इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गोंडा में हिरासत में हुई मौत के मामले में आरपीएफ के दो कर्मचारियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है. लखनऊ बेंच के जस्टिस मनीष माथुर ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि भले ही कोरोना महामारी खत्म हो गई हो, लेकिन हिरासत में मौत का सिलसिला अब भी थमता नहीं दिख रहा. आरपीएफ सब इंस्पेक्टर करन सिंह यादव और कांस्टेबल अमित कुमार यादव ने गोंडा की विशेष अदालत के 4 अगस्त के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी जमानत अर्जी ठुकरा दी गई थी.
यह पूरा मामला गोंडा के किंकी गांव के रहने वाले संजय कुमार सोनकर की मौत से जुड़ा है. पुलिस के मुताबिक 28 सितंबर 2025 को गोंडा से गुवाहाटी जा रही एक मालगाड़ी से छह टिन सरसों तेल चोरी हो गया था. यह घटना मोतीगंज रेलवे स्टेशन के पास बरुआचक इलाके में हुई थी. आरपीएफ जब इस चोरी की जांच कर रही थी, तो पूछताछ के दौरान संजय का नाम सामने आया.
एफआईआर के मुताबिक 4 नवंबर 2025 को आरपीएफ कर्मी संजय को पूछताछ के लिए अपने साथ ले गए थे. शाम करीब साढ़े चार बजे उसे आगे की जांच के लिए उसके गांव लाया गया और फिर दोबारा अपने साथ ले जाया गया. अगली सुबह संजय के भाई को बताया गया कि उसका शव मुर्दाघर में रखा है. अभियोजन पक्ष का आरोप है कि हिरासत में संजय के साथ मारपीट की गई, जिसकी वजह से उसकी मौत हो गई.
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अपनी याचिका में दोनों आरोपियों ने इन आरोपों से इनकार किया और कहा कि उन्हें झूठा फंसाया गया है. उनके वकील ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें जांघ के ऊपरी हिस्से पर चोट के निशान और दोनों घुटनों पर खरोंच के निशान दर्ज थे. वकील का कहना था कि ये चोटें मौत का कारण बनने के लिए काफी नहीं थीं. वहीं राज्य सरकार ने इन याचिकाओं का विरोध करते हुए मामले की गंभीरता का हवाला दिया और कहा कि आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं.
अदालत ने कहा कि हिरासत में मौत के मामलों में आरोपों को गलत साबित करने की जिम्मेदारी आमतौर पर पुलिसकर्मियों पर ही होनी चाहिए. जस्टिस माथुर ने कहा कि इस मामले में भी यह जिम्मेदारी अपीलकर्ताओं पर आती है, जिसे फिलहाल वे पूरा करते नहीं दिख रहे. कोर्ट ने यह भी कहा कि पोस्टमार्टम के नतीजे आरोपों का समर्थन करते हैं या उनका खंडन करते हैं, यह सबूतों के आधार पर ही तय होगा.