उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ की निजामाबाद तहसील अपनी नायाब मुगलकालीन ब्लैक पॉटरी (काली मिट्टी के नक्काशीदार बर्तन) के लिए दुनिया में मशहूर है. लेकिन, आगे बात होगी यहीं के स्थानीय विधानसभा सीट से विधायक रहे आलम बदी की. जमीनी सियासत की भट्टी में पक कर तराशे गए नायाब हीरे की तरह रहे आलम बदी इस दुनिया से चले गए हैं, लेकिन वे अपने पीछे कुछ ऐसी वविरासत छोड़ गए हैं जिसकी अब कल्पना भी नहीं की जा सकती.
सियासत में आज जहां बाहुबल, धनबल और गाड़ियों के लंबे काफिले पहचान बन चुकी है.. एक विधायक होना मतलब, रौबदार, जलवेदार और हनकदार होना माना जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश में आलम बदी ऐसे विधायक थे, जिन्होंने सत्ता के सर्वोच्च शिखर के पास रहकर भी सादगी और शुचिता का दामन कभी नहीं छोड़ा.
आलम बदी एक मामूली इंसान की तरह रहन-सहन और जनता की सेवा करना ही मकसद बनाए हुए थे. उनकी पहचान चमचमाती गाड़ियों से नहीं, बल्कि हाथ में थमे झोले, कंधे पर सफेद सादा खादी का कुर्ता और जनता के बीच आसानी से उपलब्ध रहने की सहजता से थी. पांच बार के विधायक रहे आलम बदी का बुधवार देर रात निधन हो गया. वो लंबी बिमारी के बाद 92 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए.
इंजीनियरिंग से जनसेवा तक का सफर
आलम बदी का शुरुआती जीवन राजनीति से बहुत अलग था. वे एक पढ़े-लिखे और योग्य इंजीनियर थे. उनके पास एक सुरक्षित और आरामदायक पेशेवर जीवन जीने का पूरा मौका था, लेकिन उन्होंने तकनीकी ज्ञान का इस्तेमाल अपने निजी फायदे के लिए करने के बजाय जनसेवा का रास्ता चुना.
सपा के पांच बार के विधायक रहे आलम वदी का जन्म 16 मार्च 1936 को आजमगढ़ में हुआ था. वो आजमगढ़ के विंदावल इलाके में रहते हैं. शिक्षा क्षेत्र की बात करे तो आलम बदी ने 12वीं तक पढ़ाई करने के बाद इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग से डिप्लोमा किया. पेशवर रूप से एक योग्य इंजीनियर रहे आलम बदी ने अपना पूरा जीवन जनसेवा और क्षेत्र के विकास के लिए समर्पित कर दिया.
1970 और 80 के दशक में जब ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव था, तब आलम बदी ने बिजली, सड़क और शिक्षा जैसे तकनीकी और बुनियादी मुद्दों को लेकर स्थानीय स्तर पर आवाज़ उठानी शुरू की. उनके इसी अध्ययनशील और गंभीर स्वभाव ने उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बना दिया.
सादगी और बेदाग राजनीति के प्रतीक
उत्तर प्रदेश की राजनीति में आलम बदी अपनी सादगी, ईमानदारी और बेदाग छवि के लिए जाने जाते थे. वे आजमगढ़ जिले की निजामाबाद सीट से पांच बार विधायक रहे. विधायक बनने के बाद भी उनके रहन-सहन में रत्ती भर बदलाव नहीं आया, वे अक्सर साधारण बस, ट्रेन या अपनी पुरानी गाड़ी और साइकिल से ही जनता के बीच चले जाते थे. सुरक्षा गार्डों और लाव-लश्कर के आडंबर से वे हमेशा दूर रहे. स्कूटर और मोटर साइकिल पर बैठकर ही विधानसभा जाया करते थे.
आलम बदी ने अपनी राजनीतिक जीवन में हमेशा दबे-कुचले, गरीब और किसानों के हक की आवाज को सड़क से सदन तक मजबूती से उठाया करते थे. सदन में वो किसी धार्मिक और जातीय मुद्दे को उठाने के बजाय जनहित से जुड़े मुद्दे उठाते थे. बिजली दरों विकास परियोजनाओं पर बोलते, तो उनके पास तथ्यों और आंकड़ों की ठोस तैयारी होती थी., उनकी भाषा संयमित और तर्कसंगत होती थी, जिसके कारण सत्तापक्ष के मंत्री भी उनकी बात को गंभीरता से सुनते थे.
सदन में जनहित के मुद्दों को पूरी निष्ठा के साथ उठाने की उनकी शैली की वजह से न सिर्फ उनकी अपनी पार्टी, बल्कि विपक्षी दलों के नेता भी उनका बेहद सम्मान करते थे. कई दशकों के राजनीतिक जीवन के बावजूद उन पर कभी भ्रष्टाचार या पद के दुरुपयोग का एक भी दाग नहीं लगा. उन्होंने अपनी विधायक निधि का पाई-पाई इस्तेमाल क्षेत्र के स्कूलों, सड़कों और गरीब जनता के कल्याण में किया करते थे.
आलम बदी ने यह साबित किया कि चुनाव जीतने के लिए बाहुबल या अकूत धन-दौलत की ज़रूरत नहीं होती, अगर जनता के प्रति नीयत साफ हो और ईमानदारी आपकी ढाल हो, तो जनता बार-बार आपको अपना प्रतिनिधि चुनकर सर-आंखों पर बिठाती है. आलम बदी का जीवन आने वाली पीढ़ी के जन-प्रतिनिधियों के लिए सादगी, ईमानदारी और निष्ठा के एक नायाब उदाहरण हैं.
आलम बदी का राजनीतिक सफर
आलम बदी ने सपा के साथ अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया. पहली बार 1996 में निजामाबाद सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे. इसके बाद 2002, 2012, 2017 और 2022 के चुनावों में भी अपनी जीत का परचम लहराया. 2007 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद उन्होंने फिर मजबूत वापसी करते हुए लगातार चुनाव जीतकर क्षेत्र में अपना जनाधार कायम रखा. इस तरह वह अपने पूरे राजनीतिक करियर में सिर्फ एक ही बार चुनाव हारे थे.
करीब 90 साल से ज्यादा उम्र होने के बाद भी उनकी सक्रियता चर्चा का विषय रहती थी. समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव दोनों ही आलम बदी के निष्ठावान स्वभाव और ईमानदारी के कायल थे. इसीलिए मुलायम सिंह से लेकर अखिलेश यादव तक ने उन्हें अपनी कैबिनेट में मंत्री बनाने का ऑफर दिया, लेकिन उन्होंने स्वीकार नहीं किया. आज़मगढ़ में जब भी पार्टी को किसी नैतिक और सर्वमान्य चेहरे की ज़रूरत होती तो आलम बदी के नाम सबसे आगे नजर आता.
आलम बदी की शख्सियत को समझिए
आलम बदी की शख्सियत क्या थी, उनसे दस साल पहले हुए आजतक की एक मुलाकात से समझ सकते हैं. आजतक के संवाददाता उनके घर पहुंचे तो देखा कि आजमगढ़ शहर की गलियों में वो रहते हैं, उनका परिवार काफी बड़ा है, सब साथ हैं. इलाके में उनकी साख है, लेकिन उसका रसूख आम इंसान की तरह.
आलम बदी 20 रूपये मीटर के टांडे के कपड़े का कुर्ता पायजामा, मामूली चप्पल, कान में छोटी सी सुनने की मशीन, हाथ में महज 1200 रूपये का मोबाइल, छरहरा बदन लेकिन चेहरे पर ग़ज़ब का आत्मविश्वास और सुकून. ये हैं आजमगढ़ के निज़ामाबाद से विधायक आलम बदी. आजतक' की टीम आलम बदी साहब के घर पहुंची, तो अचरज हुआ कि, ये विधायक और फिर से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आलम बदी का घर है.
बदी साहब सुबह उठकर अपने कमरे की खुद साफ़ सफाई करके हमसे मिलने आये, कमरे की झाड़ू लगाने के विजुअल लेने से मना कर दिया, बोले ये तो मेरा व्यक्तिगत काम है, सभी अपने घर में करते हैं, इसको क्या दिखाना. चुनावी मौसम में उनके घर पर पार्टी का कोई झंडा या भोंपू नहीं है. हां, भारत का झंडा जरूर लगा है. चहल-पहल भी चुनावी नहीं दिखती, सादगी का पुलिंदा ही नज़र आता है.
आम तौर पर बदी साहब के घर आने वाले को छोटे से कप में बिना दूध की चाय मिलती है. घर में मेहमान के लिए नाश्ता बनाने और परोसने के लिए कोई नौकर भी नहीं है. उनके बेटे और पोते ही इस काम को करते हैं. सर्दी हो या गर्मी घर के टीन शेड के नीचे वो लोगों से रूबरू होते हैं. घर की पुताई हुए भी ज़माना बीत गया होगा.
यूपी रोडवेज से आलम बदी करते थे सफर
आलम बदी साहब के पास ठीक-ठाक गाड़ी तक नहीं है. पहले सेकेंड हैंड एम्बेसडर थी, तो पूरे इलाके में जानी जाती थी, क्योंकि कई बार बीच सड़क पर खड़ी हो जाती थी, कभी तेल ख़त्म, तो कभी बिगड़ भी जाया करती थी. अब बमुश्किल एक सेकेंड हैंड बुलेरो ली है, लेकिन उसका कम ही इस्तेमाल करते हैं. आखिर तेल डालाने का मसला आ जाता है. ऐसे में बदी साहब कभी किसी कार्यकर्ता की गाड़ी में बैठ जाते हैं या फिर सड़क पर जो मिला उससे ही लिफ्ट ले लेते हैं.
विधानसभा सत्र के दौरान लखनऊ जाने के लिए वो यूपी रोडवेज की बस में अपने पास का इस्तेमाल कर लेते हैं. बदी साहब मैकेनिकल इंजीनियर हैं, शुरुआत में गोरखपुर में नौकरी भी की, लेकिन नेहरू, बोस, गांधी से प्रेरणा लेकर समाजसेवा में आ गए. एक बार 2007 में आलम बदी चुनाव हारे, तो अगली सुबह भी 9 बजे इलाके में लोगों के बीच पहुंच गये. वैसे आपको जानकर आश्चर्य होगा कि, बदी साहब ने 2012 का चुनाव महज 2 लाख रुपय में ही लड़ा था और जीतकर विधानसभा पहुंचे.
आलम बदी साहब के रुख से कई बार उनके घरवाले नाखुश रहते हैं. आपसी बातचीत में उनका दर्द छलक जाता है. बदी साहब के 6 बेटे हैं, जिसमें से 3 छोटे मोटे रोज़गार के लिए बाहर हैं, तो सबसे बड़े बेटे महज 15 हज़ार रुपये महीने की प्राइवेट नौकरी करते हैं. दूसरे बेटे की फर्नीचर की छोटी सी दुकान है, जिससे बस गुजर बसर ही हो पाता है. चुनाव के दौरान वो दुकान बंद कर पिता के साथ प्रचार में जुटे थे.
आलम बदी के ईमानदारी के हर कोई कायल
छोटे बेटे पीए के तौर पर आलम बदी के साथ रहते हैं, लेकिन मजाल है कि, कोई भी आदेश या काम वो बिना बदी साहब के कर लें. उनका काम सिर्फ बदी साहब का आदेश मानने का होता है, वो सिर्फ फ़ोन मिलाते हैं, बात खुद बदी ही करते हैं. आलम बदी कहते हैं 'ना मैं कमीशन खाता हूं और ना ही मेरे बेटे ठेकेदार से मिलकर खेल करते हैं'. इलाके में मशहूर है कि, बदी साहब की विधायक निधि का टेंडर जल्दी कोई ठेकेदार नहीं लेता, क्योंकि वो सड़क, नाला, या कोई भी काम खुद खड़े होकर कराते हैं. कमीशन लेते नहीं और कमी होने पर ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट कराने से भी चूकते नहीं हैं.
शहीदों के नाम पर स्मारक आलम बदी के बारे में उनकी ईमानदारी के साथ ही सभी धर्म और जातियों के लिए बराबर . बदी ने इस इलाके के शहीदों के नाम पर 4 बड़े द्वार बनवाए हैं, जिसमें कोई भी मुस्लिम नहीं है. द्वार दिखाते वक़्त बदी साहब बड़े फक्र से बताते हैं कि, इससे आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी. बदी साहब को मुलायम सिंह यादव और फिर अखिलेश यादव ने मंत्री बनने को कहा तो बदी ने इंकार कर दिया. वो कहते हैं कि, मैं आज तक टिकट या निशान मांगने नहीं गया, नेताजी और अखिलेश खुद ही भेज देते हैं. उन्होंने मंत्री बनने को कहा तो मैंने किसी नौजवान को बनाने का सुझाव दिया. बदी कहते हैं कि वो मंत्री बन जाते तो अपने इलाके से दूर हो जाते.
बदी साहब मुलायम सिंह को ऐसा सुझाव दे चुके हैं, जिससे खुद मुलायम भी हक़्के बक्के रह गए. बदी बताते हैं कि मुलायम सिंह ने उनसे कहा कि कुछ ऐसा काम बताओ जिससे लोग मुझे याद रखें. जिस पर बदी ने मुलायम को सुझाया कि आप चुनाव जीतने के बाद सुनिश्चित करिए कि आपके विधायक और मंत्री चुनाव जीतने के पहले जिस घर में रहते थे, उसी में जीतने के बाद भी रहेंगे. बंगला और कोठी नहीं लेंगे, लाल बत्ती भी ना लगाएं, तो जनता आपको कभी नहीं भूलेगी.
कम खाओ, पैदल चलो... स्वस्थ रहोगे
आलम बदी ने बताया था कि मेरा सुझाव सुनकर मुलायम ने कहा कि, मैं तो कर दूं, लेकिन आजकल तो सभी इसी के लिए विधायक बनते हैं, वो कैसे मानेंगे. वैसे अखिलेश को लेकर बदी खुलकर कहते हैं कि, वो मुंह में चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुए हैं, लेकिन उनके संस्कार ऐसे हैं कि वो आगे जायेंगे. मेरे जाने पर वो कुर्सी से खड़े हो जाते हैं. आखिर में हमने बदी साहब से इज़ाज़त ली, तो पूछा कि आप इस उम्र में इतने फिट कैसे रह पाते हैं. उन्होंने तपाक से जवाब दिया 'मैं वेज, नॉन वेज दोनों खा लेता हूं, लेकिन दिन भर में 2 रोटी, 2 अंडे और 2 गिलास दूध की खुराक है. कम खाओ, पैदल चलो और खूब पानी पियो, इसी पर चलता हूं.