Mahabharat Facts: महाभारत युद्ध में कई ऐसे महान योद्धा हुए, जिनका जिक्र आज कलयुग में भी होता है. उन्हीं में से एक हैं अश्वत्थामा. अश्वत्थामा वह योद्धा है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह हजारों वर्षों से धरती पर जीवित है और आज भी भटक रहे हैं. कई मान्यताओं के अनुसार वह 3,000 से 6,000 वर्षों तक जीवित रहेंगे और अलग-अलग रूपों में संसार में विचरण करते रहेंगे. कुछ लोग यह भी मानते हैं कि वह किसी बड़े धर्म युद्ध के लिए जीवित हैं, जो कलयुग के अंत में लड़ा जाएगा.
अश्वत्थामा की कथा
अश्वत्थामा, जो कि गुरु द्रोणाचार्य और कृपाचार्य की बहन कृपी के पुत्र थे. गुरु द्रोणाचार्य अपने पुत्र से अत्यंत प्रेम करते थे, और इसी कारण वे अपनी इच्छा के विरुद्ध कौरवों का साथ देने को मजबूर हुए थे. कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान गुरु द्रोणाचार्य पांडवों की विजय में सबसे बड़ी बाधा बन चुके थे. श्रीकृष्ण जानते थे कि गुरु द्रोणाचार्य के जीवित रहते पांडवों की जीत कठिन है, इसलिए एक योजना बनाई गई. भीम ने अश्वत्थामा नाम के एक हाथी का वध किया और यह समाचार युधिष्ठिर के माध्यम से द्रोणाचार्य तक पहुंचाया गया. यह सुनकर गुरु द्रोणाचार्य ने शस्त्र त्याग दिए और ध्यान में बैठ गए. उसी समय द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न ने उनका वध कर दिया था.
अपने पिता की मृत्यु से अश्वत्थामा अत्यंत क्रोधित और व्यथित हो गया था. उसने दुर्योधन से बदला लेने का वचन दिया और युद्ध के अंतिम चरण में रात के समय पांडव शिविर पर हमला कर दिया था. रात के अंधेरे में उसने कई योद्धाओं को मार डाला, जिसमें धृष्टद्युम्न और द्रौपदी के पांचों पुत्र भी शामिल थे. इस कायरतापूर्ण कृत्य के बाद अश्वत्थामा भाग निकला. जब यह समाचार अर्जुन को मिला, तो उन्होंने उसे मारने का संकल्प लिया और श्रीकृष्ण के साथ उसकी तलाश में निकल पड़े. खुद को असुरक्षित पाकर अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, जिसे वापस लेना उसे नहीं आता था. जवाब में अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र छोड़ा और अंततः उसे निष्क्रिय कर दिया.
अश्वत्थामा को पकड़कर द्रौपदी के सामने लाया गया. द्रौपदी ने करुणा दिखाते हुए उसे जीवनदान देने की बात कही. लेकिन उसके पापों के कारण श्रीकृष्ण ने उसे श्राप दिया कि वह हजारों वर्षों तक पृथ्वी पर भटकता रहेगा, उसके शरीर से रक्त की दुर्गंध आती रहेगी, वह अनेक रोगों से पीड़ित रहेगा और समाज उससे दूर रहेगा. मान्यता है कि इस श्राप के बाद अश्वत्थामा आज भी पृथ्वी पर भटक रहा है, मृत्यु की तलाश में, लेकिन उसे मुक्ति नहीं मिली है. विभिन्न पुराणों में भी इसका उल्लेख मिलता है कि ऐसे चिरंजीवी भविष्य में धर्म की रक्षा के लिए फिर प्रकट हो सकते हैं.