दुनिया युद्धों को मुख्य रूप से मानवीय दुख, मौत और आर्थिक नुकसान के रूप में देखती है. लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक नई स्टडी में दिखाया है कि युद्ध पर्यावरण और जलवायु पर भी बहुत बड़ा बोझ डाल रहे हैं. वन अर्थ जर्नल में 11 मार्च 2026 को छपी स्टडी के अनुसार, इजरायल-गाजा संघर्ष से अब तक लगभग 33.2 मिलियन मीट्रिक टन (यानी 3.32 करोड़ टन) कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष (CO₂e) ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हो चुका है. यह आंकड़ा बहुत बड़ा है. जलवायु संकट को और तेज कर रहा है.
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33 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन का मतलब क्या है?
यह उत्सर्जन इतना ज्यादा है कि...
ये तुलनाएं दिखाती हैं कि एक युद्ध कितना बड़ा पर्यावरणीय नुकसान कर सकता है. स्टडी में लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी और क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के शोधकर्ताओं ने की है.
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उत्सर्जन कहां से आता है?
युद्ध में कई तरीकों से कार्बन निकलता है...
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स्टडी में कुल उत्सर्जन को तीन स्कोप में बांटा गया है...
स्कोप 1 और 2: सीधे युद्ध से 1.3 मिलियन टन.
स्कोप 3+: पहले और बाद की गतिविधियां मिलाकर कुल 33.2 मिलियन टन.
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क्यों नहीं गिना जाता सैन्य उत्सर्जन?
अंतरराष्ट्रीय जलवायु समझौतों (जैसे पेरिस समझौता) में सैन्य गतिविधियों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को पूरी तरह शामिल नहीं किया जाता. कई देश अपनी रिपोर्ट में सेना के उत्सर्जन को अलग रखते हैं. इसलिए असली प्रभाव छिपा रह जाता है. अब समय आ गया है कि जलवायु नीतियों में सैन्य उत्सर्जन को भी जोड़ा जाए.

जलवायु संकट पर क्या असर पड़ रहा है?
दुनिया पहले से ही ग्लोबल वार्मिंग से जूझ रही है. तापमान बढ़ रहा है. मौसम बिगड़ रहा है. बाढ़-सूखा बढ़ रहा है. ऐसे में लंबे युद्ध वैश्विक तापमान वृद्धि को और तेज कर देते हैं. युद्ध न सिर्फ लोगों की जान लेते हैं, बल्कि पृथ्वी की सेहत भी बिगाड़ते हैं.
यह स्टडी हमें याद दिलाती है कि युद्ध का नुकसान सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है. यह पूरी धरती के लिए खतरा है. शोधकर्ता बेंजामिन नेमार्क कहते हैं कि युद्ध से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को अब गंभीरता से मापना और रिपोर्ट करना जरूरी है. अगर हम जलवायु संकट रोकना चाहते हैं, तो युद्धों को कम करना और शांति बनाए रखना सबसे बड़ा कदम होगा. युद्ध न सिर्फ मानवता के खिलाफ है, बल्कि पर्यावरण के खिलाफ भी है.