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स्काईरूट के युवा जोश को सैल्यूट, 28 की उम्र वाले साइंटिस्ट बदल रहे स्पेस साइंस का चेहरा

स्काईरूट एयरोस्पेस ने श्रीहरिकोटा से विक्रम-1 रॉकेट का सफल लॉन्च किया. स्काईरूट की टीम की औसत उम्र 28 साल है. जबकि उसी मिशन कंट्रोल रूम में पहले अधिक उम्र के अनुभवी साइंटिस्ट दिखते थे.

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मिशन कंट्रोल सेंटर में रॉकेट की सफल लॉन्चिंग के बाद खुशी जाहिर करते स्काईरूट के युवा रॉकेट साइंटिस्ट. (Photo: Skyroot Aerospace)
मिशन कंट्रोल सेंटर में रॉकेट की सफल लॉन्चिंग के बाद खुशी जाहिर करते स्काईरूट के युवा रॉकेट साइंटिस्ट. (Photo: Skyroot Aerospace)

भारत की निजी स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने 18 जुलाई 2026 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से विक्रम-1 रॉकेट का सफल प्रक्षेपण किया. इस मिशन का नाम 'आगमन' रखा गया है. औसत उम्र 28 साल वाली इस युवा टीम की सफलता ने पूरे देश को गर्व महसूस कराया. यह लॉन्च न सिर्फ स्काईरूट के लिए, बल्कि पूरे भारतीय प्राइवेट स्पेस सेक्टर के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ है.

इसरो के मिशन कंट्रोल रूम में हमेशा सफेद बालों और अनुभवी चेहरों वाले वैज्ञानिक दिखते थे. लेकिन स्काईरूट की लॉन्चिंग में ज्यादातर युवा इंजीनियर और वैज्ञानिक नजर आए. उनकी उम्र औसतन 28 साल है. यह दृश्य बहुत सुकून देने वाला और उम्मीद भरते वाला था. यह दिखाता है कि आज का भारतीय युवा कितनी बड़ी तकनीकी चुनौतियों को हल करने में सक्षम है और माहिर भी. 

यह भी पढ़ें: बना इतिहास... भारत का पहला प्राइवेट रॉकेट विक्रम-1 सफलतापूर्वक लॉन्च हुआ

स्काईरूट की टीम के सदस्य ज्यादातर आईआईटी, NIT और अन्य टॉप इंजीनियरिंग कॉलेजों से पढ़े हुए युवा हैं. वे इसरो के पूर्व वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में काम कर रहे हैं. युवा जोश और अनुभवी मार्गदर्शन के इस कॉम्बो ने इस सफलता को संभव बनाया.

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स्काईरूट के वैज्ञानिकों का हौसला बढ़ाने स्पेस स्टेशन जाने वाले पहले भारतीय शुभांशु शुक्ला भी मौजूद थे. (Photo: Skyroot Aerospace)

विक्रम-1 रॉकेट क्या है?

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विक्रम-1 स्काईरूट का पहला ऑर्बिटल रॉकेट है. यह चार चरणों वाला रॉकेट है. पहले तीन चरण ठोस ईंधन पर काम करते हैं, जबकि चौथा चरण लिक्विड इंजन वाला है. इस लिक्विड इंजन को जरूरत पड़ने पर दोबारा चालू किया जा सकता है, जिससे सैटेलाइट को सटीक ऑर्बिट में पहुंचाने में आसानी होती है.

यह रॉकेट मुख्य रूप से छोटे उपग्रहों को लॉन्च करने के लिए डिजाइन किया गया है. इस रॉकेट ने 450 किलोमीटर ऊंची लो-अर्थ ऑर्बिट में कई छोटे सैटेलाइट पहुंचाया. विक्रम-1 की क्षमता करीब 500 किलोग्राम तक के पेलोड को ले जाने की है.

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आगमन मिशन का महत्व

आगमन स्काईरूट का पहला ऑर्बिटल मिशन है. कंपनी इसके बाद और दो विकासात्मक मिशन करेगी, जिसके बाद रॉकेट को पूरी तरह कॉमर्शियल लॉन्चिंग के लिए तैयार किया जाएगा.

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बाएं से- पहली लाइन में यहां इसरो के तीन पूर्व प्रमुख बैठे हैं- एएस किरण कुमार, एस सोमनाथ और के. राधाकृष्णन. (Photo: Skyroot Aerospace) 

इस मिशन की सफलता कई मायनों में महत्वपूर्ण है...

  • प्राइवेट सेक्टर की क्षमता: भारत में पहली बार किसी निजी कंपनी ने ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च किया है.
  • लागत में कमी: सरकारी लॉन्चिंग की तुलना में निजी कंपनियां सस्ते में लॉन्चिंग कर सकती हैं.
  • छोटे उपग्रहों की बढ़ती मांग: दुनिया भर में छोटे सैटेलाइट की जरूरत बढ़ रही है. विक्रम-1 जैसे रॉकेट इस मांग को पूरा करने में मदद करेंगे.
  • रोजगार और स्टार्टअप: इससे स्पेस से जुड़े नए स्टार्टअप्स और नौकरियां बढ़ेंगी.

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स्काईरूट की यात्रा

स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत 2018 में इसरो के पूर्व इंजीनियर पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका ने की थी. 2020 में जब सरकार ने स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया, तब स्काईरूट ने तेजी से काम शुरू किया. 

  • 2022 में कंपनी ने विक्रम-S सब-ऑर्बिटल रॉकेट सफलतापूर्वक लॉन्च किया.
  • अब 2026 में विक्रम-1 के साथ वह ऑर्बिटल क्लब में शामिल हो गई है.
  • रॉकेट का नाम भारत के स्पेस कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है. 

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प्राइवेट स्पेस सेक्टर में बदलाव

2020 से पहले स्पेस पूरी तरह सरकारी क्षेत्र था. लेकिन IN-SPACe (Indian National Space Promotion and Authorization Centre) के गठन के बाद निजी कंपनियों को रॉकेट, सैटेलाइट, ग्राउंड स्टेशन और लॉन्च सेवाएं देने की अनुमति मिल गई. 

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स्काईरूट, अग्निकुल, डीआरडीओ के साथ मिलकर काम कर रही कंपनियां और कई अन्य स्टार्टअप्स अब इस क्षेत्र में सक्रिय हैं. विक्रम-1 की सफलता इन सभी के लिए प्रोत्साहन है.

रॉकेट लॉन्चिंग बहुत जटिल काम है. इसमें इंजन, सामग्री, नेविगेशन, मौसम और सुरक्षा जैसी सैकड़ों चुनौतियां होती हैं. स्काईरूट की युवा टीम ने इन चुनौतियों को पार किया है. 

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आगे की राह में और बड़ी चुनौतियां हैं - जैसे बड़े रॉकेट बनाना, रीयूजेबल टेक्नोलॉजी विकसित करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करना. लेकिन शुरुआत बहुत अच्छी हुई है.

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देश के लिए क्या मतलब है?

  • आत्मनिर्भर भारत: अब विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम होगी.
  • आर्थिक लाभ: स्पेस सेक्टर में निर्यात बढ़ेगा.
  • युवाओं को प्रेरणा: इंजीनियरिंग पढ़ रहे छात्रों को नया लक्ष्य मिलेगा.
  • वैज्ञानिक प्रगति: ज्यादा लॉन्चिंग से डेटा, रिसर्च और नई टेक्नोलॉजी बढ़ेगी.

विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग सिर्फ एक रॉकेट लॉन्च नहीं है. यह सपनों को हकीकत में बदलने की कहानी है. 28 साल की औसत उम्र वाली टीम ने दिखा दिया कि उम्र कोई बाधा नहीं होती जब इरादे मजबूत हों. यह लॉन्च भारत को स्पेस में नई ऊंचाइयों की ओर ले जाने वाला है. अब उम्मीद है कि आने वाले सालों में और कई निजी कंपनियां ऐसी उपलब्धियां हासिल करेंगी और भारत विश्व का प्रमुख स्पेस पावर बनेगा.

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