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Surya Grahan: सदी का दूसरा सबसे लंबा सूर्य ग्रहण कब? कहां दिखेगा ये नजारा

Surya Grahan: क्या आप भी इस बात को लेकर उलझन में हैं कि सदी का दूसरा सबसे लंबा सूर्य ग्रहण कब लगने वाला है? 3 मार्च 2026 के चंद्र ग्रहण के बाद से ही गूगल पर इस खगोलीय घटना को लेकर सर्च का सिलसिला तेज हो गया है. आखिर यह महा-ग्रहण 2026 में होगा या फिर 2027 में?

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2009 में लगा था सदी का पहला बड़ा ग्रहण
2009 में लगा था सदी का पहला बड़ा ग्रहण

Surya Grahan : सूर्य ग्रहण वैसे तो एक खगोलीय घटना है, लेकिन भारतीय संस्कृति में इसे ब्रह्मांड में होने वाले बड़े ऊर्जा बदलाव का समय माना जाता है. साल 2026 में 17 फरवरी को एक सूर्य ग्रहण हो चुका है . दूसरा ग्रहण 12 अगस्त को एक और होने वाला है. लेकिन, सबकी नजरें 2 अगस्त 2027 पर टिकी हैं. इसे इस सदी की सबसे खास और दुर्लभ घटनाओं में गिना जा रहा है.

क्यों खास है 2027 का यह ग्रहण?
2 अगस्त 2027 को लगने वाला यह सूर्य ग्रहण इस सदी का दूसरा सबसे लंबा ग्रहण होगा. इसमें चंद्रमा सूर्य को करीब 6 मिनट 22 सेकंड तक पूरी तरह ढक लेगा. उस समय दिन में ही रात जैसा अंधेरा छा जाएगा. इतनी लंबी अवधि का ऐसा नजारा अब सीधे 2114 में ही देखने को मिलेगा, इसीलिए इसे सदी की सबसे बड़ी खगोलीय घटनाओं में से एक माना जा रहा है.

क्या यह भारत में दिखेगा?
यह ग्रहण मुख्य रूप से स्पेन, मिस्र, सऊदी अरब, लीबिया, ट्यूनिशिया, यमन, मोरक्को, सूडान, सोमालिया, अल्जीरिया और जिब्राल्टर जैसे 11 देशों में पूरी तरह से दिखेगा. भारत की बात करें, तो यहाँ यह 'पूर्ण' नहीं, बल्कि 'आंशिक' (थोड़ा-सा) ही दिखेगा. अफ्रीका, यूरोप और दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में भी लोग इसे आंशिक रूप में देख पाएंगे.

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अब तक का रिकॉर्ड
21वीं सदी का सबसे लंबा सूर्य ग्रहण 22 जुलाई 2009 को लगा था, जो 6 मिनट 39 सेकंड तक चला था. 2027 का ग्रहण उसी के सबसे करीब है, इसीलिए इसे सदी का दूसरा सबसे बड़ा सूर्य ग्रहण कहा जा रहा है.

ग्रहण के पीछे की पौराणिक कहानी
धार्मिक मान्यताओं में ग्रहण के पीछे 'समुद्र मंथन' की एक मशहूर कहानी है. कहा जाता है कि जब समुद्र मंथन से अमृत निकला, तो 'स्वरभानु' नाम के एक असुर ने देवताओं का भेष बदलकर अमृत पी लिया. सूर्य और चंद्रमा ने उसे देख लिया और भगवान विष्णु को बता दिया. विष्णु जी ने गुस्से में अपने सुदर्शन चक्र से उस असुर का सिर काट दिया. क्योंकि उसने अमृत पिया था, इसलिए वह मरा नहीं, बल्कि उसके दो हिस्से हो गए—'राहु' (सिर) और 'केतु' (धड़). माना जाता है कि इसी बदले की भावना से राहु-केतु समय-समय पर सूर्य और चंद्रमा को परेशान करते हैं, जिसे हम ग्रहण लगना कहते हैं.

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