कभी टीम इंडिया के तीनों फॉर्मेट में जगह बनाने वाले ईशान किशन अचानक टीम से दूर हो गए थे. जिस खिलाड़ी को भारतीय क्रिकेट का अगला बड़ा विकेटकीपर-बल्लेबाज माना जा रहा था, उसके हिस्से में मुश्किलों का ऐसा दौर आया, जिसने करियर पर ही सवाल खड़े कर दिए. BCCI का सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट गया, टीम इंडिया से दूरी बनी और करीब दो साल तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का रास्ता बंद रहा... लेकिन इसी मुश्किल दौर में ईशान ने खुद को दोबारा गढ़ना शुरू किया. इस बदलाव की शुरुआत बल्ले से नहीं, बल्कि झारखंड की कप्तानी से हुई.
अब चेन्नई में 28 साल के ईशान किशन ने दलीप ट्रॉफी फाइनल में 270 रनों की ऐतिहासिक पारी खेली है, तो यह सिर्फ एक बड़ी पारी नहीं है. यह उस खिलाड़ी की कहानी है, जिसने अपने करियर के सबसे कठिन दौर से निकलकर अपने खेल और सोच दोनों को बदल दिया.
जब सब कुछ तेजी से बदल गया
2023 के मध्य तक ईशान का करियर बिल्कुल अलग दिशा में जा रहा था. वेस्टइंडीज दौरे पर टेस्ट डेब्यू के साथ उन्होंने खुद को भारत के ऑल-फॉर्मेट खिलाड़ियों में स्थापित कर लिया था. लेकिन कुछ ही महीनों में परिस्थितियां बदल गईं.
दक्षिण अफ्रीका दौरे के दौरान उन्होंने टेस्ट कैंप छोड़ा. इसके बाद घरेलू क्रिकेट खेलने को लेकर BCCI की अपेक्षाओं के मुताबिक भी वह मैदान पर नहीं उतरे. इसका असर उनके करियर पर पड़ा. वह टीम इंडिया की प्लानिंग से बाहर हुए और सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट भी गंवा बैठे.
एक ऐसा खिलाड़ी, जो कुछ महीने पहले भारतीय क्रिकेट के भविष्य का हिस्सा दिखाई दे रहा था, अचानक राष्ट्रीय टीम से दूर था. लेकिन ईशान ने यहीं से वापसी का रास्ता तलाशना शुरू किया.
A 522-minute magnificent 2️⃣7️⃣0️⃣-run knock ⏳🏏
— BCCI Domestic (@BCCIdomestic) September 8, 2026
Big-match player acing the finals yet again 💥
Team always comes first 🤝❤️
Ishan Kishan breaks down his Chepauk heroics 🔥 - By @jigsactin
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झारखंड ने बदला ईशान का नजरिया
घरेलू क्रिकेट में लौटे तो इस बार भूमिका सिर्फ बल्लेबाज की नहीं थी. ईशान ने झारखंड की कप्तानी संभाली. यही उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ.
ईशान के मुताबिक कप्तानी ने उन्हें जिम्मेदारी समझना सिखाया. अब उन्हें सिर्फ अपनी बल्लेबाजी के बारे में नहीं सोचना था. मैदान पर हर खिलाड़ी की स्थिति पर नजर रखनी थी, उसकी जरूरत समझनी थी और यह देखना था कि पूरी टीम कैसे बेहतर प्रदर्शन कर सकती है.
ईशान ने दलीप ट्रॉफी में 270 रनों की पारी के बाद बताया कि कप्तानी ने उन्हें इंसान, क्रिकेटर और लीडर के तौर पर काफी बदला. उन्होंने यहां तक कहा कि कप्तानी ने उन्हें उनके ‘वाइल्ड चाइल्ड’ वाले दिनों से दूर रखा.
यह बदलाव सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रहा. उनकी बल्लेबाजी में भी इसका असर दिखा.
‘अब सिर्फ मेरे रन मायने नहीं रखते’
ईशान ने माना कि पहले युवा खिलाड़ी के तौर पर उनकी सोच अलग थी. तब टीम के सीनियर खिलाड़ी रन बनाते थे और बाकी खिलाड़ी उन्हें सपोर्ट करने की कोशिश करते थे. लेकिन अब वह खुद टीम के स्थापित खिलाड़ियों में हैं और उन्हें लगता है कि टीम का स्कोर बढ़ाने की प्राथमिक जिम्मेदारी भी उनकी है.
यानी सोच बदल चुकी थी. अब ईशान के लिए सिर्फ यह अहम नहीं था कि वह कितने रन बना रहे हैं. वह यह भी देखने लगे कि उनकी पारी से टीम को कितना फायदा हो रहा है.
कप्तानी ने उन्हें यह भी सिखाया कि टीम के बाकी खिलाड़ियों को बेहतर बनाना भी कप्तान की जिम्मेदारी है.
ईशान के मुताबिक खिलाड़ी अक्सर नेट्स में आते हैं, बल्लेबाजी करते हैं और वापस चले जाते हैं. लेकिन कप्तान बनने के बाद नजर इस बात पर जाती है कि साथी खिलाड़ी कहां सुधार कर सकता है और उसकी मदद कैसे की जाए.
उनकी सोच साफ थी- अगर टीम का हर खिलाड़ी बेहतर होगा, तो टीम के लक्ष्य हासिल करना आसान होगा.
फिर घरेलू क्रिकेट में निकला नया ईशान
कप्तानी के साथ ईशान का घरेलू क्रिकेट में प्रदर्शन भी लगातार बेहतर होता गया. 2025-26 रणजी ट्रॉफी में उन्होंने शतक लगाए. इसके बाद सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी में झारखंड की टीम ने खिताब जीता और ईशान ने 517 रन बनाकर अहम भूमिका निभाई. इस दौरान उनके बल्ले से दो शतक भी निकले.
यही वह प्रदर्शन था, जिसने उनके लिए टीम इंडिया का दरवाजा दोबारा खोला. पहले टी20 इंटरनेशनल टीम में वापसी हुई. फिर IPL में लगातार अच्छे प्रदर्शन के बाद वनडे टीम में भी जगह मिली.
करीब दो साल पहले जो खिलाड़ी भारतीय क्रिकेट से लगभग गायब हो गया था, वह धीरे-धीरे वापस राष्ट्रीय टीम की तस्वीर में लौट आया.
270 में दिखा कप्तान वाला ईशान
दलीप ट्रॉफी फाइनल की 270 रन की पारी इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल बन गई.
ईशान का स्वाभाविक खेल आक्रामक है. वह गेंदबाजों पर टूट पड़ने के लिए जाने जाते हैं. लेकिन चेन्नई में उन्होंने सिर्फ आक्रामकता नहीं दिखाई, बल्कि हालात को समझकर बल्लेबाजी की.
टीम ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी चुनी थी. मकसद था बड़ा स्कोर खड़ा करना. ऐसे में ईशान ने अपने शॉट चयन पर नियंत्रण रखा और लंबे समय तक क्रीज पर टिके रहे.
उन्होंने माना कि कई मौकों पर वह आक्रामक शॉट खेल सकते थे, लेकिन टीम के लक्ष्य को प्राथमिकता देना ज्यादा जरूरी था.
यही वह बात है जो उनके पुराने और नए अंदाज के बीच फर्क बताती है.
पहले ईशान की बल्लेबाजी में ‘मैं कितना बड़ा स्कोर कर सकता हूं’ ज्यादा दिखाई देता था. अब उसमें ‘मेरी पारी से टीम को कितना फायदा होगा’ वाला सवाल भी शामिल है.
टीम इंडिया से दूरी ने जो सिखाया, कप्तानी ने उसे पक्का किया
ईशान का कमबैक इसलिए खास है क्योंकि यह सिर्फ फॉर्म में वापसी की कहानी नहीं है. उन्होंने उस दौर में टीम इंडिया की जगह गंवाई, जब उनका करियर तेजी से ऊपर जा रहा था. BCCI कॉन्ट्रैक्ट खोया. घरेलू क्रिकेट में लौटना पड़ा. फिर कप्तानी की जिम्मेदारी मिली... और उसी जिम्मेदारी ने उन्हें अपने खेल को नए नजरिए से देखने का मौका दिया.
𝐻𝑒 𝑤𝑎𝑙𝑘𝑒𝑑 𝑏𝑎𝑐𝑘 𝑤𝑖𝑡ℎ 250… 𝑎𝑛𝑑 𝑎 𝑤ℎ𝑜𝑙𝑒 𝑙𝑜𝑡 𝑜𝑓 𝑎𝑝𝑝𝑙𝑎𝑢𝑠𝑒. 👏
— Star Sports (@StarSportsIndia) September 7, 2026
Captain Ishan Kishan's 250 puts East Zone firmly in the driving seat in the final. 💪
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ईशान कहते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया से गुजरने के बाद इंसान के तौर पर काफी बदलाव आता है. शुरुआत में शायद इसका एहसास नहीं होता, लेकिन धीरे-धीरे सोच बदलती है और व्यक्ति चीजों को लेकर ज्यादा शांत हो जाता है. और शायद यही उनके 270 में भी दिखाई दिया.
270 रन बल्ले का आंकड़ा है, लेकिन उसके पीछे ईशान की बदली हुई सोच की पूरी कहानी छिपी है.
कभी ‘वाइल्ड चाइल्ड’ कहे जाने वाले ईशान अब जिम्मेदारी की बात करते हैं. कभी उनका खेल सिर्फ विस्फोटक बल्लेबाजी के लिए जाना जाता था, अब उसी बल्लेबाज की जुबान पर टीम का लक्ष्य, धैर्य और परिस्थितियों की समझ है.