18 सितंबर 1949 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में संविधान सभा की बैठक हुई थी. इसमें देश के नामाकरण को लेकर लंबी चर्चा हुई. आंबेडकर समिति ने भारत और इंडिया जैसे दो नाम सुझाए थे. इसके अलावा भी कई लोगों ने भारत के अलग-अलग नामों का सुझाव दिया. अंतिम सहमति 'इंडिया दैट इज भारत' पर बनी. उस वक्त भी कई लोगों ने देश का नाम इंडिया रखने का विरोध किया था.
77 साल पहले 18 सितंबर 1949 को ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के एचवी कामथ ने देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत या भारतवर्ष करने का संशोधन प्रस्ताव संविधान सभा में पेश किया था. डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में इस प्रस्ताव पर काफी बहस और वोटिंग हुई.
बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर ने देश के दो नाम का प्रस्ताव रखा- इंडिया और भारत. इसके पक्ष और विपक्ष में काफी लोगों ने अपने- अपने तर्क दिए और देश के अलग- अलग नाम सुझाए. इनमें हिंदुस्तान, हिंद, भारतवर्ष, भारत और भारतभूमि प्रमुख रहे.
जब 18 सितंबर 1949 को संविधान सभा की बैठक हुई तो समिति के सदस्य एचवी कामथ पहले वक्ता थे. उन्होंने कहा था कि यह भारतीय गणतंत्र का नामकरण समारोह है. अगर नामकरण समारोह की जरूरत नहीं होती तो हम इंडिया नाम ही रख सकते थे. कामथ ने असल में भारत नाम की उत्पत्ति की तह तक जाना शुरू कर दिया था.
कामथ ने कहा था कि मुझे लगता है कि इंडिया यानी भारत संविधान में अनफिट है. उन्होंने इसे संवैधानिक भूल करार दिया. कामथ के बाद बिहार से ब्रजेश्वर प्रसाद ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि इंडिया या भारत को लेकर किसी तरह की दिक्कत है. उन्होंने प्रस्ताव रखा कि संविधान के अनुच्छेद-1 में कहा जाना चाहिए कि 'इंडिया दैट इज भारत'.
इस बहस के दौरान कांग्रेस नेता कमलापति त्रिपाठी ने भी सुझाव दिया था. उन्होंने इस देश की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखते हुए देश का नाम भारत दैट इज इंडिया का प्रस्ताव रखा था.
संविधान सभा के एक अन्य सदस्य सेठ गोविंद दास ने चीनी यात्री ह्वेन सांग की किताब का हवाला देते हुए कहा था कि - उन्होंने भी अपनी किताब में हमारे देश का जिक्र भारत के तौर पर किया है. संविधान सभा में हुई बहस के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया कि इंडिया, दैट इज भारत को संविधान के अनुच्छेद 1(1) में जोड़ा जाए.