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कैश-फॉर-फोटो... इंडोनेशिया के इस प्रोजेक्ट से शिकारी बन रहे प्रोटेक्टर

इंडोनेशिया के बोर्नियो में कैश-फॉर-फोटो योजना शिकारियों को प्रोटेक्टर बना रही है. ग्रामीण जानवरों की तस्वीरें लेकर पैसे कमाते हैं, जिससे जानवर का शिकार कम हो गया है. संरक्षण बढ़ रहा है.

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इंडोनेशिया के पुराने शिकारी ओक्टेवियस अब कैश-फॉर-फोटो प्रोजेक्ट से पैसा कमा रहे हैं. (Photo: AFP)
इंडोनेशिया के पुराने शिकारी ओक्टेवियस अब कैश-फॉर-फोटो प्रोजेक्ट से पैसा कमा रहे हैं. (Photo: AFP)

इंडोनेशिया के बोर्नियो द्वीप पर एक अनोखी योजना चल रही है जो जंगली जानवरों के शिकारियों को उनके संरक्षक में बदल रही है. पश्चिम कालिमंतन प्रांत के गांवों में रहने वाले लोग अब जंगल में घूमकर ओरंगुटान, बंदर, पक्षी और अन्य जानवरों की तस्वीरें या आवाज रिकॉर्ड करते हैं. इसके बदले उन्हें नकदी मिलती है. 

यह केहातिकु प्रोजेक्ट पर्यावरण संस्था बोर्नियो फ्यूचर्स द्वारा चलाई जा रही है. पहले स्थानीय लोग जंगली गाने वाले पक्षियों का शिकार करके घरेलू बाजार में बेचते थे. अब वही लोग जानवरों को जिंदा रखकर कमाई कर रहे हैं. योजना का मकसद साफ है- जानवरों को मृत से ज्यादा जीवित अवस्था में मूल्यवान बनाना. नौ गांवों में सैकड़ों लोग इसमें शामिल हैं. रोजमर्रा के काम के साथ यह अतिरिक्त आय का स्रोत बन गया है.

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कैसे काम करती है यह योजना

प्रोजेक्ट में भाग लेने वाले लोग मोबाइल ऐप के जरिए तस्वीरें या रिकॉर्डिंग अपलोड करते हैं. आम पक्षी की एक तस्वीर पर करीब पांच हजार रुपया मिलता है, जबकि लुप्तप्राय ओरंगुटान की तस्वीर पर 1.30 लाख रुपया तक. सबसे सफल पर्यवेक्षक महीने में 10 लाख रुपया तक कमा लेते हैं, जो औसत खेतिहर मजदूर की कमाई से कई गुना ज्यादा है.

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50 वर्षीय ऑक्टेवियस जैसे लोग बताते हैं कि यह पैसा बच्चों की कॉलेज फीस चुकाने में बहुत मदद करता है. वे जंगल में घूमते हुए कान और आंखें खुली रखते हैं. कभी खेत में काम करते हुए पक्षियों की आवाज सुनते ही तस्वीर खींच लेते हैं. अब तक तीन लाख पचास हजार से ज्यादा फोटो-रिकॉर्डिं जमा हो चुके हैं, जिनमें से आधे सत्यापित होकर भुगतान किए जा चुके हैं. ऐप और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम से नकली या दोहराव वाले दावों को छांटा जाता है.

ज्यादातर प्रतिभागी छोटे किसान हैं जो चावल, काकाओ, ड्यूरियन और क्रैटम उगाते हैं. उनके लिए यह साइड जॉब है जो खेती में बाधा नहीं डालता. महिलाओं को खास फायदा हुआ है. सुंगई अजुंग गांव की एंटोनिया उनेंग ने अपनी कमाई से फ्रिज और कराओके मशीन खरीदी. 

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विदेश में काम करने वाले पति पर निर्भर रहने की बजाय अब उनके पास अपनी आय है. इससे स्वतंत्रता का अहसास बढ़ा है. बुजुर्ग किसान इमेल्दा रोज दोस्तों के साथ जंगल जाती हैं. वे कहती हैं कि घूमने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है और पहले जो जंगली सूअर या हिरण फसल खराब करने वाले कीट लगते थे, अब उन्हें बचाना चाहते हैं. दो गांवों ने स्वेच्छा से शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया है. इससे साफ है कि आर्थिक प्रोत्साहन व्यवहार बदल रहा है.

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संरक्षण और वैज्ञानिक लाभ

यह योजना सिर्फ आय नहीं देती बल्कि वन्यजीवों के वितरण और आबादी में बदलाव का डेटा भी जुटाती है. बोर्नियो फ्यूचर्स के निदेशक नार्दियोनो बताते हैं कि पहले एक पक्षी पकड़कर पचास हजार रुपया मिलता था, अब पांच तस्वीरों से उतनी ही कमाई हो सकती है और पक्षी जिंदा रहकर प्रजनन भी करता है. 

लंबे समय में निरीक्षण से कमाई शिकार से कहीं ज्यादा हो सकती है. अमेरिकी जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ता पॉल फेरारो का मानना है कि यह मॉडल बिना प्रोत्साहन वाले ऊपर से थोपे गए संरक्षण कार्यक्रमों से बेहतर पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव डाल सकता है. हालांकि चुनौती धन की निरंतरता की है. उत्साह कम होने पर लोग पुरानी आदतों पर लौट सकते हैं.

प्रोजेक्ट को अभी तक करीब तीन लाख डॉलर का दान मिला है. आधा पैसा ऐप और एआई सिस्टम विकसित करने में खर्च हुआ. धन 2028 तक सुरक्षित है और दो और गांव जल्द जुड़ेंगे. इसमें तिहत्तर प्रजातियों को शामिल किया गया है. सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि लंबे समय तक फंडिंग बनी रहे. लोग संरक्षण को आदत बना लें.

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