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वैभव सूर्यवंशी की कामयाबी सीनियर्स को क्यों खटकने लगी? तिलक वर्मा के तेवर ने उठाया सवाल

15 साल के वैभव सूर्यवंशी की तेजी से बढ़ती कामयाबी अब विपक्षी खिलाड़ियों का ध्यान खींच रही है. दलीप ट्रॉफी फाइनल में तिलक वर्मा के साथ हुई गरमागरमी ने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वैभव की सफलता अब सीनियर्स के लिए भी चुनौती बन रही है? हालांकि असली जवाब वैभव को मैदान पर अपने बल्ले से देना होगा.

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वैभव को रोकने का ‘मेंटल गेम’! (Photo: screengrab @StarSportsIndia)
वैभव को रोकने का ‘मेंटल गेम’! (Photo: screengrab @StarSportsIndia)

15 साल का लड़का जब मोहम्मद सिराज जैसे गेंदबाज को मैदान के चारों तरफ शॉट मारने लगे, तो विपक्ष के लिए उसकी उम्र मायने रखना बंद हो जाती है. चेन्नई में दलीप ट्रॉफी फाइनल के दौरान तिलक वर्मा और वैभव सूर्यवंशी के बीच हुई गरमागरमी इसी बदलती तस्वीर की कहानी है. सवाल सिर्फ इतना नहीं कि दोनों के बीच क्या हुआ? बड़ा सवाल यह है कि क्या वैभव की तेजी से बढ़ती कामयाबी अब सीनियर्स के लिए भी एक चुनौती बनने लगी है?

कल तक ‘बच्चा’, अब बड़े खिलाड़ियों की टेंशन

वैभव की कहानी बेहद तेजी से बदली है. पिछले सीजन तक जिस खिलाड़ी को क्रिकेट की दुनिया ‘बेबी’ या ‘बच्चा’ कहकर बुला रही थी, वही अब सीनियर घरेलू खिलाड़ियों के बीच टीम का उप-कप्तान है.

दलीप ट्रॉफी से पहले आईपीएल में उसकी तूफानी बल्लेबाजी ने उसे अलग पहचान दी. 15 साल की उम्र में बड़े-बड़े गेंदबाजों पर हमला करने वाला यह बल्लेबाज अब सिर्फ भविष्य का सितारा नहीं रह गया है. वह मौजूदा मुकाबलों में विपक्ष के लिए परेशानी बन चुका है.

दलीप ट्रॉफी के सेमीफाइनल में 92 और 40 रन बनाने के बाद फाइनल में भी वैभव ने शुरुआत उसी अंदाज में की. अब उसे रोकने के लिए सिर्फ फील्डिंग प्लान नहीं, बल्कि मानसिक दबाव भी एक हथियार बनता दिखा.

तिलक का तंज और फिर बढ़ी गर्मी

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फाइनल में ईस्ट जोन की पारी के दौरान वैभव और अभिमन्यु ईश्वरन ने तेजी से रन जुटाए. दोनों के बीच शतकीय साझेदारी हुई. वैभव ने सीनियर गेंदबाजों पर भी बिना किसी डर के हमला जारी रखा.

इसी दौरान साउथ जोन के कप्तान तिलक वर्मा ने वैभव को स्लेज करना शुरू किया.  11वें ओवर में उन्होंने कहा- ‘क्या यार, ये वाइस-कैप्टन.’

बात यहीं नहीं रुकी. दोनों के बीच बहस बढ़ी और तिलक वैभव की तरफ बढ़े. उनका हाथ भी ‘पंच’ जैसी मुद्रा में गया. वैभव पीछे हटने की बजाय उनके सामने डटा रहा. स्थिति बिगड़ती देख अंपायर को बीच में आकर दोनों को अलग करना पड़ा.

यह घटना भले ही कुछ सेकेंड की थी, लेकिन इसने एक बड़ा सवाल जरूर छोड़ दिया- क्या वैभव अब विपक्ष के लिए इतना बड़ा सिरदर्द बन चुका है कि उसकी उम्र भी उसके खिलाफ इस्तेमाल होने लगी है?

कामयाबी का एक साइड इफेक्ट भी होता है

क्रिकेट में कामयाबी सिर्फ तारीफ नहीं लाती. उसके साथ उम्मीदें, दबाव और विरोधी टीम का अतिरिक्त ध्यान भी आता है.

जब कोई किशोर खिलाड़ी लगातार सुर्खियां बटोरता है, तो विपक्ष उसे सामान्य बल्लेबाज की तरह नहीं देखता. उसके लिए अलग फील्ड लगती है, गेंदबाजी की अलग रणनीति बनती है और कई बार मानसिक खेल भी शुरू हो जाता है.

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वैभव के साथ यही बदलाव दिखाई दे रहा है. वह अब ऐसा बल्लेबाज नहीं है जिसे सिर्फ इसलिए हल्के में लिया जाए क्योंकि उसकी उम्र 15 साल है. मैदान पर उसकी पहचान उसकी उम्र से नहीं, उसके बल्ले से बन रही है.

सिराज पर हमला क्या बताता है?

सिराज पर हमला बताता है कि वैभव कितना बदल चुका है. फाइनल में भी इसका उदाहरण देखने को मिला. वैभव ने शुरुआत से ही आक्रामक रुख अपनाया. सीनियर तेज गेंदबाजों के खिलाफ उसके शॉट्स में किसी तरह की झिझक नहीं दिखी.

37 गेंदों में 44 रन- 5 चौके और एक छक्का. एक बार फिर वैभव ने दिखाया कि बड़े नाम और बड़े गेंदबाज उसके खेल के आड़े नहीं आते.

हालांकि इस पारी में भी वही पुरानी कहानी दोहराई गई. शुरुआत शानदार, लेकिन बड़ी पारी में तब्दील नहीं हो सकी. शॉर्ट गेंद पर अतिरिक्त उछाल ने उसका बल्ला चूका दिया और टॉप एज के जरिए कैच हो गया.

यानी वैभव को अब सिर्फ विपक्ष के मानसिक खेल से नहीं, अपने आक्रामक खेल को नियंत्रित करने की चुनौती से भी निपटना है.

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15 साल के वैभव से क्यों भिड़े तिलक? (Photo: Screengrab @StarSportsIndia)

क्या सच में सीनियर्स को खटकने लगी है कामयाबी?

यह कहना जल्दबाजी होगी कि तिलक का रवैया ‘जलन’ या किसी व्यक्तिगत परेशानी का नतीजा था. मैदान पर स्लेजिंग क्रिकेट का पुराना हिस्सा है और कई बार खिलाड़ी मुकाबले की गर्मी में एक-दूसरे को उकसाते हैं. लेकिन इस घटना ने एक दिलचस्प बदलाव जरूर सामने रखा है.

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वैभव को अब विपक्षी खिलाड़ी ‘बच्चा’ मानकर छोड़ने वाले नहीं हैं. उसकी तेजी से बढ़ती लोकप्रियता और मैदान पर बेखौफ बल्लेबाजी ने उसे ऐसा खिलाड़ी बना दिया है, जिस पर दबाव बनाने की कोशिश की जा सकती है.

यही किसी युवा खिलाड़ी की कामयाबी का असली अगला पड़ाव होता है.

... असली परीक्षा अब यहीं से शुरू

वैभव के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं कि कोई सीनियर उससे उलझा या स्लेज किया. असली परीक्षा यह है कि वह ऐसी परिस्थितियों में खुद को कितना संभालता है.

92, 40 और 44 जैसी पारियां बताती हैं कि रन बनाने की क्षमता में कोई कमी नहीं है. अब अगला कदम इन शुरुआतों को बड़ी पारियों में बदलना है.

क्योंकि जैसे-जैसे उसका कद बढ़ेगा, विपक्ष का दबाव भी बढ़ेगा. स्लेजिंग होगी, फील्डिंग प्लान बदले जाएंगे और गेंदबाज उसकी कमजोरियां तलाशेंगे.

अब जवाब बल्ले से देना होगा

तिलक वर्मा के साथ हुई घटना को सिर्फ दो खिलाड़ियों की छोटी-सी तकरार मानकर छोड़ देना आसान है. लेकिन वैभव की कहानी में यह एक संकेत जरूर है.

15 साल का यह बल्लेबाज अब उस मुकाम पर पहुंच रहा है जहां विपक्ष उसकी उम्र नहीं, उसकी क्षमता देख रहा है. कल तक सवाल था- ‘इतने छोटे बच्चे को मौका क्यों?’ आज सवाल बदल चुका है- ‘इसे रोका कैसे जाए? और शायद यही वैभव की तेजी से बढ़ती कामयाबी का सबसे बड़ा सबूत है. अब उसे हर सवाल का जवाब बहस से नहीं, बल्ले से देना है.

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