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TMC किसकी ममता की या बागियों की? बात कोर्ट तक जाएगी, जानिए किसका दावा लीगली मजबूत

ममता बनर्जी ने बंगला की सत्ता ही नहीं गंवाई बल्कि विधायक और सांसद भी साथ छोड़ गए हैं. रविवार को 20 टीएमसी सांसदों ने अलग गुट बनाकर एनसीपीआई में विलय कर दिया है और आगे की लड़ाई टीएमसी पर कब्जे की होगी, जिसके संकेत बागी सांसदों ने दे दिए हैं?

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टीएमसी पर ममता बनर्जी या काकोली घोष किसका दावा मजबूत (Photo-ITG)
टीएमसी पर ममता बनर्जी या काकोली घोष किसका दावा मजबूत (Photo-ITG)

पश्चिम बंगाल की सियासत में ममता बनर्जी का सियासी किला भरभराकर गिर गया है. काकोली घोष और सुदीप बंदोपाध्याय जैसे वरिष्ठ नेताओं की अगुवाई में टीएमसी के 20 लोकसभा सांसदों ने ममता बनर्जी से अलग अपनी सियासी राह चुन ली है. टीएमसी के बागी सांसदों भले ही अपना सियासी ठिकाना एनसीपीआई को बनाया हो, लेकिन यहीं से ममता बनर्जी की असली टेंशन शुरू हो रही है. 
 
टीएमसी के 20 सांसदों की बागवत के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बागी सांसद आने वाले समय में ममता बनर्जी से टीएमसी का नाम और पार्टी का चुनाव चिह्न भी छीन लेंगे?महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे बनाम एकनाथ शिंदे) और एनसीपी (शरद पवार बनाम अजीत पवार) के मामलों देखा जा चुका है. अब वैसी ही स्थिति ममता बनर्जी की पार्टी में खड़ी हो सकती है. 

टीएमसी के बागी गुट में शामिल सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा कि असली टीएमसी कौन है, इसका फैसला अदालत करेगी.  उन्होंने कहा कि हम नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी में विलय कर चुके हैं. नियम के तहत जब आप पार्टी के 2/3 सदस्यों के साथ अलग होते हैं, तो आप पहले ही दिन उस पार्टी के नाम की मांग नहीं कर सकते. जुलाई में टीएमसी के नाम और निशान की मांग करेंगे, क्योंकि हमारे पास 2/3 बहुमत है. मतलब साफ है कि टीएमसी की लड़ाई कोर्ट के जरिए होगी? 

टीएमसी पर दावे की लड़ाई शुरू होगी
टीएमसी के बागी सांसदों ने स्पीकर से लोकसभा में अलग बैठने की जगह देने की मांग की है. टीएमसी के 28 सांसद हैं, जिसमें से 20 सांसद अलग हो गए हैं. ऐसे में बागी सांसदों को NDA को समर्थन देने की वजह से सत्तापक्ष के पास सिटिंग मिल सकती है. वहीं, ममता बनर्जी टीएमसी पर अपना दावा जता रही हैं. राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने रविवार को ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक पत्र भेजा और बागी गुट को मान्यता नहीं देने की मांग की. 

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काकोली घोष ने रव‍िवार को ऐलान क‍िया क‍ि वह 20 सांसदों के साथ एनसीपी में विलय कर रही हैं,जब उनके पास दो त‍िहाई सांसद थे, 60 से ज्‍यादा व‍िधायकों का समर्थन है, तो टीएमसी पर ही दावा क्‍यों नहीं ठोंका? कानून भी कहता है क‍ि अगर क‍िसी भी पार्टी के दो त‍िहाई सांसद न‍िकल जाएं तो वे पार्टी तोड़ सकते हैं और पार्टी पर वो कब्‍जा भी कर सकते हैं.

इसका जवाब सुदीप बंद्योपाध्याय के उत्तर में छिपा है, उन्होंने कहा कि जब दो-तिहाई सांसदों के साथ अलग होते हैं तो पहले दिन मूल पार्टी पर अपना दावा नहीं कर सकते हैं. इसीलिए एनसीपीआई में विलय का रास्ता चुना. अब आगे की लड़ाई जुलाई में होगी, जब टीएमसी के बागी नेता पार्टी और चुनाव चिन्ह पर दावा जताएंगे? 

क्या बागी ममता बनर्जी से पार्टी छीन सकते हैं?
टीएमसी के बागी सांसद क्या ममता बनर्जी के हाथों से पार्टी छीन सकते हैं, तो जवाब हां है. तकनीकी और कानूनी रूप से ऐसा होना मुमकिन है, लेकिन यह इतना आसान नहीं होगा. टीएमसी के बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय केवल संसद में अपनी सदस्यता बचाने के लिए यानि वो दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए किया है. 

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वहीं, बागी गुट के नेताओं ने साफ संकेत दिए हैं कि उनका अगला कदम चुनाव आयोग  जाकर 'असली टीएमसी' होने का दावा ठोकना है. सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा कि जुलाई में टीएमसी पर अपनी दावेदारी जताएंगे. बागी खेमे का प्लान है कि जुलाई में जब संसद का सत्र शुरू होगा,

तब बागी सांसद स्पीकर के सामने 'बहुमत' के आधार पर खुद को 'असली टीएमसी' घोषित करने की मांग करेंगे. इसके बाद चुनाव आयोग के सामने बागी नेता अपना पक्ष रखेंगे, तो ममता बनर्जी को अपनी ही बनाई पार्टी का नाम और सिंबल छोड़ना पड़ सकता है, ठीक वैसे ही जैसे उद्धव ठाकरे और शरद पवार को छोड़ना पड़ा था. 

लीगली रूप से किसका दावा मजबूत है? 
सियासत में देखा गया है कि जब किसी पार्टी में दो गुट बनते हैं और दोनों ही गुट खुद को 'असली पार्टी' बताते हैं, तो इसका फैसला चुनाव आयोग करता है. इस बात का पूरे उल्लेख 'इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968' के पैराग्राफ 15 के तहत करता है. इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 1971 के ऐतिहासिक 'सादिक अली बनाम चुनाव आयोग' मामले में तय किए गए नियमों के आधार पर किसी भी गुट का दावा तीन मुख्य पैमानों पर परखा जाता है:

चुनाव आयोग देखता है कि पार्टी के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों (सांसदों और विधायकों) में से कितने लोग किस गुट के साथ हैं. टीएमसी में देखें तो लोकसभा के 28 सांसदों में से 20 बागी खेमे में हैं. इसके अलावा विधानसभा में भी बागियों का दावा है कि उनके पास 80 में से 60 से ज्यादा विधायक हैं. इस तरह बागी गुट सदन में भी भारी बहुमत साबित कर देते हैं, तो उनका दावा बेहद मजबूत हो जाएगा.

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चुनाव आयोग यह जांचता है कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, पदाधिकारियों और जिला अध्यक्षों की सूची में से किसका पलड़ा भारी है. संगठन के मोर्चे पर ममता बनर्जी का  पलड़ा भारी है, क्योंकि पार्टी संगठन पर अभी उनकी पकड़ बनी हुई है. हालांकि,  शिवसेन और एनसीपी के मामले में चुनाव आयोग ने पार्टी संगठन से ज्यादा सांसद और विधायकों की संख्या को तवज्जो दी थी. इस तरह से चुनाव आयोग देखता है कि क्या पार्टी के भीतर बगावत या नए अध्यक्ष का चुनाव पार्टी के आंतरिक संविधान के नियमों के तहत हुआ है या नहीं. 

टीएमसी पर किसका पलड़ा मजबूत
चुनाव आयोग को लगता है कि मामला बहुत उलझा हुआ है और तुरंत फैसला नहीं लिया जा सकता, तो वह अंतरिम तौर पर टीएमसी के नाम और 'जोड़ा फूल' सिंबल को फ्रीज (जब्त) कर सकता है. ऐसी स्थिति में दोनों गुटों को अस्थाई रूप से नए नाम और नए सिंबल दिए जाएंगे. ऐसे में चुनाव आयोग का फैसला जो भी हो, असंतुष्ट पक्ष (चाहे ममता बनर्जी हों या बागी) तुरंत सुप्रीम कोर्ट जाएगा.महाराष्ट्र के मामलों की सुनवाई भी सुप्रीम कोर्ट में लंबी खिंची है, इसलिए बंगाल में भी यह कानूनी लड़ाई महीनों या सालों चल सकती है.

ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी इतनी आसानी से अपनी पार्टी का सिंबल नहीं छोड़ेंगे. अभिषेक बनर्जी ने पहले ही लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर मांग की है कि इस बागी गुट को मान्यता न दी जाए और अधिकृत व्हिप का पालन कराया जाए. चुनाव आयोग या लोकसभा स्पीकर के किसी भी फैसले के खिलाफ दोनों में से जो भी पक्ष हारेगा, वह तुरंत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगा. यानी आने वाले दिनों में दिल्ली से लेकर कोलकाता तक लंबी कानूनी लड़ाई तय है.

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कानूनी और विधायी आंकड़ों (सांसदों की संख्या) के लिहाज से बागी गुट ने ममता बनर्जी की घेराबंदी मजबूत कर ली है, लेकिन टीएमसी के संगठन और कार्यकर्ताओं पर ममता बनर्जी की पार्टी है,उसे अदालत के किसी फैसले से छीन पाना बागियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी. फिलहाल पलड़ा कानूनी लिहाज से टीएमसी के बागी नेताओं के साथ है, लेकिन पश्चिम बंगाल की जमीन पर ममता बनर्जी की है. असली लड़ाई अब अदालत के कमरों से शुरू होकर बंगाल के चुनावी मैदान तक जाएगी. 
 

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