मोहनजोदड़ो (Mohenjo Daro) दुनिया के सबसे प्रसिद्ध पुरातात्विक स्थलों में से एक है. यह वर्तमान में पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लरकाना जिले में स्थित है. इसका निर्माण लगभग 2500 ईसा पूर्व के आसपास हुआ था और यह प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता (इंडस वैली सिविलाइजेशन) के सबसे बड़े नगरों में से एक माना जाता है. उस समय यह क्षेत्र मानव सभ्यता के महत्वपूर्ण केंद्रों में शामिल था और इसकी गिनती दुनिया के शुरुआती बड़े शहरों में की जाती थी. यह नगर प्राचीन मिस्र, मेसोपोटामिया और अन्य समकालीन सभ्यताओं के दौर का ही माना जाता है.
इतिहासकारों के अनुसार, मोहनजोदड़ो में अपने चरम काल के दौरान कम से कम 40 हजार लोग रहते थे. यह शहर कई सदियों तक आबाद रहा, लेकिन लगभग 1700 ईसा पूर्व के आसपास इसे छोड़ दिया गया. इसी समय सिंधु घाटी सभ्यता के अन्य बड़े नगरों का भी पतन होने लगा था.
मोहनजोदड़ो का मूल नाम क्या था, इसकी कोई निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है. कुछ विद्वानों ने मुहरों और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर इसके प्राचीन नाम के बारे में अनुमान लगाए हैं, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं हुई है. वर्तमान नाम "मोहनजोदड़ो" सिंधी भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ "मृत लोगों का टीला" बताया जाता है.
यह स्थल सिंधु नदी के निचले भाग के पश्चिमी किनारे के पास स्थित है. यह लरकाना शहर से लगभग 28 किलोमीटर की दूरी पर है. मोहनजोदड़ो का स्थान सिंधु नदी के बाढ़ क्षेत्र में एक ऊंचे भूभाग पर स्थित था.
मोहनजोदड़ो सिंधु घाटी सभ्यता का हिस्सा था, जिसे हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है. यह सभ्यता लगभग 3000 ईसा पूर्व के आसपास विकसित हुई थी और इसका विस्तार वर्तमान पाकिस्तान तथा भारत के कई हिस्सों तक फैला हुआ था. उस समय हड़प्पा, लोथल, कालीबंगन, धोलावीरा, राखीगढ़ी और मोहनजोदड़ो जैसे कई बड़े नगर इस सभ्यता के प्रमुख केंद्र थे.
मोहनजोदड़ो की खोज 1920 के दशक में दोबारा की गई थी. इसके बाद यहां कई महत्वपूर्ण खुदाई अभियान चलाए गए, जिनसे सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में नई जानकारियां सामने आईं. वर्ष 1980 में इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया गया. यह दक्षिण एशिया का पहला स्थल था जिसे यह सम्मान मिला. वर्तमान समय में यह पुरातात्विक स्थल प्राकृतिक क्षरण और संरक्षण संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिसके कारण इसके संरक्षण पर लगातार ध्यान दिया जा रहा है.
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