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CJP का 'चुनाव लीक' प्रोटेस्‍ट: क्या ज्ञानेश कुमार का अंजाम धर्मेंद्र प्रधान जैसा होगा?

कॉकरोच जनता पार्टी और देश की व‍िपक्षी पार्ट‍ियां एक समानांतर आंदोलन चला रही है. बस, ड‍िमांड एक है- मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त ज्ञानेश कुमार का इस्‍तीफा है. लेक‍िन, ज‍ितना पेंचीदा प्रोटेस्‍ट का अंतर्व‍िरोध है, उतना ही ज्ञानेश कुमार को धर्मेंद्र प्रधान मान लेना.

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CJP के प्रदर्शन पर सोशल मीडिया में उठे सवाल. (Photo: PTI)
CJP के प्रदर्शन पर सोशल मीडिया में उठे सवाल. (Photo: PTI)

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के कर्ता-धर्ता अभिजीत दीपके ने महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली चुनाव नतीजों का पूरा ठीकरा भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सिर ही फोड़ डाला. अब सोशल मीडिया पर 'फैक्ट चेकर्स' की बाढ़ आ गई, जो हाथ धोकर दीपके के पीछे पड़ गए कि भाई, ये तीनों चुनाव तो ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति से पहले हुए थे. लेकिन ज्ञानी लोग यह भूल जाते हैं कि हमारे देश में प्रोटेस्ट किसी 'ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स' (BIS) से  क्वालिटी चेक कराने के बाद लांच नहीं किए जाते.

विरोध प्रदर्शनों में लॉजिक ढूंढना वैसा ही है जैसे जलेबी में कुछ सीधा होने की उम्‍मीद रखना. वरना, सुप्रीम कोर्ट में तमाम ज‍िरह होने पर अफजल गुरु को सजा म‍िलने के यह नारा नहीं लगता क‍ि 'अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं.' जब किसी व्यवस्था के खिलाफ माहौल बनाने का फैसला हो जाता है, तो मुद्दों की गहराई, क्रोनोलॉजी और सच्चाई मायने नहीं रखती, बस एजेंडा मायने रखता है.

सवाल ये नहीं है क‍ि CJP ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग क्‍यों कर रही है. जबक‍ि, यह मुद्दा तो व‍िपक्षी राजनीतिक दलों का है, जो चुनाव लीक के मामले में वैसे ही पीड़ित हैं, जैसे पेपर लीक के मामले में छात्र. द‍िलचस्‍प ये है क‍ि CJP अपना 'प्रोटेस्‍ट' सीधे दिल्ली से शुरू कर सकती थी, जहां चुनाव आयोग से लेकर इस मुद्दे पर छाती पीटने वाली तमाम विपक्षी पार्टियों के दफ्तर मौजूद हैं. लेकिन उन्होंने मुंबई चुना. प्रीमियर को मुंबई के शिवाजी पार्क में हिट कराया गया. अब ऐलान किया गया है कि इस सुपरहिट सीरीज का 'सीजन-2' 10 अक्टूबर को दिल्ली में रिलीज होगा.

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CJP की रणनीति

CJP की रणनीत‍ि साफ है- "जहां कीवर्ड, वहां हम". यह एक बेहद चालाक और कामयाब ड‍िज‍िटल रणनीत‍ि है. ज‍िसने पेपर लीक मामले में कामयाबी भी हास‍िल की. लेक‍िन, अब जब इनका पुराना 'स्कूल ठीक करो' वाला आंदोलन सोशल मीडिया की ट्रेंड‍िंग दुन‍िया में धुंधला पड़ा, तो उन्होंने तुरंत उस वक्त के सबसे गरमा-गरम और ट्रेंडिंग कीवर्ड यानी 'SIR' और 'चुनाव आयोग' पर कब्जा कर लिया.

यह मुद्दा मूल रूप से विपक्षी दलों का था, लेकिन विपक्ष जब तक इस मुद्दे पर एक हो पातीं, CJP ने उनके एजेंडे को लपक लिया और सीधे ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांग लिया. CJP ने सिर्फ चुनाव आयोग पर ही निशाना नहीं साधा, बल्कि विपक्षी पार्टियों के दोहरे रवैये की भी धज्जियां उड़ा दीं. वे सीधे पूछ रहे हैं कि अगर चुनाव में वाकई धांधली हो रही है, तो विपक्षी नेता गालियां देने के साथ-साथ उन्हीं चुनावों में पर्चा क्यों भरते हैं? वे चुनाव का बायकाट क्यों नहीं करते? इस एक जुमले से CJP ने खुद को लोकतंत्र का अकेला असली रखवाला है. जो चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार को लेकर बेहद स्‍पष्‍ट है. जो SIR पर घुमा-फ‍िराकर बात नहीं करता है.

CJP और विपक्षी दलों के रास्ते अलग क्यों हैं?

मुद्दा भले ही एक दिखता हो, लेकिन CJP का यह प्रोटैस्‍ट मुख्य विपक्षी पार्टियों के साथ कभी भी कदमताल नहीं कर सकता. सबसे कड़वी हकीकत यह है कि CJP कोई रजिस्टर्ड राजनीतिक दल नहीं है. चुनाव आयोग का संवैधानिक दायरा केवल मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों से संवाद करने का है, किसी अनरजिस्टर्ड प्रेशर ग्रुप से नहीं. CJP के पास ऐसा कोई कानूनी या संवैधानिक जरिया ही नहीं है, जिससे वह चुनाव आयोग के दफ्तर में बैठकर अपनी मांगें रख सके. स‍िवाय कोर्ट जाने के.

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दूसरी तरफ, कांग्रेस और बाकी विपक्षी दल जानते हैं कि संसद और कोर्ट-कचहरी के रास्ते अलग होते हैं. वे CJP के इस आक्रामक, अनियंत्रित और केवल मीम्स तक सीमित रहने वाले 'रील्स आंदोलन' से दूरी बनाकर ही चल रहे हैं, ताकि उन पर किसी अराजक गैंग का ठप्पा न लग जाए. जब CJP खुद कह चुकी है कि वे विपक्ष के साथ मंच साझा नहीं करेंगे, तो यह साफ है कि दोनों का रास्ता अलग है.

क्‍या इस्‍तीफा होगा? ज्ञानेश कुमार और धर्मेंद्र प्रधान में जमीन-आसमान का फर्क

NEET पेपर लीक मामले में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मिसाल देकर ज्ञानेश कुमार को कुर्सी से हटाने का सपना देखना गलत नहीं है. और ऐसा होना असंभव भी नहीं. लेक‍िन, दोनों मामलों में जमीन-आसमान का फर्क है. धर्मेंद्र प्रधान वाले मामले में लाखों छात्रों और उनके गुस्से का सीधा कनेक्शन था. सोनम वांगचुक जैसे गंभीर चेहरे के अनशन ने उसे एक नैतिक आधार दिया था. सबसे बड़ी बात यह थी कि धर्मेंद्र प्रधान एक राजनेता हैं और उनका मंत्री पद प्रधानमंत्री की कृपा और आगामी चुनाव के वोट बैंक पर टिका था. जब सरकार को लगा कि युवा वोटर खिसक सकता है, तो प्रधान को बैकफुट पर जाना पड़ा और उन्होंने इस्तीफा थमा दिया.

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लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का मामला पूरी तरह अलग है. वे किसी राजनीतिक दल की मेहरबानी से नहीं, बल्कि एक संवैधानिक और स्वायत्त संस्था के मुखिया के तौर पर ब्यूरोक्रेसी से वहां पहुंचे हैं. उनका पद किसी जनभावना, रील्स के ट्रेंड्स या चुनाव हारने-जीतने के डर से तय नहीं होता. संविधान के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का एकमात्र रास्ता संसद में महाभियोग जैसी बेहद पेचीदा प्रक्रिया है, जो राष्ट्रपति के जरिए ही संभव है. जब तक आयोग के तीनों आयुक्त एकसुर में काम कर रहे हैं और कोई ठोस वैधानिक आधार नहीं है.

इन तमाम संवैधान‍िक पेंचीदग‍ियों के बावजूद इतना तो कहा ही जा सकता है- "एक कचौरी, दो समोसा, मोदी सरकार के सरप्राइज का क्‍या भरोसा". प्रधान के इस्‍तीफे से एक द‍िन पहले तक सरकार ने ऐसा कोई संकेत नहीं द‍िया था क‍ि वह झुकेगी.

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