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Phuktal Monastery Ladakh: 3850 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है लद्दाख का अनोखा गुफा मठ, पहुंचने के लिए करनी पड़ती है घंटों ट्रेकिंग

Phuktal Monastery Ladakh: लद्दाख की जांस्कर घाटी में पहाड़ की प्राकृतिक गुफा के बीच बना फुगताल मठ (Phugtal Monastery) अपनी अनोखी बनावट के लिए जाना जाता है. यहां पहुंचने के लिए पैदल ट्रेक करना पड़ता है लेकिन रास्ते में मिलने वाले खूबसूरत पहाड़ी नजारे इस सफर को खास बना देते हैं.

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गुफा में बना अनोखा मठ (Photo- ITG)
गुफा में बना अनोखा मठ (Photo- ITG)

Phuktal Monastery Ladakh: लद्दाख घूमने का प्लान बनाते समय ज्यादातर लोग लेह, पैंगोंग झील और नुब्रा वैली जैसी फेमस जगहों को अपनी लिस्ट में शामिल करते हैं. लेकिन लद्दाख में कुछ ऐसी जगहें भी हैं जो अपनी खूबसूरती के साथ-साथ अनोखे इतिहास और शांत माहौल के लिए जानी जाती हैं. ऐसी ही एक जगह है जांस्कर घाटी में स्थित फुगताल मठ (Phugtal Gompa). पहाड़ की चट्टान के बीच प्राकृतिक गुफा में बना यह बौद्ध मठ दूर से देखने पर किसी फिल्मी जगह जैसा नजर आता है. यहां तक पहुंचने के लिए आपको सड़क छोड़कर कई किलोमीटर पैदल ट्रेक करना पड़ता है लेकिन रास्ते में नजर आने वाले ऊंचे पहाड़, लुंगनाक नदी और शांत वादियां इस सफर को खास बना देती हैं.

यहां पहुंचने के बाद आपको मठ की अनोखी बनावट, पुराने बौद्ध ग्रंथ और सदियों पुरानी संस्कृति को करीब से देखने का मौका मिलता है. अगर आप भीड़भाड़ वाली जगहों से दूर कुछ अलग और सुकून भरा एक्सपीरियंस चाहते हैं तो फुगताल मठ आपके लिए एक खास जगह हो सकती है. तो आइए जानते हैं इस अनोखे मठ की खासियत और यहां पहुंचने से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.

पैदल पहुंचना पड़ता है मठ तक
फुगताल मठ तक पहुंचने के लिए आपको पैदल ट्रेक करना पड़ता है. यहां की सबसे नजदीकी सड़क चा गांव तक जाती है, जहां से मठ लगभग 6 किलोमीटर दूर है. इसके बाद ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों, घुमावदार पगडंडियों और सस्पेंशन ब्रिज से होकर गुजरना पड़ता है. रास्ते में नीचे बहती लुंगनाक नदी और चारों तरफ ऊंचे पहाड़ों के नजारे देखने को मिलते हैं.

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अगर आपको ऊंचाई वाले इलाकों में ट्रेकिंग की आदत नहीं है तो यह सफर थोड़ा मुश्किल लग सकता है. इसलिए यहां जाने से पहले खुद को मौसम और ऊंचाई के हिसाब से तैयार करना जरूरी है.

गुफा के अंदर बना है मठ
फुगताल मठ की सबसे खास बात इसकी बनावट है. यह मठ एक प्राकृतिक गुफा के अंदर और उसके आसपास बनाया गया है. पहाड़ की चट्टान पर बना यह मठ दूर से देखने पर कई छोटी-छोटी गुफाओं का समूह जैसा लगता है.

यहां लगभग 70 बौद्ध भिक्षु रहते हैं, जो ध्यान, प्रार्थना और अध्ययन में अपना समय बिताते हैं. मठ के अंदर की दीवारों पर बनी बौद्ध धर्म से जुड़ी पेंटिंग्स और भित्तिचित्र भी देखने लायक हैं.

पुराने ग्रंथों की लाइब्रेरी
फुगताल मठ सिर्फ धार्मिक जगह ही नहीं, बल्कि शिक्षा और संस्कृति का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा है. यहां एक लाइब्रेरी है, जिसमें पुराने बौद्ध ग्रंथ और पांडुलिपियां रखी हुई हैं. मठ का शांत माहौल और प्राचीन वास्तुकला इसे बाकी जगहों से अलग बनाती है.

3850 मीटर की ऊंचाई पर है फुगताल मठ
फुगताल मठ समुद्र तल से लगभग 3,850 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यहां से जांस्कर घाटी और आसपास की ऊंची हिमालयी चोटियों का शानदार नजारा दिखाई देता है. मठ के नीचे बहती लुंगनाक नदी इस पूरे इलाके की खूबसूरती को और बढ़ा देती है.

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जांसेम शेराब जांगपो से जुड़ा है इतिहास
फुगताल मठ का इतिहास बौद्ध धर्म और यहां रहने वाले भिक्षुओं से जुड़ा हुआ है. माना जाता है कि जांसेम शेराब जांगपो ने इस मठ की स्थापना की थी और उन्होंने अपने जीवन का काफी समय यहीं बिताया. बाद में उनका निधन भी फुगताल में ही हुआ. उनके अवशेष आज भी यहां एक विशेष स्तूप में रखे हुए बताए जाते हैं.

शांति पसंद लोगों के लिए खास जगह
फुगताल मठ उन लोगों के लिए खास हो सकता है जो भीड़भाड़ वाली जगहों से दूर कुछ अलग अनुभव करना चाहते हैं. यहां पहुंचना आसान नहीं है लेकिन रास्ते की मुश्किलों के बाद मिलने वाला शांत माहौल और पहाड़ों का नजारा इस सफर को यादगार बना देता है.

कब जाना बेहतर होता है?
फुगताल मठ घूमने के लिए जून से सितंबर का समय बेहतर माना जाता है. इस दौरान मौसम अपेक्षाकृत अनुकूल रहता है और ट्रेकिंग का रास्ता भी आसानी से पार किया जा सकता है. सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण यहां पहुंचना काफी मुश्किल हो सकता है.

यह इलाका काफी ऊंचाई पर है, इसलिए ट्रेक से पहले शरीर को ऊंचाई के मौसम के अनुकूल ढालना जरूरी है. साथ ही गर्म कपड़े, जरूरी सामान और पानी साथ रखें. मठ में रहने के लिए सीमित व्यवस्था मिल सकती है, जबकि आसपास के गांवों में होमस्टे का ऑप्शन भी मिल सकता है.

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इन बातों का रखें ध्यान
फुगताल मठ जाते समय मठ के नियमों और स्थानीय संस्कृति का सम्मान करें. बहुत ज्यादा शोर न करें और कचरा इधर-उधर न फैलाएं. प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करें और अपना कचरा वापस लेकर आएं. यह जगह प्राकृतिक और सांस्कृतिक रूप से काफी संवेदनशील है, इसलिए यहां घूमते समय जिम्मेदार पर्यटक बनना जरूरी है.

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