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ऋतब्रत 10 दिन में देंगे ममता गुट को पटखनी! रोचक हो गया बंगाल में ये चुनाव

पश्चिम बंगाल की सियासत एक समय ममता बनर्जी के इर्द-गिर्द सिमटी रही है, लेकिन सत्ता से बाहर होते ही उनकी पकड़ ढीली पड़ती जा रही. ममता बनर्जी के हाथ से उनके दो-तिहाई विधायक और सांसद निकल गए हैं. ऐसे स्थिति में बागी गुट की अगुवाई कर रहे ऋतब्रत बनर्जी का पलड़ा भारी हो रहा है.

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 ऋतब्रत बनर्जी बनाम ममता बनर्जी गुट (Photo:ITG)
ऋतब्रत बनर्जी बनाम ममता बनर्जी गुट (Photo:ITG)

पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी के हाथों से सबकुछ धीरे-धीरे निकलता जा रहा है. विधायक और लोकसभा सांसद के बाद टीएमसी का संगठन दो गुटों में बंट गया है. बागी विधायकों के नेता ऋतब्रत बनर्जी के हौसले बुलंद हैं, जो अब हरहाल में टीएमसी पर अपना कब्जा जमाना चाहते हैं. अब ऋतब्रत बनाम ममता गुट की अगली लड़ाई का सियासी रण पीएसी चुनाव बनने जा रहा है. 

बंगाल में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर काबिज होने के बाद ऋतब्रत बनर्जी की नजर अब विधानसभा में लोक लेखा समिति (PAC) के चेयरमैन पद पर है. पीएसी के चनाव का ऐलान हो गया है, जहां ऋतब्रत बनर्जी और ममता बनर्जी गुट दोनों ही अपने-अपने खेमे से प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर ली है. 

विधानसभा में विधायकों का नंबर गेम जिस तरह से ऋतब्रत बनर्जी के पक्ष में दिख रहा है, उससे चलते ममता बनर्जी गुट के लिए सियासी नैया पार कराना मुश्किल है. ऐसे में साफ है कि  ऋतब्रत बनर्जी एक बार फिर से ममता गुट को सियासी पटखनी दे सकते हैं? 

पांच जुलाई को पीएसी का चुनाव 
पश्चिम बंगाल विधानसभा में लोक लेखा समिति (पीएसी) के चेयरमैन पद सहित तीन कमेटियों के चुनाव का ऐलान हो गया है. विधानसभा की सबसे प्रभावशाली निगरानी समितियों में लोक लेखा समिति है. इसमें अध्यक्ष सहित अधिकतम 20 सदस्य हो सकते हैं.  इस समिति के चुनाव में केवल विपक्षी विधायक ही लड़ेंगे, जिसमें टीएमसी के अलावा कांग्रेस, सीपीआई (एम) और एसएफआई के सदस्य हिस्सा ले सकते हैं, 

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विधानसभा अधिसूचना के मुताबिक पीएसी के साथ सार्वजनिक उपक्रमों की समिति, आकलन समिति और स्थानीय निधि खातों की समिति के लिए नामांकन 30 जून तक दाखिल किए जाएंगे.पीएसी चुनाव के नामांकन पत्र की जांच 1 जुलाई को होगी, जबकि नामांकन वापस लेने की आखिरी तारीख 2 जुलाई है. समिति के लिए एक से ज्यादा प्रत्याशी उतरते हैं तो फिर 5 जुलाई को मतदान होगा. इसमें विधायक वोट देने का काम करते हैं. 

पीएसी का चुनाव क्यों अहम बना
लोकसभा की लोकलेखा समिति की तरह कई राज्यों में परंपरा है कि अध्यक्ष का पद विपक्ष को ही दिया जाता है, ताकि निष्पक्षता बनी रहे. हालांकि, ये कानूनी बाध्यता नहीं बल्कि एक प्रथा है. आम तौर पर कमिटी के चेयरमैन विपक्ष के नॉमिनेशन से चुने जाते हैं, लेकिन टीएमसी में बंटवारे की वजह से यह प्रक्रिया मुश्किल हो गई है. इसके पीछे वजह यह है कि टीएमसी के दोनों ही गुट की नजर पीएसी के चेयरमैन पद पर है.  

माना जा रहा है कि ऋतब्रत बनर्जी गुट नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर कब्जा जमाने के बाद अब पीएमसी चेयरमैन के पद के हासिल करने की है. इसके लिए ऋतब्रत बनर्जी अपने करीबी और वरिष्ठ नेता फिरहाद हकीम के नाम पर विचार कर रहा है. फिरहाद हकीम को चुनाव लड़ाने की रणनीति बनाई है तो ममता बनर्जी का गुट पीएसी के चेयरमैन पद पर अपने किसी नेता को चुनाव लड़ना चाहते हैं. 

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ऋतब्रत देंगे क्या ममता गुट को मात
पीएसी चुनाव में ऋतब्रत बनर्जी ने फिरहाद हकीम को चुनाव लड़ाने की प्लानिंग कर ली है और ममता बनर्जी अपने किसी नेता को कैंडिडेट बनाकर उतारती है तो ऐसी स्थिति में  ममता बनर्जी और विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के गुटों के बीच पहला प्रत्यक्ष मुकाबला होने की संभावना बन गई है. पांच जुलाई को मतदान है, जिसके चलते अगले 10 दिन में ये फाइट होगी. 

ऋतब्रत बनर्जी गुट का दावा है कि उसे TMC के 80 में से 65 विधायकों का समर्थन है. ममता और ऋतब्रत के बीच एक और आजमाइश उम्मीद है कि दोनों गुट कमिटी की मेंबरशिप के लिए अपने उम्मीदवार उतारेंगे. अगर उम्मीदवारों की संख्या उपलब्ध सीटों से ज़्यादा हुई तो वोटिंग ज़रूरी हो जाएगी, जिससे यह प्रक्रिया असल में असेंबली के अंदर दोनों गुटों के बीच ताकत की आजमाइश बन जाएगी. ऋतब्रत के समर्थन में जिस तरह से टीएमसी विधायक खड़े हैं, उसके चलते ममता बनर्जी के लिए पीएसी चुनाव जीतना आसान नहीं है. 

पीएमसी का पद विपक्ष को मिलेगा? 
हालांकि, पश्चिम बंगाल में PAC का इतिहास राजनीतिक उठा-पटक वाला रहा है. हालांकि संसदीय परंपरा के अनुसार चेयरमैन का पद आमतौर पर मुख्य विपक्षी दल को मिलना चाहिए, लेकिन अलग-अलग सरकारों के समय इस नियुक्ति को लेकर अक्सर विवाद होते रहे हैं. टीएमसी सरकार के दौरान बीजेपी ने ममता सरकार पर परंपरा को दरकिनार करने का आरोप लगाया था. 

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बीजेपी ने आरोप लगा रही था कि सरकार ने ऐसे विधायकों को नियुक्त किया जो TMC में तो शामिल हो गए थे, लेकिन अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया था. उस समय मुख्य विपक्षी दल रही बीजेपीने शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में कई बार पीएमसी की बैठकों का बहिष्कार किया था. हालांकि इस बार मुकाबला सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच नहीं, बल्कि खुद विपक्ष के भीतर है. 

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