वैज्ञानिकों ने यूरोप की पुरानी धार्मिक किताबों और पांडुलिपियों में एक खतरनाक वायरस का डीएनए खोज निकाला है. यह वायरस शीपपॉक्स है, जो भेड़ों को संक्रमित करता है. सदियों पहले पूरे झुंड को नष्ट कर देता था. डब्लिन विश्वविद्यालय के आणविक जनसंख्या आनुवंशिकी प्रयोगशाला के लुई लोते के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने यॉर्क गॉस्पल्स जैसी प्रसिद्ध पांडुलिपियों के नमूने लिए. इनमें वायरस के अवशेष मिले.
शोधकर्ताओं ने पाया कि वायरस की मात्रा अंदरूनी हिस्से में ज्यादा थी. इससे साफ होता है कि बीमार भेड़ों की खाल से ही ये पन्ने बनाए गए थे. मध्यकाल में लोग सोचते थे कि बीमार जानवरों पर जादू-टोना किया गया है, लेकिन असल में यह सूक्ष्म जीवों का काम था.
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रिसर्च टीम ने सिर्फ मध्यकालीन दस्तावेजों तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने कांस्य युग की भेड़ों के दांतों का भी विश्लेषण किया. ये दांत यूरेशियन स्टेपी और साइबेरिया के अल्ताई पहाड़ों से मिले थे. इससे वायरस का इतिहास 3700 साल पीछे चला गया. स्टडी साइंस एडवांसेज में प्रकाशित हुआ है.

वैज्ञानिकों का मानना है कि शीपपॉक्स की महामारी सबसे पहले काकेशस और पूर्वी यूरोपीय स्टेपी के चरवाहा समुदायों में फैली. इन इलाकों में लोग ऊन, मांस, दूध और खाल पर निर्भर थे. व्यापार और झुंडों के मिलने से वायरस दूर-दूर तक फैल गया. कांस्य युग में ही पालतू भेड़ों के झुंड इससे ग्रस्त हो चुके थे. उसी समय प्लेग का बैक्टीरिया भी भेड़ों में मिला था, जिससे पता चलता है कि चरवाहों को कई बीमारियों का सामना करना पड़ता था.
रोग के लक्षण और ऐतिहासिक प्रभाव
शीपपॉक्स वायरस इंसानों के चेचक वायरस से करीबी रिश्ता रखता है. यह कैप्रीपॉक्सवायरस परिवार का सदस्य है. संक्रमित भेड़ों में बुखार, भूख न लगना, आंखों से पानी आना और उन जगहों पर घाव हो जाते थे जहां ऊन नहीं होती. मुंह, सांस की नली, फेफड़े, पाचन और मूत्र प्रणाली भी प्रभावित होती थी. वायरस तेजी से फैलता था. जिन झुंडों में पहले यह रोग नहीं पहुंचा था, उनमें 75 से 90 प्रतिशत जानवर मर सकते थे.
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बचे हुए जानवरों में दूध, ऊन और मांस का उत्पादन घट जाता था. खाल पर दाग पड़ जाते थे, जिससे चमड़े की गुणवत्ता प्रभावित होती थी. रोमन लेखक लुसियस कोलुमेला ने पहली शताब्दी में ही इस रोग का जिक्र किया था. मध्यकालीन हिसाब-किताब और कृषि से जुड़ी पुरानी किताबों में इसे पॉक्स या वेरियोला कहा गया. जब भी यह रोग लंबे अंतराल के बाद लौटता, लोग इसे नई और अज्ञात बीमारी समझते थे.
शीपपॉक्स कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. टीके उपलब्ध होने के बावजूद यह समय-समय पर उभरता रहता है. हाल ही में ग्रीस में लगभग पांच लाख जानवरों की जान ले ली है. इससे वहां के पनीर उद्योग को भी बड़ा खतरा पैदा हो गया है. यह घटना याद दिलाती है कि प्राचीन वायरस आज भी आर्थिक नुकसान पहुंचा सकते हैं.

शोधकर्ताओं ने पाया कि मध्यकाल में यूरोपीय समाजों के लिए भेड़ों का संक्रमण आम चुनौती थी. चमड़े पर आधारित दस्तावेजों में वायरस के कई जीनोम मिले, जो उस समय की व्यापक समस्या को दिखाते हैं.
यह स्टडी न सिर्फ वायरस के विकास को समझने में मदद करता है, बल्कि पशुपालन के इतिहास को भी नई रोशनी देता है. कांस्य युग से लेकर मध्यकाल तक का सफर बताता है कि पालतू जानवरों के साथ रोग कैसे फैले. स्टेपी क्षेत्र के व्यापार मार्गों ने संक्रमण को बढ़ावा दिया होगा.
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आज के समय में जलवायु परिवर्तन, व्यापार और पशु आवाजाही से ऐसे रोग फिर फैल सकते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि इन प्राचीन नमूनों से समझ बढ़ी है. इससे आधुनिक टीकों और नियंत्रण उपायों को बेहतर बनाने में सहायता मिल सकती है. मध्यकालीन किताबें जो धार्मिक ज्ञान का स्रोत थीं, अब बीमारी के इतिहास का दस्तावेज बन गई हैं.
यह शोध साबित करता है कि पुरानी वस्तुएं सिर्फ संस्कृति नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और विज्ञान की महत्वपूर्ण जानकारी भी छिपाए होती हैं. आगे और नमूनों के अध्ययन से वायरस के पूरे विकास क्रम को और स्पष्ट किया जा सकेगा.