scorecardresearch
 

Diwali 2026: मां लक्ष्मी का वो श्राप, जिसके कारण आज भी धरती पर दुख झेल रहे पढ़े-लिखे लोग!

एक बार भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु की परीक्षा लेने के लिए उनकी छाती पर पैर से प्रहार कर दिया. तब भगवान विष्णु ने क्रोधित होने के बजाए ऋषि के पैर पकड़कर उनका हाल पूछा. लेकिन इस घटना से माता लक्ष्मी बेहद नाराज हो गईं और उन्होंने भृगु ऋषि को श्राप दे दिया. कहते हैं कि इस श्राप के कारण आज भी धरती पर कई पढ़े-लिखे लोग दुख भोग रहे हैं.

Advertisement
X
जानें, क्यों भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु की छाती पर मारी थी लात. (Photo: ITG)
जानें, क्यों भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु की छाती पर मारी थी लात. (Photo: ITG)

अक्सर आपने लोगों को शिकायत करते देखा होगा कि पढ़ा-लिखा होने के बावजूद उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है. ज्योतिषविद और शास्त्रों के जानकार ऐसे दुखी लोगों को मां लक्ष्मी के एक श्राप से जोड़कर भी देखते हैं. मां लक्ष्मी ने भृगु ऋषि को एक श्राप दिया था. कहते हैं कि लक्ष्मी के इस श्राप का खामियाजा आज भी धरती पर कई लोग भुगत रहे हैं. आइए इसे पौराणिक कथा के माध्यम से समझते हैं.

मान्यता है कि एक बार भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु की परीक्षा लेने के लिए उनकी छाती पर पैर से प्रहार कर दिया. तब भगवान विष्णु ने क्रोधित होने के बजाए ऋषि के पैर पकड़कर उनका हाल पूछा. लेकिन इस घटना से माता लक्ष्मी बेहद नाराज हो गईं और उन्होंने भृगु ऋषि को श्राप दे दिया. मां लक्ष्मी के श्राप की कथा आज के आधुनिक और रिश्तों से ज्यादा धन को प्राथमिकता देने वाले समाज के लिए एक सीख बनी हुई है. यह कथा बताती है कि यदि ज्ञान के साथ स्वभाव में विनम्रता न हो तो ऐसा ज्ञान बेकार है.

भृगु ऋषि द्वारा नारायण की छाती पर (जहां मां लक्ष्मी का वास है) लात मारना और मां लक्ष्मी द्वारा भृगु ऋषि को श्राप देने की कथा का एक आध्यात्मिक पक्ष यह भी है कि ज्ञान और धन दोनों का अपना महत्व है. मां सरस्वती मनुष्य को बुद्धि, विवेक और सही-गलत की पहचान देती हैं. जबकि मां लक्ष्मी जीवन में साधन, संपन्नता और सुख-सुविधाएं प्रदान करती हैं. केवल ज्ञान होने से जीवन की सभी भौतिक आवश्यकताएं पूरी नहीं होती हैं और केवल धन होने से व्यक्ति बुद्धिमान नहीं बन जाता.

Advertisement

इसलिए दीपावली पर लक्ष्मी के साथ बुद्धि और विवेक के देवता गणेश जी की पूजा भी की जाती है. इसका भाव यही है कि धन के साथ सद्बुद्धि भी होनी चाहिए. इसलिए मां लक्ष्मी के श्राप की यह कहानी विद्वानों के पास धन के अभाव की बात नहीं कहती है, बल्कि ज्ञान के साथ अहंकार, अपमान और दुराचार का वास्तविक संदेश भी देती है. यह बताती है कि विद्या का उद्देश्य केवल विद्वान बनना नहीं, बल्कि विनम्रता और सदाचार के साथ जीवन जीना भी है.

महर्षि भृगु की एक गलती से नाराज हुई थीं मां लक्ष्मी
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार ऋषि-मुनियों के बीच यह प्रश्न उठा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश में सबसे श्रेष्ठ कौन हैं. इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए महर्षि भृगु को तीनों देवों की परीक्षा लेने का दायित्व सौंपा गया. महर्षि भृगु सबसे पहले ब्रह्मलोक पहुंचे. वहां उन्होंने ब्रह्माजी के प्रति अपेक्षित सम्मान नहीं दिखाया. इससे ब्रह्माजी नाराज हुए, लेकिन उन्होंने क्रोध पर नियंत्रण रखा. इसके बाद भृगु ऋषि कैलाश पहुंचे, जहां उन्होंने भगवान शिव का भी अनादर किया. भगवान शिव क्रोधित हो गए, लेकिन देवी पार्वती ने उन्हें शांत कर दिया.

अंत में महर्षि भृगु भगवान विष्णु के धाम वैकुंठ पहुंचे. उस समय भगवान विष्णु विश्राम कर रहे थे. भृगु ऋषि ने उनकी परीक्षा लेने के लिए उनकी छाती पर पैर से प्रहार कर दिया. लेकिन भगवान विष्णु ने क्रोधित होने के बजाय उनके पैर पकड़ लिए और पूछा कि कहीं उनके पैर में चोट तो नहीं लगी. भगवान के इस क्षमाशील व्यवहार से भृगु ऋषि ने उन्हें तीनों देवों में श्रेष्ठ घोषित कर दिया.

Advertisement

भगवान विष्णु के अपमान से आहत हुईं लक्ष्मी
भृगु ऋषि के साहस से मां लक्ष्मी बेहद आहत हो गईं. भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर ही मां लक्ष्मी का निवास है. इसलिए महर्षि भृगु द्वारा विष्णु जी को लात मारना उन्हें बड़ा अपमान लगा. उन्होंने इसे एक ऋषि का अहंकार और भगवान विष्णु के प्रति अनादर माना. तब मां लक्ष्मी ने महर्षि भृगु और उनके वंश से जुड़े ब्राह्मणों को श्राप दिया कि अब वह ब्राह्मणों के घर स्थायी रूप से निवास नहीं करेंगी. उन्हें आजीविका के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ेगा और भिक्षा मांगकर जीवनयापन करना होगा. इस श्राप को आगे चलकर विद्या और आर्थिक समृद्धि के बीच दिखाई देने वाले विरोधाभास से जोड़कर देखा जाने लगा.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement