श्रीहरिकोटा
श्रीहरिकोटा (Sriharikota) बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) पर स्थित एक बाधा द्वीप है. यह भारत के आंध्र प्रदेश में तिरुपति जिले की शार परियोजना बस्ती में स्थित है. इसमें सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (Satish Dhawan Space Centre) है, जो भारत के दो उपग्रह प्रक्षेपण केंद्रों में से एक है. दूसरा थुम्बा भूमध्यरेखीय रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन, तिरुवनंतपुरम में है.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने श्रीहरिकोटा से पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल और जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल जैसे मल्टीस्टेज रॉकेट का उपयोग करके उपग्रहों को लॉन्च किया.
श्रीहरिकोटा आंशिक रूप से सुल्लुरपेटा मंडल में स्थित है और आंशिक रूप से आंध्र प्रदेश में तिरुपति जिले के टाडा मंडल में स्थित है. पुलिकट झील को बंगाल की खाड़ी से अलग करता है. निकटतम शहर और रेलवे स्टेशन सुल्लुरपेटा है जो श्रीहरिकोटा से 16 किमी पश्चिम में है और तिरुपति सबसे नजदीक शहर है जो 16 किमी की एलिवेटेड रोड श्रीहरिकोटा को मुख्य भूमि से जोड़ती है. यह चेन्नई शहर से लगभग 70 किमी उत्तर में है. इसकी ऊंचाई 1 मीटर है (Location of Sriharikota).
श्री हरिकोटा में इसरो ने इतिहास रच दिया है. ISRO के एक और बड़े मिशन की लॉन्चिंग हुई है. सतीश धवन स्पेस सेंटर से GSLV-F17 रॉकेट ने EOS-05 सैटेलाइट के साथ उड़ान भरी. पृथ्वी की सतह से लगभग 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई पर सैटेलाइट को छोड़ा गया है, औऱ ये सैटेलाइट पृथ्वी की निगरानी करेगा. EOS-05 सैटेलाइट का वजन करीब 2,367kg है. यह 36 हजार किलोमीटर ऊपर रहकर भारत के बड़े हिस्से की तस्वीरें लेगा. पाकिस्तान-चीन की बॉर्डर समेत कई इलाकों पर नजर रख सकेगा. साथ ही आपदा में भी मदद करेगा.
इसरो ने 4 सितंबर 2026 को जीएसएलवी-एफ17 से ईओएस-05 यानी जीआईसैट-1ए सैटेलाइट लॉन्च किया. यह 36,000 किलोमीटर ऊंचाई से भारत का हर 30 मिनट में फोटो लेगा. आपदा प्रबंधन और कृषि निगरानी के लिए महत्वपूर्ण मिशन है.
रात के आसमान में एक और बड़ी उड़ान भरने को तैयार है GSLV-F17. तीन स्टेज, चार स्ट्रैप-ऑन बूस्टर और क्रायोजेनिक इंजन से लैस यह रॉकेट EOS-05 को अंतरिक्ष तक पहुंचाएगा. जानिए जमीन से उड़ान भरने के बाद इसकी ताकत कैसे काम करती है.
अंतरिक्ष में तैनात होगी भारत की नई आंख 36 हजार KM ऊपर से इसरो का EOS-05 देश के बड़े हिस्से पर नजर रखेगा. चक्रवात, बाढ़, जंगल की आग और सीमा से जुड़ी गतिविधियों की निगरानी में भी यह सैटेलाइट मदद करेगा.
इसरो के LVM3-M5 रॉकेट का C25 अपर स्टेज करीब 9 महीने अंतरिक्ष में रहने के बाद धरती के वायुमंडल में लौट आया. इसकी पहले से की गई प्लानिंग और ट्रैकिंग ने न सिर्फ सुरक्षित री-एंट्री सुनिश्चित की, बल्कि अंतरिक्ष में कचरा बढ़ने का खतरा भी कम किया.
श्रीहरिकोटा से विक्रम-1 नामक पहला ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च किया गया. यहमिशन निजी स्पेस सेक्टर में एक बड़ी छलांग साबित होगा. इससे पहले 89.5 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचे इस रॉकेट को इस बार 450 किलोमीटर की ऊंचाई तक ले जाने की योजना है.
स्काईरूट एयरोस्पेस ने श्रीहरिकोटा से विक्रम-1 रॉकेट का सफल लॉन्च किया. स्काईरूट की टीम की औसत उम्र 28 साल है. जबकि उसी मिशन कंट्रोल रूम में पहले अधिक उम्र के अनुभवी साइंटिस्ट दिखते थे.
Skyroot Aerospace ने श्रीहरिकोटा से Vikram-1 रॉकेट सफलतापूर्वक लॉन्च किया। ‘आगमन’ मिशन में सैटेलाइट को सही ऑर्बिट में स्थापित किया गया। यह भारत के निजी स्पेस सेक्टर के लिए बड़ी उपलब्धि है।
भारत के पहले प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 की सफल उड़ान के साथ 6 खास पेलोड भी अंतरिक्ष पहुंचे. इनमें स्पेस का कचरा हटाने वाला रोबोट, लैब में बना हीरा, नए सैटेलाइट और भारत के महान वैज्ञानिकों की मिनिएचर प्रतिमाएं शामिल हैं.
भारत की निजी स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने आज श्रीहरिकोटा से विक्रम-1 रॉकेट का सफल प्रक्षेपण किया. यह कंपनी का पहला ऑर्बिटल मिशन 'आगमन' है, जिसमें छोटे उपग्रहों को कक्षा में स्थापित किया जाएगा.
इसरो के गगनयान जैसे बड़े मिशनों के वैज्ञानिकों के इस्तीफे और रिटायरमेंट रोक दिए गए हैं. सरकार का आदेश दिखाता है कि अच्छे वैज्ञानिक इसरो छोड़ रहे हैं. ये समस्या काफी गहरी है.
भारत का पहला निजी रॉकेट विक्रम-1 श्रीहरिकोटा से 18 जुलाई को लॉन्च होगा. पहली बार कोई निजी कंपनी ये काम कर रही है. देश के स्पेस सेक्टर में नया अध्याय जोड़ सकती है.
विक्रम-1 के लॉन्च पैड तक पहुंचने के साथ भारत की प्राइवेट अंतरिक्ष कंपनियों की क्षमताओं और स्पेस सेक्टर में बढ़ती भागीदारी की नई तस्वीर सामने आई है.
इसरो का PSLV-C62 मिशन 12 जनवरी 2026 को फेल हो गया. चार स्टेज का रॉकेट 90% सही काम करता है, फिर फेल हो जाता है. तीसरे स्टेज में रोल रेट डिस्टर्बेंस और फ्लाइट पाथ डिस्टर्ब होने के कारण 16 सैटेलाइट्स (अन्वेषा सहित) सही ऑर्बिट में नहीं पहुंचे. यह लगातार दूसरी असफलता (C61 के बाद) है, जिससे ISRO, DRDO, NSIL और देश को 500-800 करोड़ रुपये का वित्तीय व इज्जत को बड़ा झटका लगा है.
इसरो की PSLV-C62 मिशन फेल हो चुका है. रॉकेट सफलतापूर्वक लॉन्च हुआ. लेकिन तीसरे स्टेज के बाद आंकड़ा देरी से मिलने लगा. चौथा स्टेज शुरू तो हुआ लेकिन उसके बाद कोई अपडेट नहीं मिला. मिशन कंट्रोल सेंटर में सन्नाटा पसर गया. बाद में इसरो चीफ ने बताया कि तीसरे स्टेज में गड़बड़ हुई थी. रॉकेट दिशा बदल चुका था. इसलिए सभी सैटेलाइट अंतरिक्ष में खो गए. उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है.
ISRO PSLV-C62 Launch LIVE Updates: इसरो की अन्वेषा सैटेलाइट की लॉन्चिंग फेल हो गई है. तीसरे स्टेज के बाद रॉकेट ने दिशा बदली. चौथा स्टेज नहीं शुरू हो पाया, जिसके कारण सैटेलाइट सेपरेट नहीं हुआ. सारे पेलोड अंतरिक्ष में खो गए.
PSLV C62 Mission Launch: कल 12 जनवरी 2026 को सुबह 10:17 बजे ISRO श्रीहरिकोटा से PSLV-C62 रॉकेट लॉन्च करेगा. मुख्य पेलोड DRDO का EOS-N1 (अन्वेषा) हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है, जो सीमा निगरानी, छिपे लक्ष्यों की पहचान और पर्यावरण मॉनिटरिंग में क्रांति लाएगा. साथ में 18 सह-यात्री सैटेलाइट्स भी जाएंगे. यह 2025 की असफलता के बाद PSLV का महत्वपूर्ण कमबैक है.
PSLV को ISRO का वर्कहॉर्स कहा जाता है क्योंकि यह 1993 से विश्वसनीयता और मल्टी-सैटेलाइट लॉन्च में माहिर है. अब तक 63 उड़ानें हुई हैं, 60 सफल रही हैं. अगला लॉन्च PSLV-C62 से 12 जनवरी 2026 को EOS-N1 (Anvesha) सैटेलाइट का होगा. भविष्य में प्राइवेट सेक्टर इसे संभालेगा और यह लंबे समय तक मुख्य रॉकेट बना रहेगा.
इसरो 12 जनवरी 2026 को PSLV-C62 से डीआरडीओ की हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट अन्वेषा (EOS-N1) लॉन्च करेगा. यह छिपे हुए वाहन, हथियार और सैनिकों को स्पेक्ट्रल सिग्नेचर से पहचानकर भारतीय सेना की मदद करेगा. पाकिस्तान-चीन सीमाओं पर घुसपैठ और नक्सली इलाकों में छिपी गतिविधियां ट्रैक करने में उपयोगी साबित होगा.
इसरो 2026 की पहली लॉन्चिंग 12 जनवरी को PSLV-C62 मिशन से करेगा. श्रीहरिकोटा से सुबह 10:17 बजे उड़ान होगी. मुख्य सैटेलाइट DRDO का EOS-N1 (अन्वेषा) रक्षा के लिए होगा. स्पेन का KID प्रोब और 17 अन्य कॉमर्शियल पेलोड्स भी हैं.
ISRO का LVM3-M6 मिशन आज अमेरिकी कंपनी AST स्पेसमोबाइल की ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट को लो अर्थ ऑर्बिट में लॉन्च सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया. यह दुनिया का सबसे बड़ा कॉमर्शियल संचार सैटेलाइट है, जो सामान्य स्मार्टफोन को स्पेस से सीधे हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड देगा. LVM3 का यह छठा ऑपरेशनल मिशन है और अब तक का सबसे भारी पेलोड.