
वाराणसी के ज्ञानवापी मामले में फैसला सुनाकर चर्चा में आए जज रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर सुर्खियों में हैं. इस बार मामला मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 से जुड़ा है. करीब 10 साल पुराने एनडीपीएस एक्ट के एक मामले में फैसला सुनाते हुए जज रवि कुमार दिवाकर ने उनकी अदालत से हत्या के 97 मामलों की पत्रावलियां वापस लिए जाने को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं.
फैसले में जज दिवाकर ने सवाल किया कि न्यायाधीश का काम न्याय करना होता है और अगर उसी न्यायाधीश के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए? उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करने वाला न्यायाधीश ऐसे आदेश का पालन करने के लिए बाध्य है, जिसे वह विधि के विपरीत मानता है ?
10 साल पुराने एनडीपीएस केस में आया फैसला
जज रवि कुमार दिवाकर ने गुरुवार को करीब 10 साल पुराने एनडीपीएस एक्ट के मामले में फैसला सुनाया. अदालत ने साक्ष्य के अभाव में अभियुक्त अशोक भारती को दंड से मुक्त कर दिया. फैसला सुनाते हुए जज दिवाकर ने लंबे समय से चल रहे इस मुकदमे का भी जिक्र किया. उन्होंने हिंदी फिल्म दामिनी के चर्चित संवाद ‘तारीख पर तारीख’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह संवाद काफी प्रसिद्ध है कि न्यायालय से तारीख पर तारीख मिलती है, लेकिन न्याय नहीं.
18 अगस्त को रिकॉल की गई थीं 97 पत्रावलियां
मामला उन 97 पत्रावलियों से जुड़ा है, जिन्हें 18 अगस्त को तत्कालीन जिला जज बीरेंद्र कुमार सिंह ने रिकॉल कर लिया था. जानकारी के मुताबिक, जज रवि कुमार दिवाकर ने नवंबर 2025 में मुजफ्फरनगर में पदभार संभाला था. अपने कार्यकाल के कुछ ही महीनों में उनकी अदालत ने 11 मामलों में 23 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी. इसके बाद 18 अगस्त को उनकी अदालत से हत्या के 97 मामलों की पत्रावलियां वापस ले ली गईं. हालांकि, अब तत्कालीन जिला जज बीरेंद्र कुमार सिंह सेवानिवृत्त हो चुके हैं. ऐसे में गुरुवार को सुनाए गए एनडीपीएस मामले के फैसले में जज दिवाकर ने इन पत्रावलियों को रिकॉल किए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं.
‘अगर न्यायाधीश के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए?’
जज रवि कुमार दिवाकर ने अपने फैसले में न्यायाधीश की भूमिका और उसके प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि न्यायाधीश का काम न्याय करना है. लेकिन अगर उसी न्यायाधीश के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए? फैसले में यह सवाल भी उठाया गया कि जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण में अपने दायित्व का निर्वहन करने वाला न्यायाधीश क्या जिला जज के ऐसे आदेश का पालन करने के लिए बाध्य है, जो उसकी नजर में विधि के विपरीत हो?

जज दिवाकर की यह टिप्पणी 97 पत्रावलियों को रिकॉल किए जाने की प्रक्रिया के संदर्भ में सामने आई है. फैसले में जज दिवाकर ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 409 का उल्लेख किया है. उन्होंने कहा कि इस धारा में जिला जज द्वारा किसी मामले को रिकॉल किए जाने का प्रावधान है. हालांकि, फैसले में धारा 409(2) का भी उल्लेख करते हुए कहा गया कि यदि किसी मामले में ट्रायल शुरू हो चुका है और मामला ‘पार्ट हर्ड केस’ की स्थिति में है, तो उसे रिकॉल करने को लेकर कानूनी प्रावधान लागू होते हैं. जज दिवाकर ने अपने फैसले में इसी कानूनी स्थिति को आधार बनाकर उनकी अदालत से कुछ मामलों की पत्रावलियां वापस मंगाए जाने पर सवाल उठाया है.
23 दोषियों को फांसी की सजा के बाद चर्चा में आए थे
जज रवि कुमार दिवाकर नवंबर 2025 में मुजफ्फरनगर में तैनात हुए थे. अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई गंभीर आपराधिक मामलों में फैसले सुनाए. जानकारी के मुताबिक, कुछ ही महीनों में उनकी अदालत ने 11 मामलों में 23 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई. इसके बाद उनकी अदालत में लंबित हत्या के 97 मामलों की पत्रावलियां वापस लिए जाने का मामला सामने आया. अब इन्हीं पत्रावलियों को रिकॉल किए जाने की प्रक्रिया को लेकर जज दिवाकर की टिप्पणी सामने आई है.