कोलकाता की 61 वर्षीय शिल्पा साहा कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए नेपाल गई थीं. उनके साथ 52 लोगों का दल था. लेकिन वीजा में देरी के कारण उनकी यात्रा का कार्यक्रम बदल गया और यही देरी बाद में उनकी जिंदगी बचाने वाली साबित हुई. शिल्पा अब कोलकाता लौट चुकी हैं, लेकिन नेपाल में देखे फ्लैश फ्लड और भूस्खलन के खौफनाक दृश्य उनकी आंखों के सामने अब भी घूम रहे हैं. शिल्पा के मुताबिक वह लोग 21 अगस्त को कोलकाता के हावड़ा स्टेशन से रवाना हुए थे. अगले दिन रक्सौल पहुंचे और वहां से ट्रैवल एजेंट उन्हें काठमांडू लेकर गया. काठमांडू में एक रात रुकने के बाद उन्हें 24 अगस्त को वीजा मिलने की उम्मीद थी. लेकिन 24 अगस्त को वीजा नहीं मिला. इसके बाद 25 अगस्त को भी सभी लोग वीजा का इंतजार करते रहे.
शिल्पा बताती हैं कि उस समय सभी के मन में कैलाश मानसरोवर जाने की खुशी थी, लेकिन साथ ही ऊंचाई और अपनी सेहत को लेकर चिंता भी थी. उन्हें डर था कि हाई एल्टीट्यूड पर उनकी तबीयत कैसी रहेगी और वह यात्रा पूरी कर पाएंगी या नहीं. इसके बावजूद कैलाश मानसरोवर पहुंचने का उत्साह सबसे ज्यादा था. 25 अगस्त की शाम जब सभी लोग डिनर कर रहे थे, तभी ट्रैवल एजेंट ने आकर बताया कि वीजा मिल गया है. अब तय किया जाना था कि सुबह करीब 6.30 बजे निकलना है या रात एक बजे इमिग्रेशन के लिए रवाना होना है. 52 लोगों के पूरे दल को तैयार करने में समय लग रहा था. आखिरकार सुबह 6.30 बजे निकलने का फैसला हुआ.
वीजा में देरी से टला सफर तो बदल गई पूरी कहानी
शिल्पा के मुताबिक रवाना होने से पहले सभी ने नारियल फोड़ा और खुशी मनाई. इसके बाद करीब 6.30 बजे उनका दल आगे के लिए रवाना हुआ. लगभग ढाई से तीन घंटे सफर करने के बाद बस उस जगह के करीब पहुंची, जहां बाद में भयानक हादसा हुआ. शिल्पा के मुताबिक बस उस जगह से करीब 100 से 150 मीटर की दूरी पर थी. हालांकि वह दूरी का अनुमान बता रही हैं. उस समय बस में मौजूद कुछ यात्रियों ने चाय के लिए रुकने की बात कही. ड्राइवर को भी नाश्ता करना था, इसलिए कुछ लोग बस से नीचे उतर गए. शिल्पा ड्राइवर के बगल वाली सीट पर ही बैठी रहीं. वह सामने का पूरा रास्ता देख रही थीं और चैंटिंग कर रही थीं.
इसी दौरान उन्होंने पहाड़ की तरफ से कुछ अजीब सा उठता हुआ देखा. उन्हें लगा कि शायद धूल या हवा में उड़ती मिट्टी है. तभी सामने कुछ स्कूली बच्चे भागते हुए दिखाई दिए. एक सिक्योरिटी गार्ड भी सीटी बजाते हुए लोगों को वहां से भागने का इशारा कर रहा था. ड्राइवर भी तुरंत बस की तरफ दौड़कर आया. शिल्पा के मुताबिक ड्राइवर का चेहरा अचानक बदल गया था. उसने तुरंत बस चलाने को कहा. शिल्पा ने पूछा कि आखिर हुआ क्या है. ड्राइवर ने कहा कि तुरंत यहां से निकलना होगा, वरना वे भी फंस जाएंगे और जान जा सकती है.
शिल्पा को उस वक्त भी पूरी स्थिति का अंदाजा नहीं था. उन्होंने ड्राइवर से कहा कि शायद लैंडस्लाइडिंग हो रही है और इसे साफ करने के बाद वे आगे निकल जाएंगे. उनका ध्यान अब भी कैलाश मानसरोवर पहुंचने और इमिग्रेशन पूरा करने पर था. लेकिन ड्राइवर ने उनकी बात नहीं मानी. उसने सभी यात्रियों को तुरंत बस में बैठाया और बस को वहां से ऊपर की तरफ ले गया. करीब पांच से छह मिनट तक बस चलाकर उसने गाड़ी को ऊंचाई पर पहुंचा दिया. इसके बाद आसपास के ग्रामीण भी उन्हें वहां से निकल जाने के लिए कहने लगे.
शिल्पा के मुताबिक बस वहां ज्यादा देर नहीं रुकी. कुल मिलाकर करीब 10 मिनट के आसपास का समय रहा होगा. इसके बाद ड्राइवर ने बस घुमाई और सभी यात्रियों को वापस काठमांडू ले गया. जब बाद में शिल्पा को उस जगह की तबाही के बारे में पता चला तो उन्हें एहसास हुआ कि वह और उनके साथी मौत से कितनी करीब थे. जिस चाय की दुकान के पास बस रुकी थी और जहां कुछ यात्री उतर गए थे, वह जगह बाद की तबाही में मौजूद नहीं थी. शिल्पा का कहना है कि जिस जगह हादसा हुआ, उससे उनकी बस महज करीब 100 से 150 मीटर दूर थी.
इस घटना को याद करते हुए शिल्पा भावुक हो जाती हैं. उन्हें सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि वह कैलाश मानसरोवर नहीं जा सकीं. उन्होंने इस यात्रा के लिए काफी तैयारी और त्याग किया था. खाने को लेकर भी उन्होंने कई चीजों से परहेज किया था, ताकि कैलाश पहुंचकर भगवान शिव के दर्शन कर सकें. लेकिन अब यात्रा पूरी नहीं होने का दुख उस हादसे में प्रभावित लोगों की चिंता के सामने छोटा लग रहा है. शिल्पा कहती हैं कि उनके साथ यात्रा पर निकले सभी लोग उनके लिए परिवार जैसे थे. भले ही सभी के बीच खून का रिश्ता नहीं था, लेकिन मंजिल एक थी और सभी भगवान शिव के दर्शन के लिए निकले थे.
काठमांडू में रहने के दौरान भी उन्हें हादसे से जुड़ी खबरें मिलती रहीं. लोगों के फंसे होने, शवों के मिलने और बच्चों के लापता होने की खबरों ने वहां मौजूद यात्रियों को बेहद दुखी कर दिया था. शिल्पा के मुताबिक काठमांडू में सामान्य जिंदगी चल रही थी, लेकिन वहां मौजूद यात्रियों के मन में इस हादसे का गहरा असर था. शिल्पा का कहना है कि उन्हें नहीं पता कि आगे गए लोगों में से कौन सुरक्षित लौट पाएगा. वह किसी के बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहना चाहतीं. उनकी बस यही प्रार्थना है कि जो लोग आगे गए थे, वे सुरक्षित अपने परिवारों के पास लौट आएं.
बस ऊंचाई पर पहुंची तो नीचे दिखा डरावना मंजर
वह कहती हैं कि जिस तरह की मौत उन्होंने वहां देखी, वैसी मौत किसी को न मिले. उनके लिए यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं है. वह खुद उस जगह से कुछ ही दूरी पर थीं और ड्राइवर के एक फैसले ने उनके पूरे दल को सुरक्षित निकाल लिया. आज शिल्पा कोलकाता लौट चुकी हैं. कैलाश मानसरोवर की यात्रा अधूरी रह गई, लेकिन उनके पास उस यात्रा की एक ऐसी याद रह गई है, जिसे वह शायद कभी भूल नहीं पाएंगी. उनकी आंखों के सामने आज भी वही पहाड़, उड़ती धूल, भागते लोग, सीटी बजाता सिक्योरिटी गार्ड और बस को ऊंचाई की तरफ ले जाता ड्राइवर दिखाई देता है.