तीन मैच... और टीम इंडिया का अंदाज बदल गया. गौतम गंभीर की गैरमौजूदगी में वीवीएस लक्ष्मण ने अंतरिम कोच की जिम्मेदारी संभाली और कुछ ही दिनों में टीम के माहौल में बड़ा फर्क नजर आया. खिलाड़ियों का बढ़ा हुआ आत्मविश्वास, ड्रेसिंग रूम की सकारात्मकता और फैसलों में दिखी स्पष्टता ने लक्ष्मण की कोचिंग शैली को चर्चा में ला दिया.
जिम्बाब्वे में भारत ने टी20 सीरीज तो जीत ली, लेकिन असली चर्चा जीत से ज्यादा वीवीएस लक्ष्मण की रही. सिर्फ तीन मैचों में उन्होंने टीम इंडिया की तस्वीर बदल दी. खिलाड़ियों का बदला हुआ आत्मविश्वास, बेहतर माहौल और सोच-समझकर लिए गए फैसलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर लक्ष्मण ने ऐसा क्या किया, जिसने सबका ध्यान खींच लिया?
हार के दौर के बाद बदला माहौल
इंग्लैंड और आयरलैंड दौरा टीम इंडिया के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा. लगातार हार ने खिलाड़ियों के आत्मविश्वास को झटका दिया, जबकि गौतम गंभीर की प्रेस कॉन्फ्रेंस भी कई बार खेल से ज्यादा उनके बयानों की वजह से चर्चा में रहीं. 'देश पहले' और 'यह किसी एक खिलाड़ी की टीम नहीं' जैसे बयान सुर्खियों में बने रहे, लेकिन मैदान पर टीम के प्रदर्शन में बड़ा सुधार नजर नहीं आया.
इसके उलट, हरारे पहुंचते ही वीवीएस लक्ष्मण का अंदाज अलग दिखा. न कोई तल्ख बयान, न किसी तरह का विवाद. उन्होंने खिलाड़ियों का खुलकर समर्थन किया, हर सवाल का सहज जवाब दिया और यह संदेश दिया कि टीम में भरोसे और सकारात्मक माहौल की भी उतनी ही अहम भूमिका होती है, जितनी रणनीति की.
इसका असर खिलाड़ियों पर भी साफ दिखा. कप्तान श्रेयस अय्यर और युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी ने खुलकर वीवीएस लक्ष्मण की तारीफ की. लंबे समय बाद टीम इंडिया के ड्रेसिंग रूम से ऐसा माहौल नजर आया, जहां खिलाड़ी अपने कोच के साथ सहज दिखाई दिए.
बदलाव किए, लेकिन सोच-समझकर
लक्ष्मण की सबसे बड़ी खासियत उनकी चयन नीति रही. उन्होंने टीम में बदलाव जरूर किए, लेकिन सिर्फ प्रयोग के लिए प्रयोग नहीं किया. हर फैसला खिलाड़ी को मौका देने और टीम की जरूरत को ध्यान में रखकर लिया गया.
दूसरे टी20 में यश ठाकुर को मौका मिला, जबकि सीरीज जीतने के बाद तीसरे मुकाबले में सूर्यांश शेडगे को प्लेइंग इलेवन में शामिल किया गया. लक्ष्मण के फैसलों में यह साफ दिखा कि उनका उद्देश्य सिर्फ बदलाव करना नहीं, बल्कि खिलाड़ियों को तैयार करना था.
वहीं इंग्लैंड दौरे पर टीम चयन को लेकर कई सवाल खड़े हुए थे. वैभव सूर्यवंशी को तीन मैचों में आजमाने के बाद अचानक बाहर कर दिया गया और संजू सैमसन की वापसी हुई. लगातार बदलती प्लेइंग इलेवन ने टीम की रणनीति और खिलाड़ियों को दिए जा रहे भरोसे पर सवाल खड़े किए.
लक्ष्मण ने साफ संदेश दिया कि खिलाड़ी को सिर्फ मौका देना काफी नहीं है, उसे खुद को साबित करने के लिए भरोसा और समय भी देना जरूरी है.
युवा खिलाड़ियों से जुड़ाव बनी ताकत
वीवीएस लक्ष्मण की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उनका क्रिकेट ज्ञान नहीं, बल्कि खिलाड़ियों के साथ उनका मजबूत रिश्ता है. वह लंबे समय से युवा क्रिकेटरों के साथ काम करते आए हैं और यही अनुभव उन्हें खिलाड़ियों की सोच और जरूरतों को समझने में मदद करता है.
BCCI सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (पहले NCA) के प्रमुख रहते हुए लक्ष्मण ने अंडर-19, इंडिया-ए और कई उभरते खिलाड़ियों के साथ करीब से काम किया है. शुभमन गिल, यशस्वी जायसवाल और वैभव सूर्यवंशी जैसे खिलाड़ियों ने भी उनके अनुभव और मार्गदर्शन से काफी कुछ सीखा है.
यही वजह है कि लक्ष्मण जब भी टीम के साथ जुड़ते हैं, खिलाड़ियों को नए माहौल में ढलने में ज्यादा समय नहीं लगता. वे पहले से उनकी सोच, काम करने के तरीके और उम्मीदों को समझते हैं, जिससे मैदान पर तालमेल जल्दी बन जाता है.
तस्वीर पूरी तरह बदली हो, ऐसा भी नहीं
हालांकि यह कहना गलत होगा कि वीवीएस लक्ष्मण के आने से हर समस्या खत्म हो गई. उनकी कोचिंग में भी कुछ कमजोरियां नजर आईं, जिन पर टीम इंडिया को काम करना होगा.
भारत ने तीसरे टी20 में पांच कैच छोड़े और यह टीम की बड़ी कमजोरी के रूप में सामने आया. बल्लेबाजी और रणनीति में सुधार दिखा, लेकिन फील्डिंग अब भी चिंता का विषय बनी हुई है. आने वाले मुकाबलों में टीम इंडिया को इस क्षेत्र में तुरंत सुधार करना होगा.
यानी माहौल बदला है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बाकी हैं.
क्या फिर शुरू होगी नई बहस?
वीवीएस लक्ष्मण पहले भी कई बार अंतरिम कोच की भूमिका निभा चुके हैं और लगभग हर बार उनके काम की तारीफ हुई है. इसके बावजूद उन्होंने टीम इंडिया के स्थायी कोच बनने की बजाय BCCI सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी. उनका फोकस सिर्फ टीम को संभालने पर नहीं, बल्कि भविष्य के खिलाड़ियों को तैयार करने पर भी रहा है.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारतीय क्रिकेट भी भविष्य में अलग-अलग फॉर्मेट के लिए अलग-अलग कोच की नीति अपना सकता है? टेस्ट क्रिकेट की अपनी जरूरतें हैं और टी20-वनडे की अपनी चुनौतियां. ऐसे में लक्ष्मण जैसे अनुभवी और खिलाड़ियों को समझने वाले कोच की भूमिका को लेकर नई सोच शुरू हो सकती है.
गौतम गंभीर का कार्यकाल 2027 विश्व कप तक तय है और श्रीलंका दौरा उनके लिए बेहद अहम माना जा रहा है. वहीं, जिम्बाब्वे में वीवीएस लक्ष्मण के शांत और संतुलित नेतृत्व ने यह जरूर दिखा दिया कि भारतीय क्रिकेट के पास एक ऐसा विकल्प मौजूद है, जो खिलाड़ियों से सिर्फ प्रदर्शन नहीं, बल्कि भरोसे का रिश्ता भी बनाता है.
जिम्बाब्वे दौरे की तीन जीतों से यह फैसला नहीं हो सकता कि कौन बेहतर कोच है. लेकिन इस दौरे ने एक बात जरूर साबित कर दी कि कोचिंग सिर्फ रणनीति और नतीजों का खेल नहीं है, बल्कि खिलाड़ियों के भरोसे और टीम के माहौल को संभालने की कला भी है.
वीवीएस लक्ष्मण ने तीन मैचों में यही बदलाव दिखाया. उन्होंने याद दिलाया कि ड्रेसिंग रूम में सबसे बड़ा बदलाव हमेशा स्कोरबोर्ड पर नहीं दिखता, कई बार वह खिलाड़ियों के आत्मविश्वास, चेहरे की मुस्कान और मैदान पर उनके फैसलों में नजर आता है.