धनतेरस का पर्व आते ही घरों में सोना, चांदी, बर्तन और अन्य वस्तुओं की खरीदारी के साथ धन-समृद्धि की कामना की जाती है. लेकिन इस पर्व का मूल संबंध केवल धन अर्जित करने से नहीं, बल्कि स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की कामना से भी जुड़ा है. समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश लेकर प्रकट हुए भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का प्रवर्तक और देवताओं का वैद्य माना जाता है. उनकी आराधना का उद्देश्य निरोगी काया, बेहतर स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करना है. समय के साथ धन्वंतरि त्रयोदशी का प्रचलित नाम धनतेरस हो गया और पर्व पर धन-संपत्ति की कामना का महत्व अधिक दिखाई देने लगा. हालांकि, स्वस्थ शरीर को जीवन की सबसे बड़ी संपत्तियों में गिना जाता है.
वास्तु में उत्तर-उत्तर-पूर्व दिशा का स्वास्थ्य से संबंध
वास्तु शास्त्र के अनुसार दिशाओं का संबंध अलग-अलग प्रकार की ऊर्जा और जीवन के विभिन्न पहलुओं से है. उत्तर और उत्तर-पूर्व के बीच आने वाले उत्तर-उत्तर-पूर्व (North-North-East) क्षेत्र को स्वास्थ्य, शुद्धता और शरीर की ऊर्जा से है. इसे ईशान कोण से पहले का क्षेत्र भी कहा जाता है. इस दिशा का संतुलित और स्वच्छ होना सकारात्मक वातावरण बनाने में सहायक माना जाता है. यदि किसी घर में कोई व्यक्ति लंबे समय से अस्वस्थ है, तो उसके कमरे की दिशा और वहां रखी वस्तुओं पर भी ध्यान देना चाहिए. उत्तर-उत्तर-पूर्व क्षेत्र में सोने से स्वास्थ्य मिलता है. गंभीर या लंबे समय से चली आ रही बीमारी में चिकित्सकीय परामर्श और उपचार भी आवश्यक हैं.
इस दिशा में जल रखने का महत्व
उत्तर-उत्तर-पूर्व जल तत्व की दिशा है. इस कारण यहां स्वच्छ जल रखने को शुभ माना जाता है. इस क्षेत्र में दवाइयां व्यवस्थित रूप से रखना भी स्वास्थ लाभ देता है. इस दिशा में प्रतिदिन स्वच्छ पानी से भरा गिलास रखने और जल ग्रहण करने से स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है.
किस धातु के गिलास में रखें पानी?
जल रखने के लिए स्टील, कांच, पीतल और चांदी के बर्तन बेहतर है. चांदी को शीतलता और जल तत्व को दर्शाता है, जबकि तांबा अग्नि तत्व से संबंधित है. इसीलिए उत्तर-उत्तर-पूर्व दिशा में तांबे के बजाय चांदी, कांच या स्टील के पात्र में जल रखा जाना चाहिए. धन-संपत्ति का वास्तविक आनंद तभी संभव है, जब शरीर स्वस्थ हो. धनतेरस पर पूजा-अर्चना के साथ स्वच्छता, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और समय पर स्वास्थ्य जांच का संकल्प लेना बेहतर है.