चेन्नई में दलीप ट्रॉफी का फाइनल खत्म हुआ तो ईस्ट जोन के खिलाड़ी जश्न मना रहे थे, लेकिन क्रिकेट के लिहाज से मुकाबला एक बड़ा सवाल छोड़ गया. पांच दिन तक चले इस फाइनल में ट्रॉफी का फैसला आखिरी दिन नहीं, बल्कि पहली पारी में ही लगभग तय हो गया था. ईस्ट जोन ने 708 रन बनाए, दक्षिण जोन को 366 रन पर समेटकर बड़ी बढ़त हासिल की और इसके साथ ही खिताब उसकी मुट्ठी में आ गया.
इसके बाद असली सवाल था- क्या ईस्ट जोन जोखिम लेकर मैच जीतने की कोशिश करेगा?
जवाब था- क्यों करेगा?
यही दलीप ट्रॉफी के उस नियम की सबसे बड़ी विडंबना है, जिसमें नॉकआउट मुकाबला दूसरी पारी पूरी होने से पहले खत्म होने पर पहली पारी की बढ़त के आधार पर विजेता तय किया जाता है. यानी पहली पारी में बढ़त हासिल करते ही टीम के पास ट्रॉफी जीतने का सबसे बड़ा हथियार आ जाता है. फिर मैच को जबरन निर्णायक बनाने के लिए अतिरिक्त जोखिम लेने का फायदा सीमित हो जाता है.
बढ़त मिली तो जीत की भूख क्यों बढ़े?
ईस्ट जोन के कप्तान ईशान किशन ने इस मानसिकता को बिल्कुल साफ शब्दों में सामने रखा था. जब उनसे फॉलोऑन को लेकर सवाल हुआ तो उन्होंने कहा कि उनकी टीम ने करीब दो दिन बल्लेबाजी की है और मुकाबला मूल रूप से 'पहली पारी का खेल' है. पहली प्राथमिकता दक्षिण के सभी 10 विकेट लेना है और उसके बाद फिर बल्लेबाजी करना ज्यादा स्वाभाविक विकल्प होगा.
ईशान ने हंसते हुए सवाल किया- वह दोबारा गर्मी में जाकर तीन दिन गेंदबाजी क्यों करना चाहेंगे?
मजाक में कही गई यह बात असल में नियम की पूरी तस्वीर सामने रख देती है.
जब पहली पारी की बढ़त ट्रॉफी की सुरक्षा कर रही हो, तो कप्तान से यह उम्मीद करना मुश्किल है कि वह अपनी टीम का खिताब दांव पर लगाकर विपक्षी को दोबारा बल्लेबाजी का मौका देगा. क्रिकेट में आक्रामकता की अपनी कीमत होती है और यहां उस जोखिम का इनाम उतना बड़ा नहीं था.
𝙏𝙝𝙖𝙩 𝙒𝙞𝙣𝙣𝙞𝙣𝙜 𝙁𝙚𝙚𝙡𝙞𝙣𝙜 🏆
— BCCI Domestic (@BCCIdomestic) September 10, 2026
Congratulations to the Ishan Kishan-led East Zone on winning their third #DuleepTrophy title 👏👏#EZvSZ | @ishankishan51 pic.twitter.com/u6D4UvOTEp
फाइनल पांच दिन का, फैसला पहली पारी में!
दलीप ट्रॉफी जैसे टूर्नामेंट का फाइनल घरेलू क्रिकेट के सर्वश्रेष्ठ रेड-बॉल खिलाड़ियों की परीक्षा होना चाहिए. लेकिन अगर पहली पारी की बढ़त ही खिताब तय करने की दिशा में इतनी निर्णायक हो जाए, तो मैच की दूसरी पारी का महत्व घट जाता है.
यही वजह है कि चेपॉक में मुकाबला धीरे-धीरे उस मुकाम पर पहुंच गया, जहां जीत के लिए लड़ने के बजाय बढ़त को सुरक्षित रखना ज्यादा समझदारी थी.
ईस्ट ने दूसरी पारी भी खेली और पांचवें दिन चाय से करीब आधे घंटे पहले पारी घोषित कर दी. दक्षिण जोन के पास लक्ष्य का पीछा करने और मुकाबले को पलटने के लिए पर्याप्त समय नहीं था. दोनों कप्तान मिले, हाथ मिलाया और फाइनल का अंत ड्रॉ के साथ हो गया.
कागज पर यह ड्रॉ था. लेकिन नियम के हिसाब से ईस्ट जोन पहले ही चैम्पियन बन चुका था.
पिच ने भी नहीं बढ़ाई मुश्किल
मामला सिर्फ नियम का नहीं था. चेन्नई की लाल मिट्टी वाली पिच ने भी बल्लेबाजों को काफी सहूलियत दी. पांच दिनों में सतह में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया. कभी गेंद नीची रही तो कभी उछली, लेकिन गेंदबाजों को लगातार परेशान करने वाली मदद नहीं मिली.
ईस्ट जोन के कोच रतन कुमार ने भी पिच को लेकर शिकायत नहीं की. उनका कहना था कि यह शानदार बल्लेबाजी वाली सतह थी और जिस बल्लेबाज ने खुद को लगाया, उसने बड़े रन बनाए.
यही वजह रही कि ईशान किशन ने 334 गेंदों पर 270 रनों की मैराथन पारी खेलकर ईस्ट को 708 तक पहुंचाया. दक्षिण जोन ने 366 रन बनाए, लेकिन पहली पारी की विशाल बढ़त के बाद मुकाबले की दिशा बदल चुकी थी.
चयन ने भी कमजोर किया मुकाबला
साउथ जोन की टीम में कुछ अनुभवी घरेलू खिलाड़ियों की गैरमौजूदगी ने भी सवाल खड़े किए. करुण नायर और आर साई किशोर जैसे खिलाड़ी फाइनल में नहीं थे और दूसरे मुकाबलों में खेल रहे थे.
एक बड़ा फाइनल तब और दिलचस्प बनता है जब दोनों टीमें अपने सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध खिलाड़ियों के साथ मैदान में उतरें. यहां चयन, पिच और नियम- तीनों ने मिलकर मुकाबले के रोमांच को सीमित कर दिया.

फाइनल में 15 साल के वैभव सूर्यवंशी को देखने के लिए चेपॉक में दर्शकों की अच्छी दिलचस्पी दिखी. इस किशोर बल्लेबाज ने मैच को लेकर उत्सुकता भी बढ़ाई.
लेकिन जैसे-जैसे ईस्ट जोन की पहली पारी लंबी होती गई, मुकाबला धीरे-धीरे एक ऐसे खेल में बदल गया जहां जीतने से ज्यादा जरूरी बढ़त हासिल करना था.
ईस्ट जोन के लिए यह फिर भी ऐतिहासिक जीत रही. टीम ने लंबे इंतजार के बाद दलीप ट्रॉफी अपने नाम की. इससे पहले उसने 2012-13 में खिताब जीता था. जीत के बाद खिलाड़ियों ने मैदान का चक्कर लगाकर दर्शकों का शुक्रिया भी अदा किया.
... लेकिन इस जश्न के बीच एक सवाल जरूर रह गया
अगर पहली पारी में बढ़त बनाते ही ट्रॉफी लगभग पक्की हो जाती है, तो फाइनल के आखिरी दो दिन में कप्तान आखिर कितना जोखिम लेगा?
बीसीसीआई को अब दलीप ट्रॉफी के इस Old Rule पर फिर से सोचना चाहिए. पहली पारी में बढ़त मिलते ही अगर ट्रॉफी लगभग पक्की हो जाती है, तो कप्तान मैच जीतने के लिए जोखिम क्यों उठाएगा? चेन्नई के फाइनल ने साफ दिखा दिया कि यह नियम मुकाबले को रोमांचक बनाने की बजाय रणनीति को सुरक्षित खेलने की तरफ धकेलता है. फाइनल में जीत की भूख चाहिए, सिर्फ पहली पारी की बढ़त बचाने की मजबूरी नहीं.