महिलाएं अखंड सौभाग्य और पति की लंबी उम्र की कामना से करवा चौथ का निर्जला व्रत रखती हैं. इस बार करवा चौथ का पर्व 29 अक्टूबर दिन गुरुवार को रखा जाएगा. यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले सरगी खाकर शुरू होता है और फिर शाम को चंद्र दर्शन के बाद ही समाप्त होता है. इस दौरान दिनभर कई और भी महत्वपूर्ण रीति-रिवाज, रस्में निभाई जाती हैं. जैसे- करवा फेरना, सुहाग लेना, बायना निकालना आदि. आइए जानते हैं कि इन सभी रस्मों का क्या मतलब होता है और इन्हें कैसे निभाया जाता है.
1. करवा फेरना क्या होता है?
करवा चौथ पर करना फेरने की रस्म निभाई जाती है. इस रस्म में महिलाएं पूजा के दौरान करवा यानी मिट्टी या धातु के पात्र को एक-दूसरे के हाथों में देती हैं या आपस में बदलती हैं. कई जगहों पर महिलाएं कथा के दौरान गोल घेरा बनाकर अपने अपने करवे आगे बढ़ाती हैं और लोक कथा या पारंपरिक गीत गाती है. इसे सुहाग, सुख-समृद्धि और पारिवारिक मंगलकामना से जुड़ी रस्म माना जाता है. इसकी विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकती है.
2. सुहाग लेना क्या होता है?
करवा चौथ में सुहाग लेने की भी एक महत्वपूर्ण रस्म होती है. इस रस्म में विवाहित महिलाएं घर की दूसरी सुहागन महिलाओं से सुहाग की सामग्री को प्रतीकात्मक आशीर्वाद के रूप में लेती हैं. इसमें सिंदूर, चूड़ी, बिंदी, मेहंदी या अन्य सुहाग सामग्री जैसी चीजें शामिल होती हैं. लोक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा करने से पति की लंबी उम्र, वैवाहिक जीवन की खुशहाली और अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है. हालांकि इस रस्म में सामग्री और रस्म का तरीका पारिवारिक परंपराओं पर भी निर्भर करता है.
3. बायना निकालना क्या होता है?
करवा चौथ पर बायना पूजा के लिए तैयार की गई भेंट या सामग्री को कहा जाता है. कई परिवारों में महिलाएं मिठाई, फल, मठरी, पूरी, कपड़े, रुपए और कुछ सुहाग सामग्री को पूजा में अलग से शामिल करती हैं. फिर पूजा के बाद इसे सास, घर की किसी बड़ी बहू (जेठानी) या घर की किसी अन्य महिला को दे दिया जाता है. इसे श्रद्धा, सम्मान और आशीर्वाद पाने की भावना से जोड़ा जाता है. इसी रस्म को बायना निकालना बोला गया है.