Dhanteras Katha: हिंदू धर्म में धनतेरस का खास महत्व है. दिवाली से पहले आने वाले इस त्योहार पर मां लक्ष्मी, भगवान कुबेर और भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है. इस दिन लोग सोने-चांदी के आभूषण, नए बर्तन और झाड़ू समेत कई चीजों की खरीदारी करते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस पर पूजा-पाठ करने से घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है. यही वजह है कि लोग इस दिन को बेहद शुभ मानते हैं.
धनतेरस को धनत्रयोदशी भी कहा जाता है. मान्यता है कि इस दिन नई चीजें खरीदने से घर में बरकत आती है. इसके साथ ही धनतेरस पर यमराज के नाम का दीपक जलाने की भी परंपरा है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर धनतेरस मनाने की शुरुआत कैसे हुई? दरअसल, इस त्योहार के पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. आइए जानते हैं धनतेरस से जुड़ी तीन प्रमुख कथाएं और इस पर्व का धार्मिक महत्व.
धनतेरस क्यों मनाया जाता है?
पौराणिक कथा के अनुसार, धनतेरस का संबंध समुद्र मंथन से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, तब कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए थे. भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और आरोग्य का देवता माना जाता है. उन्हें भगवान विष्णु का अंशावतार भी कहा जाता है. भगवान धन्वंतरि के हाथों में अमृत कलश होने की वजह से ही धनतेरस पर बर्तन खरीदने की परंपरा शुरू हुई. मान्यता है कि इस दिन नए बर्तन और धातुओं की खरीदारी करने से घर में सुख-समृद्धि आती है. साथ ही परिवार के सदस्यों को अच्छा स्वास्थ्य और लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है.
धनतेरस से जुड़ी पौराणिक कथा
एक प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार माता लक्ष्मी को एक श्राप के कारण 12 साल तक एक किसान के घर रहना पड़ा था. इस दौरान किसान के जीवन में खूब तरक्की हुई. उसके घर में धन-धान्य की कमी नहीं रही और परिवार खुशहाल रहने लगा. जब 12 साल पूरे हुए तो माता लक्ष्मी के वापस जाने का समय आ गया. किसान उन्हें अपने घर से विदा नहीं करना चाहता था, क्योंकि उनके आने के बाद ही उसकी किस्मत बदली थी. किसान की बात सुनकर माता लक्ष्मी ने उसे एक उपाय बताया.
उन्होंने कहा कि कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर घर की साफ-सफाई करके घी का दीपक जलाना और एक कलश में सिक्के रखकर उनकी पूजा करना. माता लक्ष्मी ने यह भी कहा कि जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा से उनकी पूजा करेगा और दीपक जलाएगा, उसके घर में सुख-समृद्धि बनी रहेगी. किसान ने माता लक्ष्मी के बताए तरीके से पूजा की. मान्यता है कि इसके बाद उसके जीवन में कभी धन और अनाज की कमी नहीं हुई. तभी से धनतेरस पर मां लक्ष्मी की पूजा और दीपक जलाने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है.
धनतेरस से जुड़ी दूसरी पौराणिक कथा
धनतेरस पर यमराज के नाम से दीपक जलाने के पीछे भी एक पौराणिक कथा है. कथा के अनुसार, एक बार यमराज ने अपने दूतों से पूछा कि क्या कभी किसी इंसान के प्राण लेते समय उनका मन दुखी हुआ है? इस पर एक यमदूत ने बताया कि एक बार एक नवविवाहिता को अपने पति की मृत्यु पर रोते-बिलखते देखकर उसका मन भी व्याकुल हो गया था. इसके बाद उसने एक राजकुमार की कहानी सुनाई.
कहते हैं कि एक बार हंस नाम का राजा शिकार के लिए निकला था. रास्ता भटकने की वजह से वह दूसरे राज्य पहुंच गया. वहां के राजा हेमा ने उसका खूब आदर-सत्कार किया. इसी दौरान राजा हेमा के घर एक पुत्र का जन्म हुआ. ज्योतिषियों ने बच्चे की कुंडली देखकर भविष्यवाणी की कि विवाह के चार दिन बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी.
यह सुनकर राजा ने अपने बेटे को यमुना नदी के किनारे एक गुफा में रखने का फैसला किया, ताकि उस पर किसी स्त्री की नजर न पड़े और उसका विवाह न हो सके. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. एक दिन संयोग से राजा हंस की बेटी वहां पहुंच गई. राजकुमार को देखकर वह उस पर मोहित हो गई और दोनों ने गंधर्व विवाह कर लिया. कहते हैं कि विवाह के चार दिन बाद ही राजकुमार की मृत्यु हो गई. उसकी पत्नी का दुख देखकर यमदूत का मन पसीज गया. उसने यमराज से पूछा कि क्या कोई ऐसा उपाय है, जिससे मनुष्य को अकाल मृत्यु से बचाया जा सके?
तब यमराज ने कहा कि कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर पूजा करने और घर के बाहर दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का डर दूर होता है. इसी मान्यता के चलते धनतेरस की रात यमराज के नाम का दीपक जलाया जाता है. इसे यम दीपदान कहते हैं.