वहां से शवयात्रा इमाम अली की मजार की ओर बढ़ी, जहां हजारों शिया श्रद्धालु और मिलिशिया सदस्य जमा हुए. अब कर्बला में इमाम हुसैन की मजार पर जनाजा होगा.