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15 साल, 800 रेस्क्यू... कोटा के 'क्रोकोडाइल मैन' वीरेंद्र सिंह ने बनाया अनोखा रिकॉर्ड

राजस्थान के कोटा में वन विभाग के तकनीकी सहायक वीरेंद्र सिंह हाड़ा, जिन्हें 'क्रोकोडाइल मैन' के नाम से जाना जाता है, पिछले 15 वर्षों में 800 से अधिक मगरमच्छों का सफल रेस्क्यू कर चुके हैं. बारिश के मौसम में वे रिहायशी इलाकों में पहुंचे मगरमच्छों को सुरक्षित पकड़कर चंबल नदी और अन्य वाटर बॉडी में छोड़ते हैं. कई बार घायल होने के बावजूद उनका अभियान जारी है.

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'क्रोकोडाइल मैन' वीरेंद्र सिंह. (Photo: Chetan Gurjar/ITG)
'क्रोकोडाइल मैन' वीरेंद्र सिंह. (Photo: Chetan Gurjar/ITG)

हर बारिश के मौसम में जब चंबल नदी का जलस्तर बढ़ता है, तो उसके साथ मगरमच्छ भी रिहायशी इलाकों, स्कूलों, खेतों, कॉलोनियों और सड़कों तक पहुंच जाते हैं. ऐसे हर मुश्किल पल में कोटा के लोग जिस शख्स का सबसे पहले नाम लेते हैं, वह हैं वन विभाग के तकनीकी सहायक वीरेंद्र सिंह हाड़ा. जिन्हें आज पूरा शहर 'क्रोकोडाइल मैन' के नाम से जानता है.

पिछले डेढ़ दशक में वीरेंद्र सिंह ने 800 से अधिक मगरमच्छों का सफल रेस्क्यू कर एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया है, जो पूरे देश में बेहद दुर्लभ माना जाता है. 15 फीट लंबे और करीब 200 किलो तक वजनी, बेहद आक्रामक मगरमच्छों को बिना नुकसान पहुंचाए सुरक्षित पकड़कर दूसरी वाटर बॉडी में छोड़ना उनकी पहचान बन चुका है. कई बार मगरमच्छों के हमलों में घायल होने के बावजूद भी उन्होंने कभी पीछे हटना नहीं सीखा और हर सूचना पर अपनी जान जोखिम में डालकर मौके पर पहुंचे.

रेस्क्यू किए गए एक मच्छर के साथ वीरेंद्र सिंह. (Photo: ITG)

बारिश शुरू होते ही बढ़ जाती है जिम्मेदारी
कोटा में बारिश का मौसम आते ही मगरमच्छों का रिहायशी इलाकों में पहुंचना आम बात हो जाती है. ऐसे समय में वीरेंद्र सिंह और उनकी टीम लगातार अलर्ट मोड पर रहती है. हर साल बारिश के सीजन में वे 100 से अधिक रेस्क्यू ऑपरेशन करते हैं, जबकि पूरे जिले में यह संख्या 200 से 300 तक पहुंच जाती है. कई दिनों में उन्हें दो से तीन अलग-अलग रेस्क्यू करने पड़ते हैं.

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पूरे देश में अनोखी उपलब्धि
वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार वीरेंद्र सिंह देश के उन चुनिंदा वनकर्मियों में शामिल हैं, जिन्होंने अकेले 800 से ज्यादा मगरमच्छों का सुरक्षित रेस्क्यू कर उन्हें दूसरी सुरक्षित वाटर बॉडी में पुनर्वासित किया है. यह उपलब्धि न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणादायक है.

उप वन संरक्षक अपूर्व कृष्ण श्रीवास्तव बताते हैं कि वीरेंद्र सिंह और उनकी टीम आज भी पूरी तरह परंपरागत तरीके से मगरमच्छों का रेस्क्यू करती है. टीम में धर्मेंद्र सहित अन्य सदस्य शामिल रहते हैं. लंबे बांस या डंडे, मजबूत रस्सियां और जूट की बोरी की मदद से मगरमच्छ को नियंत्रित किया जाता है. आंखों पर जूट की बोरी डालते ही मगरमच्छ कुछ शांत हो जाता है, जिसके बाद उसके मुंह और पैरों को सुरक्षित बांधकर वाहन से चंबल नदी या सावन-भादो डैम जैसी सुरक्षित वाटर बॉडी में छोड़ दिया जाता है.

कई बार अकेले ही संभालनी पड़ती है पूरी जिम्मेदारी
वीरेंद्र सिंह बताते हैं कि कई बार टीम के पहुंचने में देरी होने पर उन्हें अकेले ही मौके पर जाना पड़ता है. जब मगरमच्छ किसी घर, कॉलोनी या स्कूल के आसपास पहुंच जाता है तो लोगों में दहशत फैल जाती है. कई बार लोग खुद भी मगरमच्छ के पास जाने की कोशिश करते हैं, जिससे खतरा और बढ़ जाता है. ऐसे समय में स्थानीय लोगों की मदद लेकर वे अकेले ही मगरमच्छ को सुरक्षित काबू में कर लेते हैं.

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मगरमच्छों के रेस्क्यू के लिए वीरेंद्र सिंह की मदद लेता है प्रशासन. (Photo: ITG)

सबसे बड़ी चुनौती होता है आक्रामक मगरमच्छ
करीब 200 किलो वजनी मगरमच्छ जब हमला करने की मुद्रा में होता है, तब रेस्क्यू सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण बन जाता है. मगरमच्छ के तेज दांत और मजबूत पंजे किसी भी पल बड़ा हादसा कर सकते हैं. इसके बावजूद वीरेंद्र सिंह और उनकी टीम धैर्य, अनुभव और सूझबूझ के साथ हर ऑपरेशन पूरा करती है ताकि इंसानों और वन्यजीव—दोनों की जान सुरक्षित रहे.

कई बार हुए घायल, लेकिन नहीं छोड़ा हौसला
रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान मगरमच्छों के दांत और पंजों से वीरेंद्र सिंह कई बार घायल हुए हैं. बारिश के मौसम में फिसलन, तेज बहाव और आक्रामक मगरमच्छ खतरे को कई गुना बढ़ा देते हैं, लेकिन इन चुनौतियों ने उनके हौसले को कभी कमजोर नहीं किया.

2010 में शुरू हुआ था यह सफर
वीरेंद्र सिंह ने 1986 में वन विभाग में नौकरी शुरू की. पहले अस्थायी कर्मचारी और फिर 1988 में स्थायी कैटल गार्ड बने. वर्ष 2010 में उन्होंने पहली बार कोटा शहर की एक कॉलोनी से मगरमच्छ का सफल रेस्क्यू किया. वर्ष 2014 से वे पूरी तरह रेस्क्यू टीम का हिस्सा बन गए. एक ऑपरेशन कभी 10 से 20 मिनट में पूरा हो जाता है तो कई बार दो घंटे से भी अधिक समय लग जाता है.

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3 फीट से 15 फीट तक के मगरमच्छों का सफल रेस्क्यू
अब तक वीरेंद्र सिंह 3 फीट से 15 फीट लंबे और 30 से 200 किलो वजन तक के मगरमच्छों को सुरक्षित पकड़ चुके हैं. चंबल नदी, चन्द्रलोई नदी, किशोर सागर, नहरों, तालाबों और शहर की कॉलोनियों से लेकर खेतों तक उनका रेस्क्यू अभियान लगातार जारी है.

नान्ता, चन्द्रसेल, कालातालाब, कुन्हाड़ी, बोरखेड़ा, पूनम कॉलोनी, रायपुरा, देवली अरब रोड, नयानोहरा, हनुमंतखेड़ा, सोगरिया, किशोर सागर, बजरंग नगर, कंसुआ, थेकड़ा और सूरसागर सहित शहर के अनेक इलाकों में उन्होंने सफल रेस्क्यू ऑपरेशन किए हैं.

मगरमच्छ ही नहीं, कई वन्यजीवों को भी बचाया
वीरेंद्र सिंह केवल मगरमच्छों के ही नहीं, बल्कि पैंथर, बंदर, लंगूर, नीलगाय, सांभर, मोर और कबरबिज्जू सहित अनेक वन्यजीवों का भी सफल रेस्क्यू कर चुके हैं. उनका मानना है कि हर वन्यजीव का जीवन महत्वपूर्ण है और उसे सुरक्षित प्राकृतिक आवास तक पहुंचाना ही उनका सबसे बड़ा कर्तव्य है.

आज कोटा का यह 'क्रोकोडाइल मैन' सिर्फ वन विभाग का कर्मचारी नहीं, बल्कि इंसानों और वन्यजीवों के बीच सुरक्षा की एक मजबूत कड़ी बन चुका है. हर बारिश के मौसम में जब किसी कॉलोनी से मगरमच्छ निकलने की सूचना आती है, तो लोगों को भरोसा होता है कि कुछ ही देर में वीरेंद्र सिंह हाड़ा पहुंचेंगे और एक बार फिर किसी बड़े हादसे को टाल देंगे.

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