दुनिया के कई हिस्सों में हीटवेव अब पहले शुरू हो रही हैं और देर से खत्म हो रही हैं. 1979 से 2023 तक के ग्लोबल क्लाइमेट डेटा की एक नई स्टडी में यह बात सामने आई है. रिसर्च के मुताबिक, 45 साल में दुनिया के लैंड एरिया में हीटवेव सीजन औसतन करीब 39 दिन लंबा हो गया है.
यह स्टडी साउथ चाइना बॉटनिकल गार्डन (एससीबीजी) और चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज (सीएएस) के रिसर्चर्स ने की है. रिसर्च टीम ने 1979 से 2023 तक का डेटा देखा. इसमें यह पता लगाया गया कि साल की पहली हीटवेव कब शुरू हुई, आखिरी हीटवेव कब खत्म हुई, पूरा हीटवेव सीजन कितने दिन चला और पहली हीटवेव कितनी तेजी से अपने सबसे ज्यादा तापमान तक पहुंची.
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स्टडी के मुताबिक, हर 10 साल में पहली हीटवेव औसतन 3.29 दिन पहले शुरू हुई. वहीं, आखिरी हीटवेव हर 10 साल में करीब 5.41 दिन देर से खत्म हुई. यानी हर दशक में हीटवेव का सीजन करीब 8.71 दिन लंबा हुआ. 1979 से 2023 के बीच पहली हीटवेव करीब दो हफ्ते पहले आने लगी, जबकि आखिरी हीटवेव करीब 24 दिन बाद खत्म हुई.

92 फीसदी से ज्यादा इलाकों में लंबा हुआ हीटवेव सीजन
रिसर्चर्स ने दुनिया के अलग-अलग लैंड एरिया में हीटवेव के पैटर्न को देखा. इसमें 72% लैंड एरिया में पहली हीटवेव के पहले शुरू होने का ट्रेंड मिला. वहीं 79.6% इलाकों में आखिरी हीटवेव देर से खत्म हुई. हीटवेव सीजन की लंबाई में सबसे बड़ा बदलाव देखा गया. दुनिया के 92.1% लैंड एरिया में हीटवेव सीजन लंबा होने का ट्रेंड मिला. सूखे इलाकों में यह बदलाव आमतौर पर ज्यादा बड़ा रहा.
इसका सीधा मतलब है कि कई जगहों पर गर्मी से जुड़ा खतरा अब ज्यादा लंबे समय तक बना रह सकता है. पहले जहां हीटवेव एक तय समय के आसपास आती थी, वहीं अब कई जगहों पर इसका सीजन पहले शुरू होकर देर तक चल रहा है.
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पहली हीटवेव तेजी से बढ़ रही
रिसर्च टीम ने यह भी देखा कि सीजन की पहली हीटवेव कितनी तेजी से अपने सबसे ज्यादा तापमान तक पहुंचती है. इसके लिए पहली हीटवेव को रैपिड, मॉडरेट और स्लो ऑनसेट की कैटेगरी में रखा गया. 2001 से 2023 के बीच हीटवेव से प्रभावित लैंड एरिया में रैपिड-ऑनसेट वाली पहली हीटवेव का हिस्सा बढ़ा. यानी कुछ जगहों पर सीजन की पहली हीटवेव अब कम समय में तेजी से बढ़ रही है और जल्दी अपने सबसे ज्यादा तापमान तक पहुंच रही है.

ऐसी हीटवेव में लोगों और दूसरे सिस्टम को तैयारी के लिए कम समय मिल सकता है. रिसर्चर्स के मुताबिक, हीटवेव का खतरा समझने के लिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि तापमान कितना बढ़ा या गर्मी कितने दिन रही. यह भी देखना जरूरी है कि हीटवेव कब शुरू हुई और कितनी तेजी से बढ़ी.
फसलों पर भी बढ़ रहा असर
लंबे होते हीटवेव सीजन का असर खेती पर भी पड़ रहा है. स्टडी में 2001 से 2023 के बीच फसलों पर पड़ने वाले हीटवेव के असर को भी देखा गया. खास तौर पर फूल आने और दाने बनने जैसे जरूरी समय में कई प्रमुख फसलों पर हीटवेव का असर बढ़ा. 1979–2000 की तुलना में 2001–2023 के दौरान कई प्रमुख फसलों के इन जरूरी चरणों में हीटवेव एक्सपोजर 1.6% से 13.3% तक बढ़ा. हीटवेव का असर फसल के इन चरणों से पहले और बाद के समय में भी बढ़ा.
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हीटवेव का खतरा समझने का तरीका बदलेगा
रिसर्चर्स का कहना है कि हीटवेव का खतरा समझते समय सिर्फ तापमान और उसकी अवधि देखना काफी नहीं है. यह भी देखना जरूरी है कि हीटवेव कब शुरू हुई, कब खत्म हुई और कितनी तेजी से अपने सबसे ज्यादा तापमान तक पहुंची.
स्टडी के मुताबिक, इन बदलावों को हीट मॉनिटरिंग और अर्ली वॉर्निंग सिस्टम में शामिल करने से लोगों, खेती, इकोसिस्टम मैनेजमेंट और एनर्जी सप्लाई से जुड़े खतरों को बेहतर तरीके से समझने और समय पर तैयारी करने में मदद मिल सकती है.