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किसान आंदोलन

किसान आंदोलन

किसान आंदोलन

भारत में आज भी बड़ी आबादी खेती और उससे जुड़े कार्यों पर निर्भर करता है. किसानों की आय, फसल का उचित मूल्य, सिंचाई, कर्ज, बीमा, भूमि अधिकार और सरकारी नीतियों जैसे मुद्दों को लेकर समय-समय पर किसान अपनी मांगों के समर्थन में आंदोलन करते रहे हैं. भारतीय लोकतंत्र में किसान आंदोलन अपनी बात सरकार तक पहुंचाने का एक माध्यम रहे हैं.

किसान आंदोलन का उद्देश्य आमतौर पर कृषि से जुड़े मुद्दों पर सरकार का ध्यान आकर्षित करना और किसानों की समस्याओं का समाधान कराना होता है. इन आंदोलनों का स्वरूप अलग-अलग समय में अलग रहा है. कहीं शांतिपूर्ण धरना और प्रदर्शन हुए, तो कहीं लंबे मार्च, रैलियां और महापंचायतों का आयोजन किया गया. कई बार इन आंदोलनों के बाद सरकारों ने नई नीतियां बनाई या पुराने फैसलों में बदलाव भी किए.

स्वतंत्रता से पहले भी भारत में किसानों ने अंग्रेजी शासन की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई थी। चंपारण सत्याग्रह, खेड़ा सत्याग्रह और बारडोली सत्याग्रह जैसे आंदोलनों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी. इन आंदोलनों का नेतृत्व महात्मा गांधी और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने किया था.

स्वतंत्रता के बाद भी किसानों के मुद्दे बदलते रहे. हरित क्रांति के बाद उत्पादन बढ़ा, लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), कृषि लागत, कर्ज, बिजली, सिंचाई, खाद और बीज जैसे विषय प्रमुख बन गए. विभिन्न किसान संगठनों ने समय-समय पर इन मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर आंदोलन किए.

भारत में कई किसान संगठन सक्रिय हैं, जिनमें भारतीय किसान यूनियन (BKU), संयुक्त किसान मोर्चा (SKM), अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) और विभिन्न राज्यों के क्षेत्रीय किसान संगठन शामिल हैं. ये संगठन किसानों की मांगों को सरकार के सामने रखने और आंदोलन का नेतृत्व करने का कार्य करते हैं.

हाल के वर्षों में किसान आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बने. विशेष रूप से कृषि कानूनों को लेकर हुए आंदोलन ने देश और दुनिया का ध्यान आकर्षित किया. इसके अलावा न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी, कर्ज माफी, फसल बीमा और कृषि सुधार जैसे मुद्दे आज भी किसानों की प्रमुख मांगों में शामिल हैं.

भारत के प्रमुख किसान आंदोलनों में 1917 में चंपारण सत्याग्रह, जो बिहार में नील की खेती के खिलाफ आंदोलन था.

22 मार्च 1918 में खेड़ा सत्याग्रह, गुजरात में फसल खराब होने पर लगान माफी की मांग.

12 फरवरी 1928 में    बारडोली सत्याग्रह, गुजरात में भूमि कर बढ़ाने के विरोध में आंदोलन.

25 अक्टूबर 1988 दिल्ली, किसान रैली भारतीय किसान यूनियन द्वारा दिल्ली के बोट क्लब पर विशाल प्रदर्शन.

6 मार्च 2018    नासिक, मुंबई किसान लॉन्ग मार्च जिसमें महाराष्ट्र के किसानों ने करीब 180 किमी पैदल मार्च किया.

29-30 नवंबर 2018 में किसान मुक्ति मार्च, विभिन्न किसान संगठनों द्वारा दिल्ली में प्रदर्शन.

26 नवंबर 2020 में कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन शुरू जहां पंजाब, हरियाणा सहित कई राज्यों के किसानों ने दिल्ली सीमाओं पर प्रदर्शन शुरू किया.

19 नवंबर 2021 में तीन कृषि कानून वापस लेने की घोषणा    , प्रधानमंत्री ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की.

29 नवंबर 2021 में कृषि कानून निरसन विधेयक पारित, संसद ने तीनों कृषि कानूनों को औपचारिक रूप से निरस्त किया.

13 फरवरी 2024 में MSP समेत अन्य मांगों को लेकर किसान आंदोलन जिसमें संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा के नेतृत्व में दिल्ली कूच का आह्वान किया.
 

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