दशहरा असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है. इस दिन भगवान राम और लक्ष्मण की भूमिका निभाने वाले बालक रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतलों का दहन करते हैं. लेकिन समय के साथ रावण दहन की परंपरा भी आधुनिक होती जा रही है. अब रावण के पुतलों में तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में उत्तर प्रदेश के मुस्लिम परिवार इन पुतलों को तैयार कर रहे हैं. इस तरह वे गंगा-जमुनी तहजीब और हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल पेश कर रहे हैं.
20 अक्टूबर को दशहरा के मौके पर राजस्थान के अलवर में भी भव्य रावण दहन होगा. यहां 65 फुट ऊंचे रावण, 60 फुट के कुंभकरण और 55 फुट के मेघनाथ के पुतले जलाए जाएंगे. इन्हें तैयार करने के लिए उत्तर प्रदेश के आगरा से मुस्लिम कारीगर अलवर पहुंचे हैं. ये कारीगर पिछले करीब एक महीने से पुतले बनाने में जुटे हुए हैं. उनका कहना है कि दशहरे का त्योहार उनके परिवारों की रोजी-रोटी का बड़ा सहारा है.
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कारीगरों के मुताबिक, राजस्थान के पाली में साल भर रावण के पुतले तैयार किए जाते हैं और फिर उन्हें देश के अलग-अलग शहरों में भेजा जाता है. दशहरे से करीब चार महीने पहले इसकी तैयारी शुरू हो जाती है. इस काम में 150 से ज्यादा कारीगर जुटते हैं और सभी मुस्लिम समुदाय से आते हैं. उनके लिए यह सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा भी है.
रावण की गर्दन से तलवार तक होगी मूवमेंट, आंखों और मुंह से निकलेगी आग
कारीगरों ने बताया कि अब रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतलों में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है. पहले जहां पुतले पारंपरिक तरीके से तैयार किए जाते थे, वहीं अब उनमें मोटर और लाइटिंग जैसी सुविधाएं जोड़ी जा रही हैं. इस बार रावण की गर्दन घूमेगी, उसके हाथ-पैर हिलेंगे और हाथ में मौजूद तलवार भी घूमती दिखाई देगी.
इतना ही नहीं, रावण की आंखों और मुंह से आग की लपटें या चिंगारी निकलने जैसी विशेषताएं भी शामिल की जा रही हैं. इन बदलावों का मकसद पुतलों को पहले से ज्यादा आकर्षक और प्रभावशाली बनाना है. कारीगरों के मुताबिक, रोशनी और तकनीक से लैस पुतलों की मांग लगातार बढ़ रही है. इसी वजह से छोटे शहरों और कस्बों में भी अब भव्य रावण दहन कार्यक्रम आयोजित होने लगे हैं.
पुतले बनाने में खास तौर पर बरेली से बांस मंगवाया जाता है. इसके ढांचे पर चमकीले कागज चिपकाकर रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतलों को तैयार किया जाता है. कारीगरों की मेहनत से इनका रूप आकर्षक बनाया जाता है, ताकि दशहरे पर दहन के दौरान दर्शकों को भव्य नजारा देखने को मिले.
पुश्तैनी काम से चलता है परिवार, पाली में बनता है 100 फुट का रावण
कारीगरों ने बताया कि रावण के पुतले बनाना उनका पुश्तैनी काम है. उनके पूर्वज भी इसी पेशे से जुड़े थे. वे रावण को एक विद्वान पंडित मानते हैं और उसके पुतले पूरे सम्मान के साथ तैयार करते हैं. उनके मुताबिक, राजस्थान के पाली में 100 फुट ऊंचा रावण भी बनाया जाता है. इसके अलावा अलग-अलग शहरों में जरूरत और मांग के अनुसार पुतले तैयार किए जाते हैं.
आगरा और उत्तर प्रदेश के अन्य इलाकों से आने वाले ये कारीगर राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के अलावा दिल्ली, मुंबई, नासिक, बिहार, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड समेत कई राज्यों में काम कर चुके हैं. उनके बनाए पुतलों की सुंदरता और आधुनिक तकनीक के कारण उन्हें अलग-अलग जगहों से बुलाया जाता है. दशहरे से होने वाली कमाई से उनके परिवारों का साल भर का खर्च चलता है.
अलवर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में आता है, इसलिए यहां आतिशबाजी में ग्रीन पटाखों का इस्तेमाल किया जाएगा. इसके लिए गाजियाबाद से विशेष आतिशबाजी कारीगर भी पहुंचेंगे. अलवर में पुरुषार्थी समाज वर्षों से रावण दहन का आयोजन करता आ रहा है. इस तरह परंपरा, तकनीक और विभिन्न समुदायों की भागीदारी से दशहरे का आयोजन हर साल नया रूप ले रहा है.