Guru Pradosh Vrat & Masik Shivratri Shubh Muhurat: आज प्रदोष व्रत रखा जा रहा है. बता दें गुरुवार होने की वजह से इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाएगा. खास बात यह है कि आज मासिक शिवरात्रि का भी खास संयोग बन रहा है. ऐसे में शिव भक्तों के लिए 8 अक्टूबर यानी आज का दिन भगवान शिव की आराधना के लिहाज से बेहद खास माना जा रहा है. पंचांग के मुताबिक, त्रयोदशी तिथि 7 अक्टूबर की रात 11 बजकर 16 मिनट से शुरू हो चुकी है और 8 अक्टूबर यानी आज रात 10 बजकर 15 मिनट तक रहेगी.
प्रदोष व्रत की पूजा प्रदोष काल में की जाती है. वहीं, मासिक शिवरात्रि की आराधना रात के निशिता काल में करने की परंपरा है. ऐसे में आइए जानते हैं गुरु प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि पर भगवान शिव की आराधना करना का सही मुहूर्त क्या है.
गुरु प्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त (Guru Pradosh Vrat 2026 Shubh Muhurat)
द्रिक पंचांग के अनुसार, 8 अक्टूबर को प्रदोष पूजा के लिए शाम 5 बजकर 59 मिनट से रात 8 बजकर 27 मिनट तक का समय शुभ रहेगा. यानी भक्तों के पास भगवान शिव की पूजा के लिए करीब 02 घंटे 28 मिनट का समय होगा.
मासिक शिवरात्रि पर कब करें शिव पूजा?
आज रात मासिक शिवरात्रि की पूजा निशिता काल में होगी. पंचांग के अनुसार, मासिक शिवरात्रि की पूजा का शुभ मुहूर्त रात 11 बजे से 11 बजकर 49 मिनट तक रहेगा. इस दौरान भगवान शिव का अभिषेक करना विशेष फलदायी माना जाता है. पूजा में जल और दूध से अभिषेक करने के साथ बेलपत्र और फूल अर्पित करें. इसके बाद शिव मंत्रों का जाप और भगवान शिव की आरती करें.
भगवान शिव जी के मंत्र
ऊं मः शिवाय
ऊं नमो भगवते रुद्राय
ऊं पशुपतये नमः
ऊं तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
ऊं त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
शिव जी की आरती
ऊं जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूरे का भोजन, भस्मी में वासा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥
ओम जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ओम जय शिव ओंकारा