दुनिया में पानी लगातार चिंता का विषय बना हुआ है. कहीं नदियों का बहाव सामान्य से कम हो गया है तो कहीं कुछ ही समय में इतनी बारिश हो रही है कि बाढ़ जैसे हालात पैदा हो जाते हैं. विश्व मौसम विज्ञान संगठन यानी WMO की स्टेट ऑफ ग्लोबल वॉटर रिसोर्सेज 2025 रिपोर्ट ने इसी बदलते जल पैटर्न को लेकर गंभीर चिंता जताई है.
रिपोर्ट की मानें, तो 2025 में दुनिया के नदियों का प्रवाह पिछले 35 सालों में सबसे सूखा रहा. दूसरी तरफ 2014-16 के बाद से जमीन पर मौजूद कुल जल भंडारण में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है.
जानकारी के मुताबिक, 2025 में वैश्विक नदी बेसिन के करीब 36% हिस्से में सामान्य से कम जल प्रवाह दर्ज किया गया. लगातार सातवें साल सामान्य नदी प्रवाह वाले बेसिन बेहद कम रहे. बेसिन वह इलाका होता है जहाँ बारिश का पानी नालों, छोटी नदियों और नदियों के जरिए एक मुख्य नदी में जाकर मिल जाता है.
1991-2020 के औसत में जहां करीब 46% बेसिन सामान्य स्थिति में रहते थे, वहीं 2021 से 2025 के बीच यह आंकड़ा सिर्फ 34 से 38% तक सिमट कर रह गया. एशिया में मिडिल एशिया और मिडिल ईस्ट के कई हिस्सों में नदी प्रवाह सामान्य से कम दर्ज किया गया. हालांकि साउथ और साउथ ईस्ट एशिया के कई क्षेत्रों में 2025 के दौरान सामान्य से ज्यादा पानी दर्ज किया गया.
अब भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या भू जल और जल के भंडारण को लेकर है. रिपोर्ट में उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से कम जल भंडारण दर्ज होने की बात कही गई है. उत्तर-पश्चिमी भारत में लगातार गिरता जलस्तर लंबे समय के जल संकट की ओर इशारा करता है. भारत की खेती, पानी और उद्योगों की बड़ी जरूरतें भूजल से पूरी होती हैं. ऐसे में कमजोर मानसून, बढ़ता तापमान से आने वाले समय में पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है.
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एशिया में बाढ़ और सूखे का दोहरा संकट
WMO के मुताबिक, पिछले पांच सालों में एशिया और अफ्रीका पानी से जुड़ी समस्याओं से सबसे ज्यादा प्रभावित रहे. इन घटनाओं से जुड़ी 80% से ज्यादा मौतें भी इन्हीं दोनों क्षेत्रों में हुईं. दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में 2025 में चक्रवात और अत्यधिक मानसूनी बारिश कई देशों पर भारी पड़ी. श्रीलंका, पाकिस्तान, वियतनाम, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया और फिलीपींस में ऐसी घटनाओं से हजारों लोगों की मौत हुई.
ग्लेशियर पिघलने से गहराया खतरा
साल 2025 में दुनिया भर के ग्लेशियरों ने करीब 408 गीगाटन बर्फ पिघले. इससे समुद्र का पानी करीब 1.1 मिलीमीटर तक ऊपर आया. यह लगातार चौथा साल है जब सभी बड़े ग्लेशियर इलाकों में बर्फ की कमी हुई है.
हिमालयी ग्लेशियर भारत और पूरे दक्षिण एशिया के लिए बेहद अहम हैं. गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी नदीयों पर इनका सीधा असर पड़ता है. तेजी से पिघलते ग्लेशियर पहले अचानक बाढ़ और तेज बहाव का खतरा बढ़ा सकते हैं, जबकि लंबे समय में सूखे मौसम में पानी की कमी और गहरा सकती है.