रात के करीब दस बजे हैं. घर में खाना लग चुका है. टीवी पर खबरें चल रही हैं, लेकिन किसी का ध्यान उधर नहीं है. घर के दो लोग अपने-अपने मोबाइल पर इंस्टाग्राम स्क्रॉल कर रहे हैं. दोनों एक ही मुद्दे से जुड़े वीडियो देख रहे हैं, जंतर-मंतर पर चल रहा NEET पेपर लीक विरोध प्रदर्शन. कुछ मिनट बाद पहला व्यक्ति फोन रखता है और कहता है, ‘ये प्रदर्शन अब अपने मकसद से भटक चुका है’. दूसरा उसी समय फोन रखकर जवाब देता है, ‘मुझे तो ऐसा बिल्कुल नहीं लगा, इतने सारे स्टूडेंट्स शांतिपूर्वक अपनी बात रख रहे हैं’
दोनों के बीच बहस शुरू हो जाती है. किसी को लगता है कि दूसरा झूठ बोल रहा है. लेकिन सच यह है कि दोनों ने वही देखा है जो उनकी स्क्रीन पर दिखाया गया.
यहीं से सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म की कहानी की शुरुआत होती है. हम अक्सर मान लेते हैं कि सोशल मीडिया पर जो दिख रहा है, वही पूरी तस्वीर है. लेकिन हकीकत यह है कि इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर हर यूजर की दुनिया अलग होती है.
एक ही घटना, एक ही दिन और एक ही समय में दो लोगों को बिल्कुल अलग तरीके से दिखाई जा सकती है. इसका कारण सिर्फ़ लोगों की सोच नहीं है. इसके पीछे एक ऐसी तकनीक काम करती है, जो हर सेकंड यह सीख रही होती है कि आपको किस तरह का कंटेंट पसंद है. इसी तकनीक को एल्गोरिदम कहा जाता है.
एल्गोरिदम को समझना मुश्किल नहीं है. इसे ऐसे समझिए जैसे आपके मोहल्ले का कोई दुकानदार, जो आपको सालों से जानता है. अगर आप हर बार उसकी दुकान से एक ही तरह की टॉफी खरीदते हैं, तो कुछ दिनों बाद वह बिना पूछे वही टॉफी आपके सामने रख देता है. उसे पता है कि आपको क्या पसंद है.
सोशल मीडिया भी बिल्कुल ऐसा ही करता है. फर्क सिर्फ़ इतना है कि दुकानदार आपकी दो-चार पसंद याद रखता है, जबकि एल्गोरिदम आपकी लगभग हर डिजिटल आदत पर नज़र रखता है. आपने कौन-सी रील पूरी देखी, किस वीडियो को बीच में छोड़ दिया, किस पोस्ट पर रुके, किसे लाइक किया, किसे शेयर किया और किस पोस्ट पर गुस्से में कमेंट लिखा, यह सब उसके लिए साइन्स हैं.
धीरे-धीरे वह आपके बारे में इतना सीख लेता है कि उसे अंदाज़ा हो जाता है कि अगली बार आपको किस तरह का वीडियो दिखाने से आप कुछ सेकंड और रुकेंगे.
यहीं एक छोटी-सी लेकिन बहुत इंपॉर्टेंट बात समझने की ज़रूरत है. हम अक्सर सोचते हैं कि सोशल मीडिया हमें सबसे ज़रूरी या सबसे सही जानकारी दिखाता है. लेकिन सच यह है कि उसका पहला मकसद सही जानकारी दिखाना नहीं, बल्कि आपको ज़्यादा देर तक अपने प्लेटफ़ॉर्म पर बनाए रखना होता है.
यानी सवाल यह नहीं होता कि सबसे सही वीडियो कौन-सा है? सवाल यह होता है कि कौन-सा वीडियो देखकर यह यूज़र स्क्रॉल करना बंद कर देगा?
यही वजह है कि कई बार शांत, बैलेंस्ड और फैक्ट बेस्ड वीडियो पीछे रह जाते हैं, जबकि गुस्सा पैदा करने वाले, चौंकाने वाले या भावनाओं को भड़काने वाले वीडियो बहुत तेज़ी से फैलने लगते हैं.
अपने परिवार के वॉट्सऐप ग्रुप के बारे में सोचिए. अगर कोई दस पन्नों का सरकारी आदेश भेज दे, तो शायद ही कोई उसे पूरा पढ़े. लेकिन अगर कोई लिख दे, अभी-अभी बड़ा खुलासा, तुरंत देखिए, तो कुछ ही मिनटों में वही मैसेज कई लोगों तक पहुंच जाता है.
हमारा दिमाग़ ऐसी चीज़ों पर जल्दी रिएक्शन देता है जो हमें चौंकाती हैं या इमोशनल बनाती हैं.
सोशल मीडिया के एल्गोरिदम ने इंसानी बिहेवियर की इस आदत को बहुत अच्छे से समझ लिया है. इसलिए जिस कंटेंट पर लोग ज़्यादा रुकते हैं, बहस करते हैं, गुस्सा दिखाते हैं या दोस्तों को भेजते हैं, उसकी पहुंच और बढ़ने लगती है.
यहीं से एक और प्रोसेस शुरू होता है, जो पहली नज़र में दिखाई नहीं देता.
मान लीजिए आपने जंतर-मंतर प्रदर्शन के समर्थन में तीन-चार वीडियो पूरे देख लिए. हो सकता है आपने किसी पोस्ट को लाइक भी कर दिया हो. एल्गोरिदम इसे एक साइन की तरह लेता है. उसे लगता है कि आपको इसी तरह का कंटेंट पसंद है. अगले कुछ घंटों में आपका फ़ीड ऐसे ही वीडियो से भरने लगता है.
दूसरी तरफ़, अगर किसी दूसरे शख्स ने प्रोटेस्ट की आलोचना करने वाले वीडियो ज़्यादा देखे, तो उसके साथ भी यही होता है. उसका फ़ीड धीरे-धीरे उसी दिशा में झुकने लगता है.
कुछ दिनों बाद दोनों लोग एक ही देश में रहते हैं, एक ही शहर में रहते हैं, लेकिन उनके मोबाइल पर दिखने वाली दुनिया अलग हो चुकी होती है. यही वजह है कि आज कई बार बहस किसी मुद्दे पर नहीं, बल्कि दो अलग-अलग डिजिटल दुनिया के बीच होती है.
जंतर-मंतर का यह प्रोटेस्ट सिर्फ़ एक उदाहरण है. असली कहानी उस तकनीक की है जो हर दिन करोड़ों भारतीयों की स्क्रीन पर यह तय कर रही है कि वे क्या देखें, किस पर भरोसा करें और किस बात पर सबसे पहले प्रतिक्रिया दें.
यही वजह है कि आज किसी भी बड़े आंदोलन, चुनाव या राष्ट्रीय बहस को समझने के लिए सिर्फ़ सड़क पर क्या हो रहा है, यह जानना काफी नहीं है. यह भी समझना ज़रूरी है कि मोबाइल की स्क्रीन पर क्या दिखाया जा रहा है, क्योंकि कई बार वहीं से लोगों की राय बनती है.
यहां से कहानी थोड़ी दिलचस्प हो जाती है. मान लीजिए आपने जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ी दस रील्स देखीं. उनमें से सात प्रदर्शन के सपोर्ट में थीं और आपने उन्हें पूरा देखा. दो पर कमेंट भी कर दिया. एल्गोरिदम ने इसे एक इशारे की तरह लिया. अब उसे लगने लगा कि आपको इसी तरह का कंटेंट पसंद है.
अगले दिन आपका इंस्टाग्राम खोलते ही फिर वैसी ही रील्स सामने आने लगती हैं. तीसरे दिन और ज़्यादा. एक हफ़्ते बाद आपको लगने लगता है कि इस मुद्दे पर लगभग हर कोई आपकी तरह सोच रहा है.
उधर, किसी दूसरे शख्स ने प्रोटेस्ट की आलोचना करने वाले वीडियो ज़्यादा देखे. उसके साथ भी यही हुआ. अब उसके फ़ीड में ज़्यादातर वही वीडियो आने लगे जिनमें प्रदर्शन पर सवाल उठाए जा रहे हैं.
दोनों को लगता है कि वे अपनी आंखों से सच देख रहे हैं. लेकिन सच यह है कि दोनों की स्क्रीन पर अलग-अलग दुनिया बनाई जा चुकी है. इसे आसान भाषा में ऐसे समझिए. मान लीजिए आप रोज़ एक ही चाय की दुकान पर जाते हैं. दुकानदार जानता है कि आपको राजनीति पर बहस पसंद है, इसलिए हर बार वही चर्चा छेड़ देता है.
आपका दोस्त उसी दुकान पर आता है, लेकिन उसे क्रिकेट पसंद है. दुकानदार उसके सामने क्रिकेट की बात करता है. दोनों को लगता है कि दुकानदार की सबसे बड़ी दिलचस्पी उसी विषय में है, जबकि दुकानदार सिर्फ़ सामने वाले की पसंद के हिसाब से बात बदल रहा है.
सोशल मीडिया का एल्गोरिदम भी कुछ ऐसा ही करता है. वह दुनिया नहीं बदलता, लेकिन आपकी स्क्रीन पर दिखाई देने वाली दुनिया ज़रूर बदल देता है. यही वजह है कि आज फ़िल्टर बबल और इको चैंबर जैसे शब्द बार-बार सुनाई देते हैं. आसान भाषा में कहें तो इसका मतलब है कि आप धीरे-धीरे ऐसे डिजिटल कमरे में पहुंच जाते हैं जहां ज़्यादातर वही आवाज़ें सुनाई देती हैं जो आपकी अपनी राय से मिलती-जुलती हैं. अलग सोच वाले लोग या तो कम दिखते हैं या बिल्कुल गायब हो जाते हैं.
समस्या सिर्फ़ इतनी नहीं है कि आप दूसरी राय कम देखते हैं. असली दिक्कत यह है कि कुछ समय बाद आपको लगने लगता है कि दूसरी राय रखने वाले लोग बहुत कम हैं, जबकि हकीकत कुछ और भी हो सकती है.
यही वजह है कि सोशल मीडिया पर बहस अक्सर जल्दी गरमा जाती है. दोनों पक्षों को पूरा भरोसा होता है कि सच सिर्फ़ उनके पास है.
इस विरोध प्रदर्शन के दौरान भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला. 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च के बाद सोशल मीडिया पर कई दावे वायरल हुए. दिल्ली पुलिस ने इनमें से कई दावों का खंडन करते हुए कहा कि पैलेट गन चलाने, बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लेने और बच्चों के घायल होने जैसी कई बातें सही नहीं थीं. यानी प्रदर्शन के समर्थन में चल रहे कुछ वायरल दावों को आधिकारिक तौर पर गलत बताया गया.
दूसरी तरफ़, BOOM, AltNews और CyberPeace जैसे फैक्ट-चेक प्लेटफ़ॉर्म ने ऐसी पोस्ट भी पकड़ीं जिनमें पुराने और असंबंधित वीडियो को इस प्रदर्शन से जोड़कर शेयर किया गया. कहीं दूसरे देश का वीडियो इस्तेमाल हुआ, कहीं किसी पुराने प्रदर्शन की क्लिप को नए कैप्शन के साथ वायरल किया गया, ताकि यह लगे कि प्रदर्शनकारी हिंसक हैं या पुलिस की कार्रवाई पूरी तरह सही थी.
यानी गलत जानकारी सिर्फ़ एक तरफ़ से नहीं फैल रही थी. यही इस पूरी कहानी का सबसे ख़तरनाक हिस्सा है. जब दोनों पक्ष अपने-अपने समर्थकों तक ऐसे कंटेंट पहुंचाने लगते हैं जो उनकी पहले से बनी राय को और मज़बूत करे, तब सच बीच में कहीं दबने लगता है.
दिलचस्प बात यह भी है कि इसी प्रदर्शन से जुड़े मीम, सटायर, गाने और छोटे-छोटे वीडियो भी बड़ी संख्या में वायरल हुए. कई युवाओं ने इन्हें अपने अंदाज़ में बनाया और शेयर किया. यह सोशल मीडिया की दूसरी ताक़त है. वही प्लेटफ़ॉर्म, जहां गलत जानकारी फैल सकती है, वहीं किसी आंदोलन की आवाज़ भी लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है.
यानी तकनीक अपने आप में न अच्छी है, न बुरी. सवाल यह है कि उसका इस्तेमाल कैसे हो रहा है और एल्गोरिदम किस तरह के कंटेंट को सबसे ज़्यादा आगे बढ़ा रहा है.
एक और बात, जिस पर कम चर्चा होती है, वह है कमेंट सेक्शन. अक्सर लोगों को लगता है कि किसी रील के नीचे दिख रहे कमेंट सभी को एक जैसे दिखाई देते होंगे. लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता. सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म यह भी कोशिश करते हैं कि आपको वही कमेंट पहले दिखें जिनसे आपके जुड़ने की संभावना ज़्यादा हो.
मान लीजिए किसी रील पर दस हज़ार कमेंट हैं. अगर आपने पहले भी प्रोटेस्ट के सपोर्ट वाले पोस्ट पर ज़्यादा समय बिताया है, तो मुमकिन है कि आपको ऊपर ऐसे कमेंट दिखें जो उसी सोच से मेल खाते हों. अगर किसी दूसरे शख्स का बिहेवियर अलग रहा है, तो उसे उसी रील पर अलग तरह के कमेंट पहले दिखाई दे सकते हैं.
यहीं एक साइकोलॉजिकल इफेक्ट शुरू होता है. हमें लगने लगता है कि ज़्यादातर लोग तो मेरी ही तरह सोच रहे हैं. हो सकता है सच इससे बिल्कुल अलग हो. लेकिन हमारी स्क्रीन हमें कुछ और कहानी सुना रही होती है.
किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि लोग अलग-अलग राय रख सकते हैं. लेकिन राय बनाने के लिए कम से कम कुछ बुनियादी तथ्य तो एक जैसे होने चाहिए. अगर वही अलग-अलग हो जाएं, तो बहस धीरे-धीरे संवाद से टकराव में बदलने लगती है. यही सोशल मीडिया के दौर की सबसे बड़ी चुनौती है.
पहले लोग सुबह अखबार पढ़ते थे या रात को टीवी पर खबर देखते थे. अलग-अलग चैनलों और अखबारों का अपना नजरिया हो सकता था, लेकिन देश के ज़्यादातर लोग कम से कम एक जैसी बड़ी घटनाओं से परिचित होते थे.
आज स्थिति बदल चुकी है. हर शख्स का मोबाइल एक अलग अखबार बन चुका है और उसका पहला पन्ना किसी एडिटर ने नहीं, बल्कि एल्गोरिदम ने तैयार किया है. यहीं से भरोसे का संकट शुरू होता है.
अगर किसी शख्स को लगातार ऐसे वीडियो दिखाई दें जिनमें पुलिस गलत दिख रही हो, तो धीरे-धीरे उसका भरोसा पुलिस पर कम हो सकता है. दूसरी तरफ़ अगर किसी दूसरे व्यक्ति को सिर्फ़ ऐसे वीडियो दिखें जिनमें प्रोटेस्टर्स हिंसक नज़र आ रहे हों, तो वह पूरे आंदोलन को उसी नज़र से देखने लगेगा.
ऐसे में सिर्फ़ पुलिस या प्रदर्शनकारी ही नहीं, मीडिया भी सवालों के घेरे में आ जाता है. अगर किसी चैनल की रिपोर्ट आपकी स्क्रीन पर दिखाई गई तस्वीर से अलग हो, तो आपको लग सकता है कि चैनल झूठ बोल रहा है, जबकि उसी रिपोर्ट पर भरोसा करने वाला कोई दूसरा शख्स आपको ग़लत मान सकता है.
यानी भरोसा सिर्फ़ संस्थाओं से नहीं, एक-दूसरे से भी कम होने लगता है. सबसे ज़्यादा नुकसान उन लोगों का होता है जो अभी तक किसी एक पक्ष में नहीं हैं. पहले उनके पास अलग-अलग सोर्स से जानकारी आती थी. अब वे भी धीरे-धीरे उसी डिजिटल धारा में बहने लगते हैं, जिसमें उन्हें सबसे ज़्यादा इमोशनल और अट्रैक्टिव कंटेंट दिखाई देता है. यहां ख़ूब सारा म्यूज़िक है जो लोगों को इमोशनल कर देता है.
यही वजह है कि सोशल मीडिया पर कई बार सबसे ज़ोरदार आवाज़, सबसे सही आवाज़ नहीं होती.
जंतर-मंतर पर महीने से ज्यादा तक चले इस विरोध प्रदर्शन का रिजल्ट यानी एजुकेशन मिनिस्टर ध्रमेंद्र प्रधान का इस्तीफा सिर्फ़ वहां मौजूद भीड़ से तय नहीं हुआ. यह इस बात से भी तय हुआ एल्गोरिद्म ने इस आंदोलन को किस तरह पुश किया है.
सोशल मीडिया की एक पुरानी समस्या यही है कि गलत जानकारी अक्सर बहुत तेज़ दौड़ती है, जबकि उसका खंडन पीछे रह जाता है. जब तक सच्चाई सामने आती है, तब तक लाखों लोग पहली कहानी पर विश्वास कर चुके होते हैं.
इसका मतलब यह नहीं कि सोशल मीडिया सिर्फ़ नुकसान पहुंचाता है. इसी प्लेटफ़ॉर्म ने इस आंदोलन को देश के अलग-अलग शहरों तक भी पहुंचाया. छात्रों के वीडियो, मौके से की गई लाइव रिपोर्टिंग, मीम, गाने और क्रिएटिव कंटेंट ने भी लोगों का ध्यान इस मुद्दे की ओर खींचा. कई ऐसे सवाल, जो शायद सीमित दायरे में रह जाते, वे राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बने.
यानी सोशल मीडिया एक औज़ार है. वही औज़ार लोगों को जोड़ भी सकता है और बांट भी सकता है. फर्क इस बात से पड़ता है कि उस पर सबसे ज़्यादा क्या फैल रहा है, फैक्ट या इमोशन्स, पूरी तस्वीर या आधी कहानी.
इस आंदोलन ने एक और बड़ा बदलाव दिखाया. सोशल मीडिया अब सिर्फ़ आम लोगों की आवाज़ नहीं, बल्कि राजनीति का भी सबसे अहम मैदान बन चुका है. राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल समेत कई बड़े नेताओं ने इंस्टाग्राम के लिए अलग से वर्टिकल वीडियो बनाए, ताकि उनका मैसेज उसी फॉर्मेट में युवाओं तक पहुंचे जिसे एल्गोरिदम ज़्यादा बढ़ावा देता है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इंस्टाग्राम पर ऐसा वर्टिकल वीडियो शेयर किया, जो उनके नॉर्मल भाषण से अलग था. इससे क्लियर है कि अब सिर्फ़ मैसेज क्या है, यह नहीं, बल्कि वह किस प्लेटफ़ॉर्म और किस फॉर्मेट में लोगों तक पहुंचता है, यह भी राजनीति का अहम हिस्सा बन चुका है.
इसी आंदोलन के दौरान बढ़ते जनदबाव के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा भी दिया. इससे यह समझना मुश्किल नहीं कि आज सोशल मीडिया पर बन रही जनभावना कई बार ज़मीनी राजनीति और सरकारी फैसलों तक असर डाल सकती है.
अगली बार जब किसी बड़े आंदोलन, चुनाव या राष्ट्रीय मुद्दे पर आपका इंस्टाग्राम या फेसबुक एक जैसी रील्स से भर जाए, तो एक मिनट रुकिए. अपने आप से पूछिए, क्या मैं पूरी तस्वीर देख रहा हूं या सिर्फ़ वही हिस्सा जो मेरे पिछले लाइक, कमेंट और वॉच हिस्ट्री के हिसाब से चुना गया है?
हो सकता है उसी समय आपके पड़ोसी के मोबाइल पर उसी घटना की बिल्कुल अलग तस्वीर चल रही हो. डिजिटल दौर में मीडिया लिटरेसी का मतलब सिर्फ़ फेक न्यूज़ पहचानना नहीं है. इसका मतलब यह भी है कि हमें यह समझना होगा कि हमारी फ़ीड दुनिया का आईना नहीं है. वह हमारे डिजिटल बिहेवियर का रिफ्लेक्शन भर है.