दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि राष्ट्रीय राजधानी में प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतें न्यायिक प्रणाली के लिए एक अप्रत्याशित चुनौती खड़ी कर रही हैं. इसकी वजह से अब सामान्य और रोज़मर्रा के प्रॉपर्टी विवाद भी जिला अदालतों के बजाय सीधे हाईकोर्ट पहुंच रहे हैं.
अदालत ने कहा कि दिल्ली में अब मकानों और जमीनों के दाम इतने बढ़ चुके हैं कि एक साधारण सा घर भी आराम से 2 करोड़ रुपये से महंगा हो गया है, मौजूदा नियम के मुताबिक, 2 करोड़ रुपये से ज्यादा की प्रॉपर्टी के जितने भी विवाद होते हैं, उन्हें सीधे हाई कोर्ट में ही दर्ज कराना पड़ता है क्योंकि जिला अदालतों के पास इतने बड़े अमाउंट के केस सुनने का अधिकार नहीं है.
इसका नुकसान यह हो रहा है कि हाई कोर्ट पर मुकदमों का बोझ फालतू में बढ़ रहा है, और दूसरी तरफ आम जनता का भी कानूनी खर्च और अदालतों के चक्कर लगाने की परेशानी बढ़ती जा रही है. हाईकोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे को देखते हुए मौजूदा सीमाओं की समीक्षा करने की आवश्यकता हो सकती है, ताकि लोगों को उन विवादों के लिए हाईकोर्ट का रुख न करना पड़े जो मूल रूप से स्थानीय प्रकृति के हैं.
यह भी पढ़ें: लखनऊ से कानपुर सिर्फ 40 मिनट में, इन इलाकों में प्रॉपर्टी पर मिलेगा बंपर मुनाफा
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी क्यों की?
जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस तेजस कारिया की डिविजन बेंच ने हाल ही में टिप्पणी किया कि मौजूदा आर्थिक सीमाएं अब दिल्ली के प्रॉपर्टी बाजार की जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाती हैं. बेंच ने कहा कि रियल एस्टेट की कीमतों में आए भारी उछाल का मतलब यह है कि अब एक बेहद साधारण आवासीय संपत्ति की कीमत भी अक्सर 2 करोड़ रुपये से ऊपर चली जाती है. यही कारण है कि ऐसे विवादों को जिला अदालतों के बजाय सीधे हाईकोर्ट में लाना पड़ता है. जजों के अनुसार, इससे आम नागरिकों के लिए मुकदमेबाजी की लागत और असुविधा दोनों बढ़ जाती है.
आर्थिक क्षेत्राधिकार सीमा का मतलब उस मौद्रिक मूल्य से है, जिस सीमा तक किसी अदालत को किसी मामले की सुनवाई करने और उस पर फैसला देने का कानूनी अधिकार होता है. वर्तमान में दिल्ली में सिविल और जिला अदालतें अधिकतम 2 करोड़ रुपये तक के दावों वाले मामलों की सुनवाई कर सकती हैं. यदि विवाद का मूल्य इस राशि से अधिक हो जाता है, तो मामला आमतौर पर दिल्ली हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में चला जाता है.
यह भी पढ़ें: 12 फ्लैट, सी-फेसिंग आलीशान घर, कितना है आमिर का रियल एस्टेट साम्राज्य
नियम के मुताबिक, 2 करोड़ से ज्यादा की कीमत वाली प्रॉपर्टी के मामलों की सुनवाई सीधे हाईकोर्ट में होती है. इसका नतीजा यह हो रहा है कि छोटे-मोटे आपसी विवाद, जैसे- पड़ोसियों का झगड़ा, घर का बंटवारा, या किसी बात पर स्टे लेने जैसे मामूली मामले भी जिला अदालत के बजाय सीधे हाईकोर्ट पहुंच रहे हैं. इससे हाईकोर्ट पर केसों का बोझ फालतू में बढ़ रहा है और आम लोगों का भी कानूनी खर्च और चक्कर बढ़ गया है.
बेंच ने कहा कि इससे जहां एक तरफ हाईकोर्ट पर मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ संबंधित पक्षों के लिए न्याय पाना महंगा और असुविधाजनक हो रहा है.
सीमा को 2 करोड़ से बढ़ाकर 20 करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव
हाईकोर्ट ने यह टिप्पणियां उस याचिका की सुनवाई के दौरान कीं, जिसमें सात जजों की समिति द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट को पेश किए जाने से रोकने की मांग की गई थी, इस समिति का गठन यह जांचने के लिए किया गया था कि क्या दिल्ली की जिला अदालतों के आर्थिक क्षेत्राधिकार को 2 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 20 करोड़ रुपये कर दिया जाना चाहिए. हाईकोर्ट ने इस रिपोर्ट को फुल कोर्ट के सामने पेश करने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया.
क्या हाईकोर्ट इस सीमा को खुद बदल सकता है?
कोर्ट ने साफ किया कि दिल्ली हाईकोर्ट के पास कितने रुपये तक के केस सुनने का अधिकार होगा, यह एक पुराने कानून ('दिल्ली हाईकोर्ट एक्ट, 1966') के तहत तय होता है. इसलिए, इस 2 करोड़ रुपये की लिमिट को बदलने या बढ़ाने का अधिकार अकेले हाईकोर्ट के पास नहीं है, यह बदलाव केवल देश की संसद ही कानून पास करके कर सकती है.
हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि न्याय व्यवस्था को बेहतर बनाने और लोगों की सहूलियत को देखने का अधिकार उसके पास है, इसलिए, वह इस समस्या की जांच कर सकती है और जरूरत पड़ने पर सरकार या संसद को इस लिमिट को बढ़ाने की सिफारिश भेज सकती है.
अदालत को क्यों लगता है कि इस मुद्दे पर ध्यान देना जरूरी है?
जजों ने कहा कि पिछले छह दशकों में दिल्ली का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है, शहर की आबादी कई गुना बढ़ गई है, व्यावसायिक गतिविधियां काफी व्यापक हुई हैं, और दिल्ली भारत के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में से एक बन गई है. इसके साथ ही, न्यायिक बुनियादी ढांचे में भी सुधार हुआ है और अब पूरी राजधानी में 11 न्यायिक जिले काम कर रहे हैं.
इन बदलावों को देखते हुए, पीठ ने कहा कि यह विचार करना बेहद जरूरी है कि क्या मौजूदा आर्थिक सीमाएं नागरिकों को उनके जितना संभव हो सके करीब और कुशलता से न्याय देने के उद्देश्य को पूरा कर पा रही हैं या नहीं. हालांकि, अदालत ने साफ कर दिया कि इस पर अंतिम फैसला संसद का ही होगा. समिति की भूमिका केवल इस मुद्दे का अध्ययन करना और विचार के लिए अपनी सिफारिशों को फुल कोर्ट के सामने रखना है.
यह भी पढ़ें: ब्रिटेन में घर खरीदना हुआ सपना, क्या मंदी की गिरफ्त में आ गया है देश का हाउसिंग मार्केट?