राजस्थान के सबसे बड़े जिला अस्पतालों में शामिल अलवर के राजीव गांधी सामान्य अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं. यहां सोनोग्राफी कराने के लिए गर्भवती महिलाओं और मरीजों को लंबी तारीख दी जा रही है. कई मामलों में डेढ़ से दो महीने बाद का समय मिलता है. इसके चलते मरीजों को इलाज के लिए लगातार अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं.
मरीजों का कहना है कि कई बार डॉक्टर सोनोग्राफी रिपोर्ट के बिना आगे की दवा या इलाज तय नहीं कर पाते. ऐसे में जांच में देरी सीधे उपचार को प्रभावित कर रही है. खासकर प्रसूताओं और पेट संबंधी परेशानी से जूझ रहे लोगों को ज्यादा परेशानी उठानी पड़ रही है.
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राजीव गांधी सामान्य अस्पताल को करीब तीन साल पहले मेडिकल कॉलेज का दर्जा मिल चुका है, लेकिन मरीजों का आरोप है कि सुविधाओं की स्थिति अब भी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है. जयपुर के एसएमएस अस्पताल के बाद अलवर सामान्य अस्पताल में राजस्थान के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में सबसे अधिक मरीजों की ओपीडी रहती है. यहां रोजाना करीब 4 से 5 हजार मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं.
हरियाणा और यूपी से भी आते हैं मरीज
अलवर का यह अस्पताल सिर्फ राजस्थान के मरीजों तक सीमित नहीं है. हरियाणा और उत्तर प्रदेश के आसपास के इलाकों से भी लोग इलाज के लिए यहां पहुंचते हैं. बड़ी संख्या में मरीज आने के बावजूद सोनोग्राफी जैसी जरूरी जांच के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है.
अस्पताल में सोनोग्राफी की सुविधा के लिए सामान्य अस्पताल और जनाना अस्पताल दोनों जगह मशीनें उपलब्ध हैं. इसके बावजूद मरीजों को जांच कराने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. मरीजों के मुताबिक, जांच की तारीख लेने के लिए ही लंबी कतार में लगना पड़ता है और कई घंटे अस्पताल परिसर में गुजर जाते हैं.
अस्पताल पहुंचे एक मरीज ने बताया कि सोनोग्राफी के लिए डेढ़ से दो महीने बाद की तारीख दी जाती है. निर्धारित दिन अस्पताल पहुंचने के बावजूद कई बार जांच नहीं हो पाती. इसके बाद मरीजों के सामने निजी लैब में जांच कराने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता. निजी सेंटरों पर एक सोनोग्राफी के लिए 1000 से 2000 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं.
पर्ची पर मिलती है लंबी तारीख, फिर भी जांच नहीं
अलवर के ग्रामीण इलाकों से इलाज के लिए पहुंचे मरीजों ने अस्पताल के स्टाफ के व्यवहार को लेकर भी शिकायत की है. उनका आरोप है कि सोनोग्राफी कक्ष के पास मौजूद कर्मचारी पर्ची पर एक से दो महीने के बीच की तारीख लिखकर मरीजों को वापस भेज देता है. कई मरीजों को तत्काल जांच की जरूरत होने के बावजूद उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ता है.
लोगों का कहना है कि जब दी गई तारीख पर वे दोबारा अस्पताल पहुंचते हैं तो उस दिन भी सोनोग्राफी नहीं हो पाती. इस तरह मरीजों को बार-बार अस्पताल का सफर करना पड़ता है. कई बार दो से चार घंटे तक कतार में खड़े रहने के बाद भी जांच नहीं हो पाती, जिससे ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की मुश्किल बढ़ जाती है.
मरीजों ने बताया कि इस समस्या को लेकर कई बार अस्पताल प्रशासन के सामने शिकायत की जा चुकी है, लेकिन अब तक स्थायी समाधान नहीं हुआ. राजीव गांधी सामान्य अस्पताल के साथ जनाना अस्पताल में भी सोनोग्राफी को लेकर ऐसी ही स्थिति होने की बात सामने आई है. मरीजों का कहना है कि सरकारी अस्पताल में मुफ्त या सस्ती जांच की उम्मीद लेकर आने वालों के लिए सोनोग्राफी कराना ही बड़ी चुनौती बन गया है.
इलाज पर पड़ रहा असर
सोनोग्राफी गर्भावस्था की जांच के साथ-साथ पेट और कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान के लिए जरूरी मानी जाती है. सरकारी अस्पताल में इसकी तारीख लंबी होने से मरीजों को समय पर जांच नहीं मिल पा रही है. इसके चलते कुछ लोग निजी केंद्रों में पैसे खर्च कर जांच कराने को मजबूर हैं.
सबसे ज्यादा परेशानी उन परिवारों को हो रही है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और निजी जांच का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं हैं. अस्पताल में आने वाले मरीजों का कहना है कि जब मशीन और जांच की सुविधा सरकारी अस्पताल में मौजूद है, तो उन्हें महीनों इंतजार क्यों करना पड़ रहा है, इसका जवाब अस्पताल प्रशासन को देना चाहिए.
फिलहाल, मरीजों की शिकायतों और अस्पताल में सोनोग्राफी की व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. बड़ी संख्या में ओपीडी के बावजूद जांच की तारीखों का इतना लंबा होना स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव को दिखाता है. मरीज चाहते हैं कि अस्पताल प्रशासन इस समस्या का जल्द समाधान करें, ताकि गर्भवती महिलाओं और अन्य जरूरतमंद मरीजों को समय पर सोनोग्राफी की सुविधा मिल सके.