बिहार के सासाराम से निकलकर भारतीय टेस्ट टीम तक पहुंचने वाले क्रिकेटर आकाश दीप ने अपने संघर्ष की पूरी कहानी पटना में आयोजित पंचायत आजतक के मंच से साझा की. इस सत्र का नाम "खेलोगे कूदोगे बनोगे नवाब" रखा गया, जिसे श्वेता सिंह ने होस्ट किया. आकाश दीप ने बताया कि गांव में क्रिकेट खेलना तो दूर, उस समय यह लगभग असंभव जैसा माना जाता था. उन्होंने अपने पिता और बड़े भाई को एक ही साल के भीतर खो दिया था, जब उनकी उम्र महज बीस साल थी. इस मुश्किल दौर ने ही उन्हें घर से बाहर निकलने और अपने सपने की तरफ बढ़ने की हिम्मत दी.
श्वेता सिंह ने सत्र की शुरुआत में कहा कि क्रिकेट ऐसा क्षेत्र है जहां से खिलाड़ी सिर्फ अपने राज्य का नहीं, बल्कि पूरे देश का नाम रोशन करते हैं. उन्होंने आकाश दीप को स्टेज पर आमंत्रित करते हुए यह उम्मीद जताई कि जल्द ही बिहार के खिलाड़ी बड़ी संख्या में भारतीय टीम का हिस्सा बनेंगे. इस पर आकाश ने जवाब दिया कि खेल के नजरिए से पूरा भारत एक ही है, इसलिए सिर्फ बिहार इलेवन कहना सही नहीं होगा. उन्होंने कहा कि जिस तरह से बिहार से बच्चे आगे आ रहे हैं, आने वाले समय में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी संख्या और बढ़ेगी.
आकाश दीप ने बताया कि सासाराम जैसी छोटी जगह से निकलकर भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेलना उनके लिए सपने जैसा है. उनका कहना था कि जब वे गांव में रहते थे, तब ऐसा सपना देखना भी मुश्किल था. लेकिन जब उन्होंने मेहनत करना और खुद पर भरोसा करना शुरू किया, तो यह सफर उतना कठिन नहीं लगा. उन्होंने कहा कि जब इंसान किसी काम से दूर रहता है तो वह सपने जैसा लगता है, लेकिन जब उसमें पूरी लगन से जुट जाओ तो वही काम आसान लगने लगता है.
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गांव में क्रिकेट ग्राउंड की कमी पर बात करते हुए आकाश ने बताया कि उस समय बिहार में क्रिकेट खेलना लगभग अपराध जैसा माना जाता था, क्योंकि वहां कोई भी ऐसा खिलाड़ी नहीं था जिसने खेल के जरिए अपना भविष्य सुरक्षित किया हो. मिडल क्लास और लोअर मिडल क्लास परिवार यही चाहते थे कि उनके बच्चों का भविष्य किसी तरह सुरक्षित हो जाए, जो उस दौर में क्रिकेट या किसी भी खेल में संभव नहीं दिखता था. उनके पिता खुद एक शिक्षक थे. सत्र का नाम भी उस पुराने मुहावरे से लिया गया, जो पहले माता-पिता अक्सर बच्चों से कहते थे कि खेलोगे कूदोगे होगे खराब, पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब.
आकाश ने भावुक होकर कहा कि आज वे खेल की बदौलत डीएसपी बन चुके हैं, लेकिन उनके पिता आज इस दुनिया में नहीं हैं. उन्होंने बिहार सरकार की नीतियों की सराहना की, जिनके तहत आज खेल में अच्छा प्रदर्शन करने वाले बच्चों का भविष्य भी सुरक्षित किया जा रहा है.
अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए आकाश ने बताया कि पिता और भाई को खोने के बाद उन्हें लगा कि अब खोने के लिए कुछ नहीं बचा, इसलिए उन्हें पाने के लिए बाहर निकलना चाहिए. वे 20-21 साल की उम्र में दिल्ली गए, जहां उनकी बहन और आर्मी में तैनात ब्रदर इन लॉ पोस्टेड थे. दिल्ली जाकर उन्हें पहली बार लेदर बॉल क्रिकेट देखने को मिला, क्योंकि गांव में उन्होंने सिर्फ सॉफ्टबॉल क्रिकेट खेली थी. उन्हें बॉल भारी लगी और अलग तरह के जूतों के बारे में भी पहली बार पता चला. धीरे धीरे उन्होंने इन चीजों को समझा और फिर कोलकाता के लिए आगे बढ़े.
आकाश दीप ने कोलकाता जाने के बाद अपनी क्रिकेट यात्रा में एक बड़ा मोड़ लिया. उन्होंने बताया कि गांव में वे बैट्समैन थे, लेकिन शहर आने पर उन्हें पता चला कि बैटिंग किट काफी महंगी आती है, जिसे खरीदने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे. इसलिए उन्होंने बॉलिंग को अपना रास्ता बनाया, क्योंकि बॉलिंग में खर्चा नहीं होता था और बैट्समैन खुद अपनी गेंद और जूस भी लेकर आता था. आकाश ने हल्के अंदाज में कहा कि पैसों की कमी की वजह से उन्होंने गेंद को चुना, लेकिन इसी फैसले ने आगे चलकर विरोधी टीमों के लिए रन बनाना मुश्किल कर दिया.
कोलकाता पहुंचने के बाद आकाश ने खुद को पूरी तरह मेहनत में डाल दिया. वे बताते हैं कि उस दौर में फोन तक नहीं देखते थे. रात आठ नौ बजे सो जाते थे और सुबह पांच बजे उठकर खुद नाश्ता बनाते थे, फिर बस पकड़कर प्रैक्टिस के लिए निकल जाते थे. उनका कहना है कि गांव में जो मेहनत उन्होंने बिना यह जाने की थी कि वह किस काम आएगी, उसका फल उन्हें कोलकाता में सीधे मिल गया. वे किसी अकादमी में लंबे समय तक नहीं रुके, बल्कि सीधे क्लब क्रिकेट खेला और अगले ही साल 2023 में प्रोफेशनल क्रिकेट के लिए चुन लिए गए. पहले ही साल में उनकी टीम फाइनल तक पहुंची.
टेस्ट टीम में चुने जाने की कहानी भी दिलचस्प है. आकाश ने बताया कि जब उन्हें पहली बार भारतीय टीम के लिए बुलावा आना था, तब राहुल द्रविड़ का मैसेज आया था कि वे अगले दिन खेल रहे हैं. लेकिन उनके फोन में द्रविड़ का नंबर सेव नहीं था, इसलिए उन्होंने वह मैसेज नजरअंदाज कर दिया, यह सोचकर कि यह किसी की तरफ से मैच से पहले आने वाला सामान्य मैसेज है. करीब डेढ़ घंटे तक वे बेचैन रहे, फिर उन्होंने उस अनजान नंबर का मैसेज ध्यान से देखा और पता चला कि यह द्रविड़ का ही मैसेज था. उन्होंने तुरंत ही कॉल करके माफी मांगी. आकाश कहते हैं कि यह उनके लिए जिंदगी का सबसे बड़ा अवसर था, और उन्होंने उन पांच दिनों को अपने बाईस तेईस साल की मेहनत की परीक्षा की तरह देखा. संयोग से उनका पहला टेस्ट मैच रांची में हुआ, जो बिहार के करीब है, जिससे उनकी मां और परिवार भी मैच देखने पहुंच सके.
टेस्ट टीम में चुने जाने की कहानी भी दिलचस्प है. आकाश ने बताया कि जब उन्हें पहली बार भारतीय टीम के लिए बुलावा आना था, तब राहुल द्रविड़ का मैसेज आया था कि वे अगले दिन खेल रहे हैं. लेकिन उनके फोन में द्रविड़ का नंबर सेव नहीं था, इसलिए उन्होंने वह मैसेज नजरअंदाज कर दिया, यह सोचकर कि यह किसी की तरफ से मैच से पहले आने वाला सामान्य मैसेज है. करीब डेढ़ घंटे तक वे बेचैन रहे, फिर उन्होंने उस अनजान नंबर का मैसेज ध्यान से देखा और पता चला कि यह द्रविड़ का ही मैसेज था. उन्होंने फौरन कॉल करके माफी मांगी. आकाश कहते हैं कि यह उनके लिए जिंदगी का सबसे बड़ा अवसर था, और उन्होंने उन पांच दिनों को अपने बाईस तेईस साल की मेहनत की परीक्षा की तरह देखा. संयोग से उनका पहला टेस्ट मैच रांची में हुआ, जो बिहार के करीब है, जिससे उनकी मां और परिवार भी मैच देखने पहुंच सके.
आकाश ने यह भी बताया कि जिस समय उन्होंने क्रिकेट खेलना शुरू किया था, उस वक्त बिहार की रणजी टीम नहीं थी, इसलिए वे बंगाल के लिए खेले. अब बिहार में भी टीम बन गई है और वे वहां से भी खेलते हैं. दोस्तों के सुझाव पर उनका कहना है कि एक भारतीय खिलाड़ी के तौर पर उनका फोकस हमेशा देश के लिए खेलने पर रहता है, लेकिन इसके साथ अपनी क्षेत्रीय पहचान बनाए रखना भी जरूरी है. उन्होंने वैभव सूर्यवंशी के उस पल को याद किया जब जश्न के दौरान पंजाबी गानों की जगह भोजपुरी गाने बजाने की मांग की गई थी. आकाश ने भोजपुरी को अपनी मां की भाषा बताया और कहा कि इस भाषा में जो खुशी और अपनापन मिलता है, वह किसी और भाषा में नहीं मिल सकता. उन्होंने अभिषेक शर्मा की तीस गेंदों में शतक लगाने वाली पारी की भी तारीफ की और कहा कि वे समय मिलने पर क्रिकेट के मैच जरूर फॉलो करते हैं.